इस समय भले किसी तरह सपा के अंदर के संघर्ष को शांत कर दिया जाए, लेकिन जिन कारणों से यह इतने बड़े बवण्डर में परिणत हुआ उसे देखते हुए मानना कठिन है कि शांति स्थायी हो सकती है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एवं शिवपाल सिंह यादव दोनों कह रहे हैं कि नेता जी जो कहेंगे, करुंगा। नेताजी पूरा भाषण देकर अखिलेश यादव को कहते हैं कि शिवपाल के गले मिलो, वे गले मिलने की वजह उनका पैर छूते हुए कह देते हैं कि आप मेरे खिलाफ साजिश करते हैं, साजिश करना बंद कर दीजिए। तो यह कौन सा मिलन हुआ? उसके बाद जो हुआ वह दृश्य पूरे देश ने देखा। किस तरह अखिलेश ने अपने खिलाफ खबर छपवाने का अमर सिंह पर आरोप लगाया और उनसे माइक छीनकर शिवपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री झूठ बोल रहे हैं। इस छीनाछीनी में माइक तक टूट गया। इन घटनाओं से समझा जा सकता है कि इनके बीच दूरियां कितनी बढ़ी हुईं हैं। दोनों के समर्थकों में भीड़ंतों के जो शर्मनाक दृश्य हमने देखे उसके बाद यह कल्पना बेमानी है कि मुलायम सिंह के हस्तक्षेप से सब कुछ पुन: पूरी तरह ठीक हो जाएगा।

यह मानने में कोई हर्ज नहीं है कि अगर सपा में विभाजन नहीं हुआ है तो उसका कारण केवल मुलायम सिंह हैं। अखिलेश नहीं चाहते उनपर पिता के खिलाफ विद्रोह कर पार्टी तोड़ने का तोहमत लगे। अगर मुलायम सिंह इस समय सक्रिय रहने की स्थिति में नहीं होते तो वे ऐसा कर चुके होते। हालांकि जो सूचना है उन्होंने एक समय अलग होकर चुनाव लड़ने का मन बना लिया था। कुछ दलों से उनने बातचीत भी की थी। लेकिन भारतीय संस्कार में पिताद्रोही के लांछन से बचने की सोच ने उनके कदम रोक लिए होंगे। इस समय पार्टी में अखिलेश के समर्थकों की संख्या सबसे ज्यादा है जो शक्ति प्रदर्शन के दौरान दिखा भी। मुलायम सिंह द्वारा विधायकों, सांसदों, पूर्व विधायकों की बैठक के एक दिन पहले अपने आवास पर बैठक बुलाना प्रकारांतर से उनका शक्ति प्रदर्शन ही था। उसमें जितनी संख्या में विधायक एवं नेता पहुंचे उससे शिवपाल के सामने भी तस्वीर साफ हो गई होगी। शिवपाल ने पार्टी के लिए जितना काम किया हो, लेकिन इस समय उनकी ताकत केवल मुलायम सिंह हैं। अगर मुलायम सिंह हट जाएं तो अखिलेश की तुलना में शिवपाल को पूछने वालों की संख्या गिनी-चुनी होगी।

इसका कारण दो ही है। अखिलेश के हाथों सत्ता है और सत्ता के साथ ज्यादा लोग रहते हैं। दूसरा, वे मुलायम सिंह के पुत्र हैं और उन्होंने 2012 में स्वयं मुलायम ने ही उनको मुख्यमंत्री तथा बाद में प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। अखिलेश ने अपने स्वभाव से भी नेताओं-कार्यकर्ताओं का दिल जीता है और वह भी एक कारण हो सकता है। हालांकि नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए शिवपाल कहीं ज्यादा उपलब्ध रहते हैं, पर उनके साथ ये दो बातें नहीं है। इस समय सपा में मुलायम सिंह के बाद अखिलेश सर्वाधिक स्वीकृत नेता है। किंतु उनको लगता है कि इस समय हमने पार्टी तोड़ी तो लोग यह कह सकते हैं जो अपने बाप का नहीं हुआ वह लोगों का क्या होगा। जाहिर है, सपा एक पार्टी के रूप में केवल मुलायम सिंह के रहते ही जीवित है। मुलायम सिंह ने शिवपाल बनाम अखिलेश की लड़ाई के अंत की जो कोशिशें की उससे समाधान की बजाय संकट ज्यादा बढ़ा। उदाहरण के लिए जब अखिलेश ने शिवपाल के सारे विभाग छीन लिए तो उन्होंने बिना अखिलेश को सूचित किए उन्हें अध्यक्ष पद से हटाकर शिवपाल को बना दिया। ऐसा किसी के साथ होगा तो वह कुछ समय के लिए आक्रोश में आ जाएगा। उन्होंने बरखास्त मंत्रियों को फिर से शपथ दिलवाई। अखिलेश ने इसे किया जरुर किंतु अंतर्मन से नहीं। 24 अक्टूबर की बैठक में उनको जितनी डांट लगाई मुलायम सिंह ने वह हम सबने सुना। बेटा होने के कारण ही वे सब सुनते रहे, अन्यथा किसकी हिम्मत थी अखिलेश को यह कहने कि तुम्हारी औकात क्या है... पद मिलते ही दिमाग बिगड़ गया...?

