जिसकी आशंका थी, वही होता हुआ नजर आने लगा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केन्द्र सरकार ने तीन तलाक के विरोध में हलफनामा दाखिल किया और लॉ कमीशन को समान नागरिकता कानून पर अपनी राय देने को कहा तो इसका विरोध शुरू हो गया। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता तथा तलाक के मुद्‌दे पर विधि आयोग का बहिष्कार करने का फैसला किया है। आयोग ने इस मुद्‌दे पर 16 बिंदुओं की प्रश्नावली जारी करके धार्मिक-अल्पसंख्यक समूहों तथा गैर-सरकारी संगठनों सहित समाज के सभी वर्गों से सुझाव मांगे हैं। मुख्य रूप से महिलाओं के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए ही संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुरूप यह कदम उठाया गया है। पहल ऐसे समय हुई है जब मुस्लिम पसर्नल लॉ खासकर तीन बार कहकर तलाक देने का मुद्‌दा गरमाया हुआ है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पदाधिकारियों ने लॉ कमीशन की ओर से भेजी गई प्रश्नावली के बायकाट का ही ऐलान कर दिया है। वह यहीं नहीं रुके, उन्होंने पीएम नरेन्द्र मोदी पर कई दूसरे आरोप भी लगा डाले हैं। यहां तक बयानबाजी कर डाली कि सरहद को तो संभाल नहीं पा रहे हैं, देश में सम्प्रदायवाद को हवा देना शुरू कर दिया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बैनर तले इकट्ठा हुए मुस्लिम संगठनों के पदाधिकारियों ने प्रेस कांन्फ्रेंस में केन्द्र को परोक्ष रूप से यह धमकी तक दे डाली है कि अगर उनके पर्सनल लॉ से छेड़छाड़ करके कॉमन सिविल कोड जबरन थोपने की कोशिशें की गईं, तो वे चुप नहीं बैठेंगे। सिखों, ईसाइयों, जैन, बौद्ध और दूसरे धर्म के मानने वालों को भी इकट्ठा करेंगे, जिनके अपने रीति रिवाज, तहजीब और पर्सनल लॉ हैं।

हाल ही में अखिल भारतीय ईसाई परिषद को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने ईसाई समुदाय से कहा कि धर्म के आधार पर उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा। भारत में किसी के घबराने की जरूरत नहीं है कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है। हम किसी को रिलीजन के बेसिस पर डिस्क्रिमेशन की इजाजन नहीं दे सकते हैं। उन्होने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और यहां धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जाएगा। राजनाथ सिंह ने इस बात को दोहराया कि भारत इतिहास के दौरान विश्व के सभी प्रमुख धर्मों का संगम रहा है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ही नहीं, कांग्रेस से लेकर जनता दल (यू), सपा और दूसरे राजनीतिक दलों ने भी इस मसले पर लॉ कमीशन की पहल पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। यानी बाकी मुद्दों की तरह इस पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का सिलसिला शुरू हो गया है। भाजपा दरअसल, शुरू से ही इस पक्ष में रही है कि एक देश में एक ही कानून लागू होना चाहिए। किसी को भी पर्सनल लॉ के तहत काम करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। यह मसला वास्तव में केंद्र की मौजूदा सरकार ने अपनी तरफ से शुरू नहीं किया है।

गौरतलब है कि तीस साल से भी अधिक समय से देश की शीर्ष अदालत इस अनुच्छेद के अनुरूप देश में समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव देती रही है, लेकिन विभिन्न सरकारें कोई कदम उठाने से कतराती रहीं। कोर्ट द्वारा जोर दिए जाने के बाद अब विधि आयोग ने यह कदम उठाया है। देश के पांच अलग-अलग हिस्सों की पांच मुस्लिम महिलाओं ने समानता के अवसर और हकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। वैसे भी इस पर सवाल खड़े होते रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय महिलाओं को समानता से वंचित क्यों रखे हुए है। तीन तलाक ऐसा ही मुद्दा है। केवल पुरुष को ही महिला को तलाक देने का एकाधिकार है।

