झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि झारखंड में मतान्तरण का धंधा नहीं चलेगा। भोले-भाले जनजातियों को सब्जबाग दिखाकर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। भारतीय संविधान में भी कहा गया है कि लोभ, लालच या भय से मतान्तरण नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि हम सभी को संविधान की भावना का आदर करना चाहिए। महात्मा गांधी ने भी जीवन पर्यंत मतान्तरण का विरोध किया था। कुछ लोग पर्दे के पीछे रहकर धर्म परिवर्तन का खेल खेल रहे हैं। ऐसे लोगों को उन्होंने सचेत भी किया।

इक्कीसवीं सदी में भी मतान्तरण राग बहुत कम लोगों को पचेगा किंतु झारखंड जैसे राज्य में यह एक गंभीर समस्या है। मतान्तरण का हौवा कुछ अजीब सा लगता है, लेकिन यह सच भी है। अल्पसंख्यक समुदायों में एक खास वर्ग इसमें शुरू से दिलचस्पी लेता रहा है। झारखंड में यह सिलसिला एक सदी से भी पहले से चल रहा है। कहा भी गया है कि किसी देश को काबू में करना हो तो पहले उसकी संस्कृति पर हमला करो, उसे अपने में मिला लो। धर्म का संस्कृति से गहरा रिश्ता होता है। यह प्रक्रिया राजनीति को खूब प्रभावित करती है। इस स्थिति में मतान्तरण पर राजनीतिक क्रिया-प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। यही कारण है कि राज्य सरकार इस मसले पर उबली हुई है।

जनजातियों में चर्च का कार्य तेजी से फैल रहा है, जो जनजाति समाज ईसाइयत की ओर आकर्षित हो रहे हैं, धीरे-धीरे उनकी दूरी दूसरे जनजाति समाज से बढ़ रही है और आज हालात ऐसे हो गए हैं कि ईसाई जनजाति और गैर ईसाई जनजाति के बीच के संबध समाप्त होते जा रहे हैं। ईसाई मिशनरियों पर कन्वर्जन के गंभीर आरोप लगते रहे हैं, मुस्लिम और सिख समुदाय भी उनकी कन्वर्जन की गतिविधियों के विरोध में स्वर उठाते रहे हैं। ईसाई मिशनरियों पर विदेशी धन के बल पर भारतीय गरीब जनजातियों को ईसाई बनाने के आरोप भी लगते रहे हैं और इस सचाई को भी नहीं झुठलाया जा सकता कि झारखंड में चर्च के अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। हालही में अपने झारखंड प्रवास के दौरान यह साफ देखा कि गांवों में  कैथलिक और गैर कैथलिक ईसाई मिशनरी और पादरी जनजाति समाज का कन्वर्जन करने में लगे हुए हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री ने कहा कि ईसाई मिशनरी और पादरी जवाब दें कि जितने लोगों का मतान्तरण कराया है, क्या उनके जीवन में कोई बदलाव आया है। मुख्यमंत्री ने भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भी मतान्तरण का मुद्दा उठाते हुए कहा कि दरअसल सरना समाज जाग रहा है, तो कुछ लोगों के पेट में दर्द होने लगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि चंगाई सम्मेलन का गोरखधंधा लंबे समय से चल रहा है। पानी पिलाकर कैंसर ठीक करने का दावा किया जाता है। जब पानी पीने से इस जटिल रोग का इलाज हो जाता है, तो इतने हॉस्पिटल क्यों खोले जा रहे हैं?

आज झारखंड के जनजाति अन्य जाति-समुदायों से काफी पिछड़े और उपेक्षित हैं। लाखों की संख्या में जनजाति युवक-युवतियां दिल्ली और मुंबई में घरेलू नौकर-नौकरानी अथवा आया का काम कर रही हैं। केवल दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में ही आया का काम करने वालों में 92 प्रतिशत महिलाएं व युवतियां ईसाई हैं, जबकि गैर ईसाई जनजाति यानी सरना महिलाओं की संख्या मात्र 2 प्रतिशत है। इसका मतलब यह है कि ईसाई चर्च/मंडली की व्यवस्था व प्रणाली से जनजातियों को पूरी तरह आर्थिक एवं शैक्षणिक लाभ नहीं मिल रहा है जिसके कारण उन्हें शहरों की ओर जाना पड़ रहा है। 

अगर छोटा नागपुर क्षेत्र में जनजातियों के लिए रोजगार नहीं है और वे सुविधाविहीन हैं तो इसके लिए केवल सरकार और राजनेताओं को दोष नहीं दिया जा सकता। ईसाई धर्म विशेषकर कैथलिक चर्च के अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती थी कि वे अपने धर्म के सदस्यों के लिए आर्थिक सुविधाओं के साथ मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था करते, लेकिन यह जिम्मेदारी उन्होंने ढंग से नहीं निभाई। सच कहा जाए तो दलित-जनजातियों को विकास की राह पर लाने में चर्च के अधिकारी पूरी तरह असफल रहे हैं। चर्च का उद्देश्य सिर्फ ईसाइयों की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए।

ईसाई मिशनरी प्रलोभन देकर मतान्तरण कराते रहे हैं, जबकि यह हकीकत है कि लोभ-लालच में धर्म बदलने वालों की तकदीर हमेशा नहीं बदली है। सबसे बड़ी बात यह कि वे अपने समाज से तो कट जाते हैं, उधर जाने के बाद उनका ऊहापोह बढ़ जाता है। यह ऐसा मसला है, जो निहायत निजी भी है किंतु मनुष्य अपने किए पर अंदर ही अंदर पछताता भले हो लेकिन उसको यह संकोच भी होता है कि अब फिर वापसी पर समाज ताने मारेगा। चूंकि जनजातीय समुदाय अभी भी विकास और शिक्षा से दूर है और दूसरों को वह ललक भरी निगाहों से देखता है, इसलिए उस पर दबाव काम कर जाता है। इसको रोकने के लिए शासकीय प्रयास के सापेक्ष सामाजिक वातावरण का निर्माण अधिक आवश्यक है।