भोपाल के केंद्रीय करागार से दीपावली के शोर-शराबे का लाभ उठाकर भागे आठों आतंकियों को आठ घंटे के भीतर ढेर जरूर कर दिया, लेकिन मध्यप्रदेश की जेलों की सुरक्षा पर बड़े सवाल अनायास ही उठ गए? ये सभी खुंखार आतंकी प्रतिबंधित छात्र संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी सिमी के सदस्य थे। इंडियन मुजाहिदीन से भी इनका नाता था। दीपावली की आधी रात के बाद इन्होंने मध्यप्रदेश की उस सबसे सुरक्षित जेल के तालों और दीवारों में सेंध लगा दी, जिसका परिसर चौबीसों घंटे इलेक्ट्रोनिक आंखों की निगरानी में रहता है। इस्लामिक आतंकी दर्शन पर अमल करते हुए भागने में बाधा बनने वाले जेल प्रहरी रमाशंकर यादव की खाने-पीने के इस्पात के बर्तनों से बनाए धारदार हथियार से गला रेत कर हत्या कर दी और दूसरे प्रहरी चंदन तिलकने को बांधकर एक कोने में पटक दिया। इसके बाद ओढ़ने-बिछाने की चादरों का इस्तेमाल कर जेल की 20 फीट ऊंची दीवार लांघकर फरार हो गए। यह अलग बात है कि इनकी फरारी की खबर मिलते ही प्रदेश की पुलिस और उसके आतंकवाद विरोधी दस्ते ने दिवाली के उत्सवी माहौल की खुमारी से मुक्त होकर फौरन इन्हें धरपकड़ की कमान संभाली और चौतरफा घेराबंदी करके आठों को मार गिराया। लेकिन इस घटनाक्रम में जहां सफलता हाथ लगी, वहीं विफलता के छिद्र भी देखने में आए हैं। इस घटनाक्रम में कांग्रेस जिस तरह से आतंकवादियों के लिए आंसू बहाती सवाल खड़े कर रही है, वह जरूर सोच से परे है।

यदि इन आतंकियों का काम तमाम नहीं हुआ होता तो पूरे देश में संकट के बादल मंडरा रहे होते। इस लिहाज से इनका यही हश्र देशहित में था। जनता ने भी इनकी मौत से राहत अनुभव की है। बावजूद इस मामले ने, न केवल जेलों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं, वरन नौकरशाही की लापरवाही और जेलकर्मियों की मिलीभगत व विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे हैं। भारत की शीर्षस्थ नौकरशाही आतंक पर नियंत्रण के लिए देश-दुनिया से प्रशिक्षण ले चुकी है। बावजूद आतंकियों का यह मनोविज्ञान समझने में भूल हुई है कि आतंकी दीपावली के उत्सवी वातावरण और पटाकों के विस्फोट का फायदा उठाकर जेल तोड़ने का चक्रव्यूह रच सकते हैं? दिवाली की रात ऐसी भी होती है कि वातावरण बारूद के धुएं से भरा होता है और चीख-पुकार की अवाजें पटाखों के शोर में डूब जाती हैं। इसलिए हत्या के वक्त जेल प्रहारी चीखा भी होगा तो उसकी अवाज जेल के बाहर पहरा दे रहे अन्य पहरेदारों ने नहीं सुनी होगी।

इन आतंकियों पर चौकस नजर रखना इसलिए भी जरूरी थी, क्योंकि इनमें से तीन आतंकी तीन साल पहले 2013 में दिवाली की रात ही खण्डवा जेल तोड़कर भाग निकले थे। यहां से नौ दो ग्यारह होने के बाद कई बम विस्फोट किए, बैंक लूटे और आतंक रोधी दस्ते के पुलिसकर्मियों की हत्याएं कीं। ये नए युवा आतंकियों की भर्ती प्रक्रिया में भी लगे थे। कई भाजपा नेताओं की हत्या करने के शड्यंत्र रच रहे थे। इसलिए जेल से भाग निकलने के बाद जब ये आतंकी खेजड़ादेव गांव पहुंचने पर ग्रामीणों द्वारा खदेड़े जाने के बाद मनीखेड़ी पहाड़ी पर पहुंचे तो इनमें से एक आतंकी ने कहा भी कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले लगकर आत्मघाती के रूप में उनकी हत्या करना चाहता है। साफ है, मध्य प्रदेश पुलिस ने न तो खंडवा की घटना से कोई सबक लिया और न ही आतंकियों के मनोविज्ञान को समझने के लिए कोई अध्ययन किया।

यहां सवाल यह भी उठता है कि आतंकियों के जेल से बाहर आते ही इन्हें नए कपड़े-जूते और हथियार कहां से मिले? इन्हें मौत के घाट उतारने के बाद जब इनकी जेबों की तलाशी ली गई तो उनमें सूखे मेवे भरे थे। मसलन उन्होंने इस बात का पूरा इंतजाम किया हुआ था कि उन्हें कुछ दिन निर्जन स्थलों पर गुजरना पड़े तो भी भोजन का संकट पैदा न हो। उन्हें ये सामग्रियां कहां से मिलीं? क्या जेल के किसी विभीषण रूपी भेदी ने ही लंका ढहाने का काम किया या फिर उनके पास मोबाइल जैसी सुविधा थी, जिसके जरिए उन्होंने जेल के इर्द-गिर्द अपने रहनुमाओं को सामान समेत बुला लिया? यदि आतंकियों के पास मोबाइल थे तो ये बिना जेलकर्मियों के मिलीभगत के न तो जेल में पहुंच सकते हैं और न ही इनसे बात संभव हो सकती है? जाहिर है,  जेल के कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व आतंकियों से मिले थे। गोया, मध्यप्रदेश की जेलें चाहे जितनी भी आधुनिकतम इलेक्ट्रोनिक और लौह-कवचों से क्यों न ढंकी हों, जब घर में ही विभीषण होंगे तो उनकी सुरक्षा कैसे होगी?

