जब 2011 में ब्रिक्स की स्थापना हुई तो उसका उद्देश्य स्पष्ट था। दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं एकजुट होकर वैश्विक स्तर पर काम करें, विकास का ईंजन बने, वैश्विक वित्तीय ढांचा में अनुकूल बदलाव लाएं तथा नए हालात के अनुरूप नई विश्व आर्थिक व्यवस्था के निर्माण के लिए काम करें। इस दिशा में इन देशों ने कितना काम किया इसका मूल्यांकन हमारे आपके नजरिए पर निर्भर करेगा। उसमें हम यहां नहीं जाना चाहेंगे। जब गोवा में ब्रिक्स देशों (ब्राजील, भारत, रूस, चीन और साउथ अफ्रीका) के प्रमुख उपस्थित हुए तो ऐसा नहीं था कि एजेंडा बदल गया था, लेकिन मेजबान देश होने के नाते भारत का दायित्व था कि उसके सामने जो सबसे प्रमुख समस्या और चुनौती सामने है उसका न केवल विस्तार से जिक्र करे, अपनी स्थिति स्पष्ट करे, देशों को उनकी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कूटनीतिक रूप से न केवल विवश करे, बल्कि उससे निपटने में उनके सहयोग की अपेक्षा रखे। वैसे भी जब तक आतंकवाद है, उसके कारण हिंसा और तनाव है विकास के एजेंडे बाधित होंगे ही। भारत की यह कोशिश लंबे समय से है कि विश्व इसे अपने प्रमुख एजेंडा के रूप में अपनाए, जो देश आतंकवाद के जनक, पोषक एवं प्रायोजक हैं उन्हें चिन्हित करके उनके खिलाफ कार्रवाई करे तथा इसे समूल नाश के लिए मिलकर काम करें।

जिस पृष्ठभूमि में ब्रिक्स एवं बिम्स्टेक के नेता भारत में एकत्रित हुए उसमें भारत का परीक्षण इसी में था कि वह कूटनीति को इस प्रभावी ढंग से मोड़े कि दोनों संगठनों के नेता यह स्वीकार करें कि वाकई आतंकवाद को सर्वोपरि चुनौती मानकर काम करने की जरुरत है। ऐसा करते हुए यह सावधानी बरतने की भी आवश्यकता थी कि ब्रिक्स के अंदर कोई ऐसा मतभेद न उभर जाए जिससे इसके भविष्य पर ही प्रश्न खड़ा हो तथा अब तक का किया धरा मटियामेट हो जाए। आखिर ब्रिक्स वाणिज्य परिषद गठित हो चुका है जिसकी बैठक भी हुई। ब्रिक्स बैंक बनाने से लेकर उसके लिए न्यूनतम राशि तक ये देश पहले ही एकत्र कर चुके हैं। आपसी व्यापार को अपनी मुद्रा में करने की दिशा में भी कदम बढ़ चुका है। इसे अमेरिकी डॉलर तथा यूरोप के यूरो के लिए चुनौती के रूप में देखा गया। कारण साफ है। अगर विश्व की 43 प्रतिशत आबादी तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था का 23 प्रतिशत से ज्यादा अंश धारण करने वाले देश ऐसा करेंगे तो यह इन दो प्रमुख मुद्राओं के लिए चुनौती होगा ही। अगर ये अपने बैंक से पूरी तरह कर्ज और व्यापार भुगतान करने लगेंगे तो यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को अब तक की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

तो भारत के सामने यह चुनौती थी... इसकी प्रगति प्रक्रिया को बनाए रखते हुए आतंकवाद को शीर्ष पर लाना, उसके मुख्य खलनायक पड़ोसी यानी पाकिस्तान को साबित करना तथा देशों के सामने खरी-खरी बात करके उनका मत स्पष्ट करवाना। हमने देखा कि भारत ने अलग-अलग नेताओं से बातचीत में इस विषय को रखा और प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स के अपने संबोधन में इसे प्रमुख मुद्दा बनाया। ब्रिक्स के चारों नेताओं से बातचीत करने के बाद मोदी ने अगर कहा कि ब्रिक्स देश कर चोरी, काला धन और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए मिलकर काम करेंगे या विकास कैसे हासिल करनी है, इसके लिए हमें जड़ तक जाना होगा... इसके लिए हमें स्किल्ड टैलेंट यानी कुशल प्रतिभा, आइडियाज यानी विचार, टेक्नोलॉजी यानी तकनीक और धन का प्रवाह बनाए रखना होगा तो उसके साथ यह भी कि सीमा पार आतंकवाद और उसके मददगारों से मुकाबला ब्रिक्स देशों की प्राथमिकता होगी। यानी दोनों के बीच संतुलन होगा। मोदी ने आतंकवाद को सबसे बड़ा खतरा बताते हुए कहा कि भारत का पड़ोसी देश उसे पालने-पोसने में लगा है। ये केवल आतंकियों को अपनी जमीन पर शरण ही नहीं देता बल्कि उस विचारधारा को बढ़ावा देता है। हमें इसके खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा। पाकिस्तान के संदर्भ में यह सबसे बड़ी बात है। उसे यदि आतंकवाद के मामले में दुनिया भर में अलग-थलग करना है तो फिर यह बात स्पष्ट करनी ही होगी कि वह आतंकवाद की विचारधारा को प्रोत्साहित करने वाला देश है। वैसे यह सच है कि दुनियाभर के ज्यादातर आतंकवादी मॉड्यूल किसी न किसी तरह पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं।

