तो अमेरिकी चुनाव परिणामों ने ज्यादातर सर्वेक्षणों को गलत साबित कर दिया है। 19 में से केवल दो अंतिम सर्वेक्षणों में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप को डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन से आगे बताया गया था। चुनाव से दो दिनों पहले सभी बड़े चुनाव सर्वेक्षणों पर नजर रखने वाली रियल क्लियर पॉलिटिक्स ने हिलेरी की औसत बढ़त को घटाया जरुर था लेकिन कहा था कि अभी भी ट्रंप पर उनकी 1.6 प्रतिशत की बढ़त है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने नेट सिल्वर के पोल्स ओनली मॉडल से बताया कि हिलेरी के जीतने की संभावना 67.8 फीसद है। हफिंगटन पोस्ट ने हिलेरी की जीत की संभावना 97.9 फीसद बताई है। प्रिंसटाउन इलेक्शन कंसोर्टियम का भी मानना था कि ट्रंप के मुकाबले हिलेरी की जीत की संभावना काफी ज्यादा है। जाहिर है, इन सारे सर्वेक्षणों ने सम्पूर्ण जनता के नब्ज को समझने में भूल की है। हिलेरी की पराजय एवं ट्रंप की विजय का अर्थ है कि अमेरिकी जनमानस में व्यापक परिवर्तन आ चुका है। स्वयं को विवेकशील मानने वाले ज्यादातर लोग मानते थे कि अमेरिका के लोग इतने समझदार हैं कि वे एक अतिवादी और नस्ली सोच रखने वाले डोनाल्ड ट्रंप को देश का सर्वोच्च पद और सेना का सर्वोच्च कमान नहीं दे सकते। उन सबकी यह सोच गलत साबित हुई है।
वास्तव में हिलेरी क्लिंटन की पराजय एवं ट्रंप की विजय कोई सामान्य घटना नहीं है। कुछ लोग इस दृष्टि से देखेंगे कि 1789 से शुरू हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के 227 वर्ष के इतिहास में पहली बार किसी पार्टी की प्रत्याशी बनी महिला सर्वोच्च पद पर पहुंचने से चूक गई। अमेरिका ने बराक ओबामा के रूप में एक अश्वेत को पहली बार राष्ट्रपति बनाकर इतिहास रचा था। अब उसके सामने एक महिला को निर्वाचित कर इतिहास बनाने का अवसर था। कहने वाले कह सकते हैं कि अमेरिकियों ने यह अवसर गंवा दिया। किंतु अमेरिकी मतदाताओं का बहुमत दूसरी दिशा में ही सोच रहा था। इसीलिए जैसे-जैसे सर्वेक्षण एजेंसियां हिलेरी को आगे बताने लगीं अमेरिकी मतदाताओं का बड़ा वर्ग आक्रामक हो गया। जिस तरह से आरंभ में ही लोगों ने मतदान का रिकॉर्ड तोड़ा उससे साफ था कि अमेरिका नया करवट लेने वाला है जो कईयों को भौचक्क कर देगा। हालांकि हिलेरी खेमे को धीरे-धीरे यह लगने लगा था कि ट्रंप की लोकप्रियता बढ़ रही है। इसलिए स्वयं राष्ट्रपति बराक ओबामा एवं उनकी पत्नी मिशेल ओबामा ने सामान्य से ज्यादा आम सभाएं कीं। हिलेरी को सबसे योग्य, अनुभवी एवं देश के सर्वोच्च पद के लिए एकमात्र उपुयक्त साबित किया। ट्रंप को लेकर भय पैदा करने की कोशिश की। उनका असर भी हुआ होगा लेकिन इतना नहीं हुआ कि ट्रंप की बढ़ती लोकप्रियता में कमी आ जाए। 

दोनों उम्मीदवारों के बीच हुई तीनों बहस में यह माना गया कि ट्रंप पराजित हो गए हैं। लेकिन यह निष्कर्ष सही नहीं था। ट्रंप की बातों से थोड़ी अशालीनता की बू आती थी। मसलन, उन्होंने हिलेरी पर निजी हमले तक किए। उनके प्रति बिल क्लिंटन पर प्रश्न उठा दिए। यहां हिलेरी को रक्षात्मक होना पड़ा। उनके विदेश मंत्री रहते समय निजी ईमेल का प्रश्न उठाकर कह दिया कि अगर वे राष्ट्रपति बने तो उनकी जगह जेल में होगी। उनको नास्टी वूमैन तक कह दिया। राजनीति में निजी हमलों को सभ्य समाज अच्छा नहीं मानता। लेकिन यह हमारा आपका निष्कर्ष था। मतदान करने वालों का बहुमत दूसरी दिशा में सोचता था। ऐसा नहीं था कि हिलेरी खेमे ने ट्रंप के खिलाफ महिला मुद्दों को प्रमुखता देने की कोशिश नहीं की। 40 महिलाओं ने तो ट्रंप के चरित्र पर प्रश्न उठा दिया था। इसे उनके खिलाफ मुद्दा बनाया गया। नैस्टी वुमन कहे जाने के बाद से टीम हिलेरी ने अपना अभियान महिलाओं की ओर शिफ्ट कर दिया। ट्रम्प के महिलाओं के खिलाफ सेक्सी कमेंट्स, महिलाओं से उनके रिश्ते और उनका बर्ताव मुद्दा बन गया था। महिलाओं को लुभाने के लिए हिलेरी का खास अभियान... वुमन टू वुमन फोन बैंक जैसे ड्राइव चलाए गए। सप्ताहांत में सैकड़ों रैलियां की गईं। इसके बाद से कैट पेरी जैसी हस्तियां टी-शर्ट कैम्पेन कर रही थीं, जिस पर नैस्टी वुमन लिखा हुआ था। आय एम विद नैस्टी वुमन हिलेरी के सबसे हिट अभियानों में से एक था। ध्यान रखिए अमेरिका में कुल 21 करोड़, 89 लाख, 59 हजार मतदान के काबिल हैं। इसमें 14 करोड़, 63 लाख, 11 हजार लोग रजिस्टर्ड हैं। रजिस्टर्ड मतदाताओं में 69.1 प्रतिशत पुरुष और 72.8 प्रतिशत महिलाएं हैं। यानी महिलाओं की संख्या ज्यादा है। वो किसी का समर्थन कर दें तो उसका जीतना तय है। तो कहा जा सकता है कि हिलेरी महिलाओं के खिलाफ ट्रंप की टिप्पणियों को अपने पक्ष में भुनाने में सफल नहीं रहीं। जो सर्वेक्षण आ रहे हैं उनके अनुसार श्वेत महिला मतदाताओं के बहुमत ने ट्रंप के पक्ष में मतदान किया।