जो व्यक्ति यह कह रहा हो कि अमर सिंह के साथ जो होगा हम उसे नहीं छोड़ेंगे क्या वह पिता के यह कहने भर से बदल जाएगा कि अमर सिंह मेरे छोटे भाई हैं? वह केवल कुछ समय के लिए शांत हो सकता है। तो अमर सिह और शिवपाल यादव के साथ अखिलेश मानसिक रूप से इतने दूर हो गए हैं कि इनके बीच एकजुटता की संभावना तलाशाना व्यर्थ है। बस, मुलायम सिंह की उपस्थिति अखिलेश को मजबूर कर रही है। प्रश्न है कि अखिलेश को इस सीमा तक क्यों जाना पड़ा? कुछ तो इसके व्यावहारिक कारण हैं। मसलन, मुख्यमंत्री और पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष होते हुए भी सरकार एवं पार्टी दोनों जगह उनकी पूर्ण ऑथोरिटी कभी कायम नहीं हुई। शिवपाल भले कहते हों कि उन्होंने मुख्यमंत्री का सारा आदेश माना, पर व्यवहार में वे अखिलेश को अपना नेता मानने को तैयार हुए ही नहीं। मुलायम सिंह के वरदहस्त के कारण वे अपने तरीके से काम करते रहे और एक बड़ा गुट अपना खड़ा कर लिया। कुछ दूसरे मंत्री भी मुलायम सिंह का आदमी स्वयं को मानते रहे। अखिलेश इससे मुक्ति पाकर सरकार एवं संगठन दोनों पर अपनी पूर्ण ऑथोरिटी चाहते हैं और इसके लिए आवश्यक है कि ऐसे लोग या तो हटा दिए जाएं या फिर ये रास्ते पर आ जाएं। इसमें बीच के रास्ते की कोई गुजाइश नहीं है जैसा मुलायम सिंह चाहते हैं।

वैसे अखिलेश के इस तेवर और रवैये का बड़ा कारण इससे अलग है। दरअसल, वो सपा की कार्य और व्यवहार संस्कृति को भी बदलना चाहते हैं। 2012 के चुनाव के समय ही उन्होंने डीपी यादव के पार्टी में आने का विरोध कर अपना रुख जता दिया था। सपा की छवि आम लोगों के अंदर दबंगों, बदमाशों, अपराधियों के वर्चस्व वाली पार्टी की हो चुकी है। सपा में ऐसे कार्यकर्ताओं और नेताओं की बड़ी संख्या है जो अपने इसी गुण के कारण वहां टिके हैं। पुलिस प्रशासन भी इन पर हाथ डालना नहीं चाहता। अखिलेश यादव पार्टी को एक साफ सुथरी छवि देना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि सपा इन लोगों के हाथों से पूरी तरह निकलकर एक सामान्य पार्टी बने जिसमें हम आम राजनीतिक मुद्दों पर चुनाव लड़ सकें। तो यह पार्टी की स्थापित व्यवहार संस्कृति के खिलाफ उनका आंतरिक विद्रोह है। शिवपाल उस पुरानी धारा से आते हैं जिन्होंने देखा है कि चुनाव उन्हीं की बदौलत जीता जाता है। उनके लिए मुख्तार अंसारी का ‘कॉमी एकता दल’ एक असेट है जबकि अखिलेश के लिए यह पार्टी की छवि पर धब्बा होगा। इस तरह यह भी कह सकते हैं कि यह दो बिल्कुल अलग सोच की लड़ाई है। अगर अखिलेश इस लड़ाई को उसकी तार्किक परिणत तक ले जाने के प्रति ईमानदार हैं तो इसमें दो ही विकल्प है। या तो ऐसे सारे लोग पार्टी से अलग हो जाएं या अखिलेश उनसे अलग हो जाएं।

जरा, सोचिए इन कारणों में सुलह सफाई की गुंजाइश कहां है? कौमी एकता दल का विलय एक बार अखिलेश ने नकार दिया। शिवपाल ने अध्यक्ष बनते ही फिर विलय कर दिया और मुलायम सिंह कह रहे हैं कि ऐसा न होता तो 20 सीटें निकल जातीं, मुख्तार का परिवार सम्मानित है। क्या अखिलेश इसे दिल से स्वीकार करेंगे? बहरहाल, अभी हम आप सपा के आंतरिक संघर्ष पर नजर रखिए, लेकिन यह मानकर चलिए कि इसका मानसिक तौर पर विभाजन हो चुका है। औपचारिक विभाजन का ऐलान होने में समय लगेगा।