यह तो सभी को पता है कि भारत, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से बुरी तरह पीड़ित है। देश में कई बार ऐसी मांग उठी कि भारत को आगे बढ़कर पी.ओ.के. स्थित आतंकवादियों के शिविरों को नष्ट करना चाहिए। इसके लिए बराबर इजरायल का उदाहरण दिया जाता रहा जो बहुत छोटा देश होने के बावजूद आतंकवादियों से निपटने में कहीं कोई झिझक नहीं दिखाई। परन्तु पाक के परमाणु संयंत्र देश होने और दूसरे कारणों से भारत की पूर्व सरकारें ऐसे कदम नहीं उठा पाई, जिसे अटैक इज द बेस्ट डिफेंस कहा जा सके। लेकिन मोदी सरकार ने वह कर दिखाया, जिसकी प्रत्यासा हम भारतीय पता नहीं कितने वर्षों से कर रहे थे। खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दृढ़ता, साहस और क्षमता को देखते हुए लोगों को कहीं-न-कहीं यह भरोसा था कि मोदी आतंकवाद से आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे। आखिर में वह दिन आ गया, जब भारतीय सेना ने सीमा पार कर वह अदभुत कारनामा कर डाला। निःसंदेह इसे एक नए युग की शुरुआत कही जा सकती है। क्योंकि अभी तक होता यह था कि हम अपनी ही सीमाओं में लड़ते थे, अथवा यूं कहा जाए कि मात्र अपनी रक्षा करने का प्रयास करते थे। पर जैसा कि कहा गया है कि आक्रमण ही बेहतर प्रतिरक्षा है, उसके तहत यह साहसिक कारनामा किया गया। निस्संदेह यह अंत नहीं बल्कि शुरुआत है। इसके निहितार्थ यह है कि भारत ने आतंकवाद की कमर तोड़ने का निश्चय कर लिया है। जैसा कि सभी को विदित है कि भारतीय सेना ने इसके लिए छः माह का समय मांगा है।

भारत द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ऐसा लगा कि कमोवेश दल की तुलना में राष्ट्र पहले यह भावना अधिसंख्य राजनीतिक दलों में है। (वामपंथियों की बात और है) लेकिन कुछ ही दिनों बाद कुछ राजनीतिक दलों को ऐसा लगा कि इस कदम का लाभ संभवतः आने-वाले कुछ राज्यों के चुनाव में संभवतः भाजपा को मिल जाए। इसलिए कुछ ही दिनों में इन्होंने पाकिस्तान के सुर-में-सुर मिलाना शुरू कर दिया। भारतीय राजनीति के ‘डान क्विकजोट’ कहे जाने वाले अरविंद केजरीवाल ने तो कहने को तो मोदी एवं सेना की प्रशंसा की, पर लगे हाथ इस सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत भी जारी करने को कह दिया। अब पाकिस्तानी अखबार सुर्खियों में छाप रहे हैं कि देखो भारतीय विपक्षी दल भी सर्जिकल स्ट्राइक के मामले में हमारे साथ खड़े हैं और इसके होने के सबूत मांग रहे हैं।

महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रमुख बड़बोले संजय निरूपम ने तो यहां तक कह दिया कि सियासी फायदे के लिए फर्जी सर्जिकल ऑपरेशन ठीक नहीं। वहीं पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता पी. चिदम्बरम ने डींग मारी कि कांग्रेस सरकार ने भी सर्जिकल ऑपरेशन किया था, लेकिन इसका प्रचार नहीं किया। बकायदा इसके लिए तीन तिथियॉ भी बता दी गईं। यह बात अपनी जगह पर है कि उस समय के डी.जी.एम.ओ. विनोद भाटिया ने स्पष्ट कर दिया कि यू.पी.ए. शासन के दौर में कम-से-कम ऐसा कुछ नहीं हुआ था, जिसे सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा सके। यद्यपि कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता ने इस बयानों को निजी बताते हुए भारतीय सेना पर पूरा भरोसा जताया है। पर यह तो ऐसी ही बात हुई कि ‘चोर से कहो चोरी करे और साह से कहो कि जागते रहो।’ यह बताना उल्लेखनीय होगा कि कांग्रेस पार्टी का सदैव ही ऐसा दुहरा रवैया देखने को मिलता है। लोगों के जेहन में शायद हो जब वर्ष 2008 में मुम्बई के 26/11 प्रकरण- जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे, उसमें प्रकारांतर से दिग्विजय सिंह ने बजरंगियों का हाथ बताया था। इसी तारतम्य में राहुल गांधी ने पहली बार प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ तो की पर कुछ ही दिनों बाद यह कहकर गजब कर दिया कि मोदी सैनिकों के खून की दलाली कर रहे हैं। ऐसी शब्दावली को देखकर राहुल गांधी की लंबी राजनीतिक यात्रा को देखते हुए उनकी समझ को लेकर तरश आता है। असलियत यह है कि मोदी सरकार की यह महती उपलब्धि न तो केजरीवाल को हजम हो पा रही है और न ही कांग्रेस पार्टी को।