दो देशों रूस और चीन का मंतव्य इस संदर्भ में भारत के लिए ज्यादा मायने रखता है। जिस तरह से उरी हमले के बाद रूस ने पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास किया उससे भारत में निराशा पैदा हुई। वैसे हमें यह मानकर चलना होगा कि रूस सोवियत संघ नहीं है। हालांकि उसके तुरत बाद रूस के राजदूत ने भारत में उड़ी हमले की न केवल निंदा की बल्कि भारत की कार्रवाई का समर्थन कर दिया। आगे उसकी क्या भूमिका होती है यह देखना होगा किंतु रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन से बातचीत में आतंकवाद का मुद्दा उठा और यह संयुक्त प्रेस वार्ता में भी सामने आया। पुतिन ने आतंकवाद पर संघर्ष में भारत के साथ देने का वायदा किया। रूस ने यह भी साफ किया कि पाकिस्तान के साथ साझा सैन्य अभ्यास का मकसद भारत के हितों के खिलाफ नहीं था बल्कि पाक में पनप रहे आतंकवाद से निपटने के लिए एक प्रशिक्षण का हिस्सा था। रूस के अनुसार, ऐसा करके उन्होंने पाकिस्तानी सेना को यह सिखाया कि आतंक के खिलाफ कैसे लड़ें। यह उनका स्पष्टीकरण है हम मानें या न मानें, कम से कम उन्होंने इतना तो स्पष्टीकरण दिया। यही नहीं जो सूचना आई पुतिन ने मोदी को आश्वासन दिया कि वे पाकिस्तान को किसी भी तरह का लड़ाकू विमान या उससे संबंधित उपकरण नहीं बेचंेगे। रूसी रक्षा कंपनी रोस्टेक स्टेट कॉरपोरेशन के सीईओ सर्गेई चेमेझोव के मुताबिक, किसी भी तरह के लड़ाकू विमान देने संबंधी करार पर पाक-रूस के बीच दस्तखत नहीं हुए हैं। चेमेझोव की मानें तो पाक को रूस लड़ाकू विमान ही नहीं, बल्कि किसी भी तरह के सैन्य उपकरण नहीं बेच रहा है। किन्तु ऐसा ही आश्वास चीन से मिला हो यह लगता नहीं। हां, प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शि जिनपिंग से बातचीत में मसूद अजहर पर प्रतिबंध से लेकर पाकिस्तान के आतंकवाद निर्यात करने पर खुलकर बात रखी।

मोदी-जिनपिंग की मुलाकात के बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने जो जानकारी दी उसके अनुसार दोनों नेताओं ने आतंकवाद पर अहम चर्चा की और इस बात पर राजी हुए कि इससे मुकाबले के लिए साझा कोशिशें बढ़ाने की जरूरत है। चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि दोनों देशों को सुरक्षा डायलॉग और साझेदारी को मजबूत करना चाहिए। दोनों देशों के बीच की समानताएं हमारे मतभेदों को कम कर सकती हैं। तो भारत आगे मसूद अजहर पर प्रतिबंध के लिए चीन के साथ बातचीत जारी रखेगा, लेकिन इनसे हम आतंकवाद को चुनौती मानने की स्वीकृति के अलावा कोई और प्रगति नहीं मान सकते हैं। हां, इससे चीन को अहसास हो गया है कि आतंकवादी हमलों को लेकर भारत की मनःस्थिति पाकिस्तान के संदर्भ में क्या है। इसका कुछ असर हो सकता है।

कुल मिलकार देखें तो ब्रिक्स सम्मेलन का भारत उसके मूल लक्ष्यों पर कायम रहते हुए भी आतंकवाद विरोधी एवं पाकिस्तान को अलग-थलग करने की अपनी वर्तमान कूटनीति के अनुरूप सभ्य और शालीन तरीके से जितना बेहतर उपयोग कर सकता था किया है। इसकी गूंज इन चारों देशों के साथ बिम्स्टेक एवं दुनिया के अन्य देशों में भी गई होंगी। आखिर इतने महत्वपूर्ण देशों के नेता अगर एकत्रित होते हैं और वह भी ऐसी हालत में जब भारत का सर्जिकल स्ट्राइक या शल्य क्रिया सुर्खियों में है दुनिया के प्रमुख देशों का ध्यान आकर्षित होना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य में साफ किया कि आतंकवाद का खात्मा सदस्य देशों को लक्ष्य पूरा करने में मददगार साबित होगा। वैसे ब्रिक्स देशों के बीच एक समझौता हो चुका है जिसके अनुसार वे आतंकवाद पर एक दूसरे की मदद करेंगे, किंतु यह केवल समझौते तक सीमित है। हालांकि हमें यह मानकर चलना चाहिए कि ब्रिक्स या बिम्स्टेक की हमारे सीमा पार आतंकवाद के मामले में सीमाएं हैं। यह लड़ाई हमें खुद लड़नी है लेकिन उस लड़ाई में ब्रिक्स का कोई देश विशेषकर चीन और रूस बाधा न बने अपनी कूटनीति से यदि हम इतना प्राप्त कर लेते हैं तो यही बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। गोवा सम्मेलन इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा ऐसी उम्मीद की जा सकती है।