Source: न्यूज़ भारती हिंदी07 Jan 2016 17:57:18

पश्चिम बंगाल का जिला मालदा क्यों जला? सड़कों पर ढाई लाख लोगों की भीड़ क्यों उतरी थी? किसने संविधान और कानून की धज्जियां उड़ाईं? किसने दो दर्जन से अधिक वाहनों को आग के अवाले किया? इनमें पुलिस के वाहन भी थे। किसने अराजकता की हद तोड़कर पुलिस स्टेशन (कालियाचक) पर हमला बोला, थाने में घुसकर तोड़-फोड़ की,किसने पुलिस को मारा-पीटा? आमजनों के घरों में जमकर लूटपाट करने वाली भीड़ किसकी थी? इतनी अराजकता, इतनी दशहतगर्दी, आखिर किसलिए? इस दशहतगर्दी पर चुप्पी क्यों? इस चुप्पी का मतलब क्या है? कोई नहीं बता रहा है।

मालदा को दहशत के हवाले करने की इक्का-दुक्का खबरों को छोड़ दें तो यह खबर कहीं नहीं है। किसी की 'आह' पर भी हल्ला मचाने वाले न्यूज़ चैनल इस सांप्रदायिक हिंसा पर गजब खामोश हैं। आखिर, यह क्यों नहीं बताया जाना चाहिए कि किसी एक व्यक्ति की टिपण्णी के कारण समूचे देश का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे वाले यह लोग कौन हैं? दरअसल, मालदा में बीते रविवार (3 जनवरी) को उत्तर प्रदेश के स्वयंभू हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी के विरोध में ढाई लाख मुसलमान सड़क पर उतरे थे। इसी भीड़ ने मालदा के बहाने देश का सांप्रदायिक माहौल बिगाडऩे की कोशिश की है। चूंकि यह भीड़ मुसलमानों की थी, इसलिए वामपंथी विचारधारा की गोद में खेल रहे तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस अराजकता और असहिष्णुता पर कहीं कोई अवार्ड वापस नहीं किया। कहीं कोई लेख नहीं लिखा। कहीं कोई रैली नहीं की। कहीं कोई प्रदर्शन-भाषण नहीं किया। एक बार फिर उनका दोगला चरित्र उजागर हुआ है। ढोंगी धर्मनिरपेक्ष भी चुप्पी साधकर बैठे हुए हैं। जबकि यह विरोध प्रदर्शन ही संदिग्ध है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश सरकार के प्रभावशाली मंत्री आजम खान ने सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की। इसकी प्रतिक्रिया में उत्तरप्रदेश के ही कमलेश तिवारी ने वैसी ही टिप्पणी मोहम्मद पैगंबर के खिलाफ कर दी। उसके बाद से ही देशभर में मुसलमानों की तरफ से इस तरह के सांप्रदायिक प्रदर्शन जारी हैं। हालांकि, मुसलमानों के गुस्से को देखते हुए पुलिस ने 2 दिसंबर को ही कमलेश तिवारी को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। अब सवाल उठता है कि आखिर मुसलमान चाहते क्या हैं? उनकी नजर में भारत के संविधान और कानून का सम्मान है या नहीं? एक जैसी टिप्पणी करने पर कमलेश तिवारी जेल में है लेकिन, आजम खान कहां है?

कमलेश तिवारी की टिप्पणी का किसी भी सूरत में समर्थन नहीं किया जा सकता। फिर, आजम खान की टिप्पणी भी तो स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। कमलेश तिवारी के लिए फांसी की मांग कितनी जायज है? मुसलमानों की यह भीड़ आजम खान के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई करने की मांग क्यों नहीं कर रही है? एक जैसे मसले पर यह दोहरा आचरण क्यों? मौजूदा कानून के हिसाब से कमलेश तिवारी के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, इसके बाद भी मालदा में करीब एक माह बाद यह दहशतगर्दी क्यों? इस तरह के हिंसक प्रदर्शन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी हो चुके हैं। राजस्थान के टोंक में तो आईएसआईएस के नारे लगाए गए। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई रैली में सीधे मार-काट मचाने का संदेश दिया जा रहा था। आखिर यह सब क्या है? यदि इन प्रदर्शनों पर प्रदेश और केन्द्र सरकार ने शुरुआत में ही ध्यान दिया होता तो मालदा नहीं जलता। उत्तरप्रदेश से निकली नफरत की आग पश्चिम बंगाल तक का सफर तय नहीं कर पाती। हिंसक प्रदर्शनों की अनदेखी किसी भी स्थिति में ठीक नहीं है। सांप्रदायिक प्रदर्शनों से देश का माहौल बिगड़ता है। इसलिए इस तरह के हिंसक प्रदर्शनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। सरकार को यह भी देखना चाहिए कि देशभर में हो रहे इन प्रदर्शनों के पीछे कोई गहरा षड्यंत्र तो नहीं।