रहा सवाल सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत का तो, बड़ा सवाल यह कि क्या भारतीय सेना झूठ बोल रही है, क्या इन नेताओं को भारतीय सेना पर भरोसा नहीं है? दूसरी बड़ी बात यह कि यदि सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई तो पाकिस्तान इतना घबराया और परेशान क्यों है? तीसरी बड़ी बात यह कि यदि ऐसा न हुआ होता तो भारतीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल इसके तत्काल बाद अपने अमेरिका समकक्ष से बातें क्यों करते? इसके प्रमाण के लिए एक पत्रकार द्वारा पी.ओ.के. के एक एस.पी. द्वारा सच्चाई उगलवाई जा चुकी है। इतना ही नहीं ट्रकों में भरकर अतंकवादियों की लाशों को ले जाते हुए देखा गया। बड़ी बात यह कि सेना उक्त सर्जिकल स्ट्राइक की सी.डी. भारत सरकार को सौंप चुकी है, पर सेना स्वतः सुरक्षा कारणों से उसे सार्वजनिक किए जाने के पक्ष में नहीं है। शायद कुछ नेता वोट राजनीति के तहत यह चाहते हैं कि ऐसे कदम उठाए तो जाएं, पर देश-दुनिया को इसके बारे में पता न लगे। अब ऐसे संकीर्ण और निहित स्वार्थ में निमग्न ऐसे नेताओं को क्या पता कि किसी भी राष्ट्र के ऐसे कदमों से लोगों में कैसे हौसला, आत्म-गौरव और नैतिक साहस बढ़ता है? जो राष्ट्र को शक्तिशाली और महान बनाने के लिए आवश्यक है।

पता नहीं इजरायल ने कितनी बार ऐसे कदम उठाए कि दूसरे देशों में उसके सैनिकों ने घुसकर आतंकियों को मारा, पर वहां के विपक्षी दलों, यहां तक कि किसी राजनीतिज्ञ ने इसके सबूत नहीं मांगे। इसी तरह से अमेरिका ने जब सर्जिकल स्ट्राइक के तहत लादेन को मार दिया तब अमेरिका में भी किसी ने इसके सबूत नहीं मांगे। 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई तब लंदन के एक बड़े अखबार ने लिखा था कि अब भारत सच्चे अर्थों में स्वतंत्र हुआ है। उसी धारा को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार ने यह बता दिया है कि भारत एक स्वतंत्र, स्वाभिमानी, शक्ति-सम्पन्न और दृढ़ता से भरपूर राष्ट्र है। कुल मिलाकर यह एक नए भारत का दिग्दर्शन है। जैसा कि एकात्म मानववाद के प्रणेता पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का कहना था कि राजनीति राष्ट्र के लिए होनी चाहिए। उनका स्पष्ट कथन था कि व्यक्ति की तुलना में दल और दल की तुलना में राष्ट्र को वरीयता मिलनी चाहिए। इसी भावना के तहत 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो उन्होंने उत्तर प्रदेश में होने जा रहे किसान आंदोलन को रोक दिया था। इसी भावना के तहत 1971 में अटल बिहारी बाजपेयी ने 1971 की भारत-रूस सुरक्षा मैत्री संधि की खुले दिल से स्वागत किया था। फिर भी राजनीति में जब वोट और कुर्सी के लिए राष्ट्र की सुरक्षा को भी दॉव में लगा दिया जाए तो इसे राजनीति की जगह क्षुद्र राजनीति ही कहा जा सकता है।