यह भी हमें आपको आश्चर्य में डाल सकता है क्योंकि ऐसा लगता था कि महिलाएं उनकी टिप्पणी से नाराज हो कई होंगी। किंतु

“डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में मुख्य दो बातें गईं- आतंकवाद के विरुद्व खरी-खरी बात करना तथा अमेरिकियों के अंदर महाशक्ति राष्ट्रवाद का भाव पैदा करना।”
 

वास्तव में उन्होंने अमेरिकियों में नए सिरे से अमेरिकी राष्ट्रवाद का एक भाव पैदा किया था जिसमें अमेरिका को फिर से दुनिया का ऐसा महान राष्ट्र बनाने का वायदा था जो वास्तविक महाशक्ति होगा तथा जिसकी दुनिया के देश कई कारणों से इज्जत करेंगे और टकराने या विरोध करने की हिम्मत नहीं करेंगे। महाशक्ति की गिरती महिमा के बीच इस भावना ने अमेरिकियों के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया। इस समय जेहादी आतंकवाद ने जिस तरह दुनिया भर में भय पैदा किया हुआ है उससे अमेरिका अछूता नहीं है। 11 सितंबर, 2001 के बाद से ही अमेरिकी अपनी भौगोलिक सीमाओं में सुरक्षित होते हुए भी हर क्षण हमले के भय के मनोविज्ञान में जीते हैं। इराक से लेकर अफगानिस्तान में अमेरिकियों को आतंकवाद की बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसमें ट्रंप ने अभी तक के सभी नेताओं से अलग मत व्यक्त किया। जब वे रिपब्लिकन उम्मीदवार के रूप में सामने आए और मुसलमानों के खिलाफ बोलना आरंभ किया तो लोगों ने उनको गंभीरता से नहीं लिया। आतंकवाद की चर्चा करते हुए अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की बात की तो लगा कि कोई फासिस्ट ताकत अमेरिका में खड़ा हुआ है जिसे उसकी पार्टी ही पराजित कर देगी। लोग ऐसा सोचते रहे और वो लगातार ऐसे बयान देकर सुर्खियां और समर्थन पाते रहे। प्राइमरी में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई और यह ज्यादातर विश्लेषकों के लिए हैरत का क्षण था जब उन्होंने उम्मीदवारी जीत ली।

ट्रंप का रिपब्लिकन उम्मीदवार बनना ही बदले हुए अमेरिका का प्रतीक था। वही बदला हुआ अमेरिका परिणाम के रूप में भी दिखा है। यह सामान्य बात नहीं है कि अमेरिकी भारतीयों के बड़े समूह ने ट्रंप के पक्ष में मतदान किया। हालांकि चुनाव परिणाम के पीछे कुछ विश्लेषक आर्थिक मुद्दों को भी महत्वपूर्ण मान रहे हैं। आर्थिक मुद्दे अमेरिकी चुनाव में हमेशा भूमिका निभाते हैं। ओबामा घोर मंदी के बीच निर्वाचित हुए थे और उनने अमेरिका को इससे उबारने की पूरी कोशिश की लेकिन जितनी सफलता उनको मिलनी चाहिए परिस्थितियों के कारण नहीं मिली। यहां भी ट्रंप ने अमेरिका के लिए एक नए आर्थिक राष्ट्रवाद की उग्र वकालत की। मसलन, उन्होंने महाशक्ति अमेरिका को कमजोर करने के लिए ओबामा सरकार को जिम्मेवार ठहराया। उन्होंने कहा कि भारत जब 8 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है तो फिर अमेरिका क्यों नहीं कर सकता। उन्होंने आईबीएम जैसी कंपनियों को धमकी दी कि उसने अपना काम भारत में ज्यादा स्थानांतरित कर दिया है। अगर वो राष्ट्रपति बने तो उस पर भारी कर जुर्माना लगाएंगे। यह वहां के बेरोजगार या रोजगार तलाशते युवाओं के लिए आकर्षक साबित हुआ। यहां भी अगर गहराई से देखेंगे तो आपको ट्रंप के समर्थन पाने के पीछे एक आक्रामक आर्थिक राष्ट्रवाद दिखेगा।

इस तरह कहा जा सकता है कि ट्रंप की विजय ने हमें एक ऐसे अमेरिका का अहसास कराया है जिससे किंचित भय एवं आशंका पैदा होती है। ट्रंप की नीतियों के बारे में कोई भविष्यवाणी करना जोखिम भरा होगा। हालांकि उन्होंने कहा है कि मैं सभी अमेरिकियों का राष्ट्रपति होउंगा और सब साथ मिलकर अपने महान देश को और महान बनाएंगे। किंतु इसके लिए हमें उनके शपथग्रहण के बाद उठाए जाने वाले कदमों का इंतजार करना होगा।