शाह बानो केस से इस पर सवाल उठने शुरू हुए थे, जब शीर्ष अदालत ने उसके पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे। इसका भी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड व बाकी संगठनों ने तीखा प्रतिवाद किया था। घबराकर तब की राजीव गांधी सरकार ने संसद से कानून पारित कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बेअसर कर दिया था। मौजूदा सरकार पूरे देश में हर नागरिक को समान अधिकार देने के पक्ष में है। वह पुरुष हो या महिला। हिंदू हो या मुसलमान या किसी दूसरे मजहब को मानने वाले नागरिक। समान अधिकारों की पैरवी करने और तीन तलाक जैसी प्रथाओं का विरोध करने वाले बहुत से कानूनविद और चिंतक मानते हैं कि मौजूदा दौर में शरीयत के हिसाब से जबरन फैसलों को महिलाओं पर नहीं थोपा जा सकता।

कम से कम 22 मुस्लिम देश भी तीन तलाक जैसी प्रथाओं को कानूनों के जरिए समाप्त कर चुके हैं, जिनमें पाकिस्तान और बंगलादेश भी शामिल हैं। ऐसे में लोकतंत्र और पंथनिरपेक्ष देश भारत में समान नागरिक कानून को लागू करने के प्रयासों पर आपत्ति का आखिर क्या औचित्य है? बहिष्कार इसका कोई हल नहीं है। सभी पक्षों के बीच सार्थक संवाद से ही आपसी भरोसा भी कायम हो सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड फैसले पर पुनर्विचार करे तो सार्थक बहस की गुंजाइश है।

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यूनिफार्म सिविल कोड पर विधि आयोग की प्रश्नावली

  1. क्या आप जानते हैं कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में यह उपबंधित है कि राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र के नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा। आपके विचार में क्या इस विषय में कोई पहल अपेक्षित है?
  2. विभिन्न धार्मिक संप्रदाय कुटुंब विधि के विषयों पर भारत में स्वीय विधियों और रूढ़िजन्य प्रथाओं द्वारा शासित किए जाते हैं, क्या एक समान सिविल संहिता में इन सभी विषयों या इनमें से कुछ विषयों को सम्मलित किया जाना चाहिए? विवाह, विवाह विच्छेद, दत्तक ग्रहण, संरक्षकता और बाल अभिरक्षा, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और विरासत।
  3. क्या आप सहमत हैं कि विद्यमान स्वीय विधियों और रूढ़िजन्य प्रथाओं के संहिताकरण की आवश्यकता है और क्या लोग इससे लाभान्वित होंगे?
  4. क्या एक समान संहिता या स्वीय विधि और रूढ़िजन्य प्रथाओं का संहिताकरण लैंगिंग समानता को सुनिश्चित करेगा?
  5. क्या एक समान सिविल संहिता वैकल्पिक होनी चाहिए?
  6. क्या बहुविवाह, बहुपति प्रथा, अन्यत्र मैत्री करार पर पाबंदी लगानी चाहिए और उन्हें विनियमित किया जाना चाहिए?
  7. क्या तीन बार तलाक की प्रथा को पूर्णत: समाप्त कर दिया जाना चाहिए, रूढ़ि को बने रहने दिया जाना चाहिए, उपयुक्त संशोधनों के साथ बने रहने देना चाहिए।
  8. आपका क्या विचार है कि यह सुनिश्चित किए जाने के लिए उपाय किए जाने चाहिए कि हिंदू स्त्री अपने उस संपत्ति अधिकार का बेहतर ढंग से प्रयोग करने में समर्थ है, जो प्राय: पुत्रों को रूढ़िजन्य प्रथाओं के अधीन वसीयत में दिया जाता है?
  9. क्या आप सहमत हैं कि विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिए दो वर्ष की प्रतीक्षा अवधि से क्रिश्चियन स्त्री के समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है?
  10. क्या आप सहमत हैं कि सभी स्वीय विधियों और रूढ़िजन्य प्रथाओं के लिए एक समान आयु पर सहमति होनी चाहिए?
  11. क्या आप सहमत हैं कि सभी धार्मिक संप्रदायों को विवाह विच्छेद के लिए समान आधार प्राप्त होने चाहिए?
  12. क्या एक समान सिविल संहिता विवाह विच्छेद पर स्त्रियों के भरण-पोषण का प्रत्याख्यान या अपर्याप्त भरण-पोषण की समस्या का समाधान करने में सहायक होंगी?
  13. विवाहों के अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण को कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है?
  14. हमें ऐसे दंपतियों की संरक्षा के लिए, जो अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाह करते हैं, क्या उपाय करने चाहिए?
  15. क्या एक समान सिविल संहिता किसी व्यक्ति के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है?
  16. समान संहिता या स्वीय विधि के संहिताकरण के लिए समाज को संवेदनशील बनाने हेतु क्या-क्या उपाय किए जाने चाहिए।