हर मुसलमान का यकीन है-

  1. कुरान मजीद का हर शब्द सच है।
  2. अल्लाह ताला कुरान मजीद की हिफाजत का जिम्मेदार है।
  3. दीन-ए-इस्लाम मुकम्मल हो चुका है।
  4. कुरान मजीद –

पारा 2, सूरत नम्बर 2 - सूरा-ए-बक़र - आयत नम्बर 227 से 237

पारा 4, 5 सूरतुलनिसां - आयत नम्बर 34, 35

पारा 28, सुरतुलतलाक - आयत नम्बर 1 से 12

कुरान और सहही हदीस ही मुसलमान का ईमान है।

कुरान मजीद में अल्लाह ताला ने तलाक लेने का तरीका साफ-साफ बयान फरमा दिया है। अल्लाह ने औरत और मर्द की हदें मुकर्रर कर दी हैं। औरत के पाक होने (पिरियड्स) के बाद पहली बार तलाक देने/कहने के बाद 30 दिन की अवधि (इद्दत), दूसरी बार तलाक कहने पर 30 दिन की अवधि (इद्दत) और तीसरी बार तलाक कहने के बाद 30 दिन की अवधि (इद्दत) मुकर्रर फरमायी है। आधुनिक मेडिकल साइंस की रोशनी में यह स्पष्ट होता है कि इस अवधि में औरत के गर्भ अवस्था का स्पष्ट पता चल जाता है ताकि आने वाली संतान को विपरीत परिस्थितियों से बचाया जा सके तथा इस 90 दिनों की अवधि में यदि सुलह का रास्ता निकल जाता है तो सबसे अच्छी बात। इस अवधि में दोनों पक्षों की तरफ से वकील/बुजुर्ग मुकर्रर करके समझौता करवाने का स्पष्ट निर्देश मालिक ने दिया है।

किसी भी सूरत में यदि साथ रहना संभव नहीं हो और परिस्थितियां इतनी विकट हो जाएं कि पति-पत्नी के साथ रहने पर रोजाना झगड़े/हिंसा या जघन्य अपराध (हत्या या हत्या का प्रयास) होने की संभावना बनी रहे तो इससे अच्छा है कि दोनों खुशी से अलग हो जाएं। लेकिन मालिक ने ऊपर लिखी आयतों में यह भी स्पष्ट निर्देश दिया है कि यदि दोनों साथ रहने का फैसला करते हैं तो भलाई के साथ और अगर अलग होते हैं तो भी भलाई के साथ।

पुरुष/पति को पूरा मेहर चुकाना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त जो कुछ दहेज में स्त्री को मिला वह लौटाना तथा जो कुछ पति ने अपनी पत्नी को चल/अचल सम्पत्ति के रूप में दिया है वह कुल स्त्रीधन पत्नी के पास ही रहेगा। बच्चों की पूरी जिम्मेदारी बाप की होगी यदि कोई बच्चा दूध पी रहा है और उसका बाप चाहता है कि उसकी माँ ही उसे दो साल तक दूध पिलाएं तो उसका सारा खर्चा/मुआवजा भी बाप के जिम्मे रहेगा।

हदीस की रूह से भी एक साथ तीन बार तलाक कह देना गुनाह है। जो लोग यह गुनाह करते हैं उनके लिए 22 मुस्लिम देशों ने सजा मुकर्रर कर दी है। इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान में 1961 में यह कानून लागू कर दिया गया कि जो व्यक्ति/पति अपनी पति को एक साथ तीन बार तलाक देता है तो उसे एक साल की सजा और पांच हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

हराम है हलाला

तलाक जैसे घृणित काम को रोकने के लिए एक ड़र मुकर्रर किया गया है जिसे हलाला कहा गया है। तलाक के बाद इद्दत पूरी होने के बाद औरत अपनी मर्जी से दूसरी शादी करने को स्वतन्त्र है, परन्तु यदि पहला पति उस औरत से दोबारा निकाह करना चाहे तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह औरत पहले किसी और से निकाह/शादी करे/शारीरिक संबंध स्थापित करे, इसके बाद दूसरे शौहर से तलाक लेकर इद्दत (90 दिन) पूरी करे, इसके पश्चात् ही वह पहले शौहर से दोबारा शादी कर सकती है। लेकिन इस शर्त के साथ की दूसरा पति उसे तलाक दे देगा और वह दोबारा पहले पति/शौहर से शादी कर लेगी शर्त के साथ हलाला करना, इस्लाम में हराम करार दिया गया है।

ऊपर लिखी गई कुरान मजीद की आयतों और हदीस वगैरह की रोशनी में 22 मुस्लिम देशों में एक साथ तीन बार तलाक कह देने को गुनाह माना है और इसके लिए सजाऐं मुकर्रर कर दी गई हैं, लेकिन हिन्दुस्तान में बैठे दीन के ठेकेदार/संस्थाएं या मजहब के स्वयंभू नेताओं ने मुस्लिम महिलाओं/बहनों/बेटियों की भलाई के लिए एक भी शब्द क्यों नहीं बोला? यह कथित ठेकेदार कम से कम मुस्लिम महिलाओं/बहनों/बेटियों की भलाई के लिए इस पर विचार-विमर्श कर सकते थे तथा कम से कम सरकार को अपना सुझाव दे सकते थे, परन्तु यह कथित स्वयंभू ठेकेदार केवल अपनी राजनैतिक स्वार्थ को देखते हुए चुप रहे और मजबूर होकर भारतीय मुस्लिम महिलाओं/बहनों/बेटियों को अदालत के दरवाजे खटखटाने पड़ रहे हैं। इस स्थिति के लिए ये ठेकेदार स्वयं जिम्मेदार हैं। समाज इन्हें कैसे माफ कर सकता है?