देश में सिमी अप्रैल, 1977 में अस्तित्व में आया था। कुछ समय तक इसकी गतिविधियां इस्लामी छात्र संगठन का मुखौटा लगाएं रहीं। बाद में इसे ‘जमात-ए-इस्लामी हिंद’ की छात्र इकाई माना जाता रहा। लेकिन कई मामलों में सिमी ने अपने कारनामों से जमात को खफा कर दिया। नतीजतन दोनों के रास्ते बंट गए। गौरतलब है कि सिमी यासर अराफात को पश्चिम की कठपुतली मानता था। इसीलिए जब अराफात 1981 में भारत आए तो सिमी ने उन्हें काले झण्डे दिखाकर विरोध जताया था। इसके उलट जमात-ए-इस्लामी यह मानता रहा कि अराफात फिलस्तीनियों के संघर्ष के नायक थे। बाद में सिमी के युवा अनुयायी धार्मिक चरमपंथियों के उकसावे में आ गए और आतंक की राह पकड़ ली। भारतीय लोकतंत्र, संविधान और धर्मनिरपेक्षता को इन्होंने इस्लाम के खिलाफ मान लिय। शुरू में यह संगठन केवल कट्टरपंथी रहा, लेकिन कालांतर में धर्म का अफीमी नशा ऐसा चढ़ा कि इसने आतंकी गुट इंडियन मुजाहिदीन से अपना रिश्ता जोड़ लिया। इसके बाद सिमी के आतंकियों ने कई आतंकी वारदातों को अंजाम दिया। अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड टावर पर जब आतंकी हमला हुआ, तब कहीं जाकर भारत में सितंबर 2001 में राजग सरकार ने इसे आतंकी संगठन घोषित करने की हिम्मत जुटाई।

अब दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, मोहन प्रकाश, अरविन्द केजरीवाल और एआईएमआईएम के स्वयंभू असददुद्दीन औवेसी ने मुठभेड़ पर सवाल और व्यक्ति के मानवाधिकारों की पैरवी की है। ये कुशंकाएं नेताओं के लिए राजनीतिक रोटियां सेंकने जैसी तो हैं ही, आतंकियों की हौसला-अफजाई करनेवाली भी हैं। यह छींटाकशी राष्ट्रहित को परे रखते हुए वोट-बैंक को भुनाने जैसी है। वहीं दिल्ली स्थित जवाहरलाल विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भी वहां के कांग्रेस व कम्युनिस्ट समर्थक छात्रों ने आतंकियों के एनकाउंटर को लेकर विरोध प्रदर्शन किए। मुठभेड़ को फर्जी घोषित करने वालों को यह चिंता नहीं हुई कि ये आतंकी उस जेल प्रहरी की हत्या कर भागे हैं, जो अपने उत्तरदायित्व का ईमानदारी से निर्वहन कर रहा था। यहीं नहीं, वह अपनी बेटी के हाथ पीले करने के सपने भी संजोए हुए था। ऐसे में मानवाधिकारों का हनन प्रहरी और उसके अनाथ हो गए परिजनों का हुआ है, न कि आतंकियों का? ये आतंकी तो पहले ही कई आतंकी हरकतों को अंजाम देकर मानव विरोधी काम कर चुके हैं। ऐसे आतंकियों के हित में घड़ियाली आंसू बहाने के बयानों का देश के लोकतंत्र और संविधान से कोई सरोकार नहीं हैं।

इसके बजाय यदि यही नेता आतंकी तत्वों के खिलाफ चल रहे मुकादमों के निराकरण की मांग को प्राथामिकता देते तो इसे जायज ठहराया जा सकता था। यह भी सवाल उठाया जा सकता था कि इन आठ आतंकियों को एक ही जेल के एक बैरक में क्यों रखा गया? इस लापरवाही से इन्हें षड्यंत्र रचने का अवसर मिला और वे सफल भी हुए। साफ है हमारे यहां आतंकियों से कारगर ढंग से निपटने की कोई नीति ही नहीं है। उन्हें कौनसी जेलों में कैसे रखा जाए, यह सवाल तो अपनी जगह दशकों से बदस्तूर है ही, साथ ही उनके विरुद्ध चल रहे मुकदमे जल्द से जल्द अंतिम परिणाम तक पहुंचें, यह सवाल भी अपनी जगह कायम है। हालांकि हमारे यहां विशेष अदालतों का इंतजाम है। बावजूद मामले लंबित बने रहते हैं। यदि फैसला हो भी जाए तो मृत्युदंड मिलने पर क्षमा यचिकाएं राष्ट्रपति के यहां लंबे समय तक पड़ी रहती हैं। इसलिए विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों को आतंकियों की ढाल बनने की बजाय, ऐसी नीतियां बनाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए, जिससे आतंकियों से जुड़े मामले जल्दी निपटें। हमारी न्यायापालिका निष्पक्ष है, इसलिए साक्ष्यों के अभाव में अनेक दुर्दांत आतंकी बरी भी हुए हैं। यही उनके वास्तविक मानवाधिकार हैं।