(25 नवम्बर, विश्व मांसाहार निषेध दिवस पर विशेष)

प्रतिवर्ष 25 नवम्बर को समूची दुनिया मांसाहार निषेध दिवस मनाती है। आखिर इस दिवस को मनाने की आवश्यकता क्यों हुई? मांसाहार के अनेक नुकसान सामने आ रहे हैं, तो कुछ लोग उसके फायदे भी कम नहीं मानते हैं। लेकिन शाकाहारी भोजन के गुणों को जानकर अब पाश्चात्य देशों में शाकाहार आन्दोलन तेज हो रहा है। अमेरिका में सलाद बार अत्यधिक लोकप्रिय हो रहे हैं। लेकिन जो सबसे बड़ा खतरा मांसाहार से सामने आया है वह है इससे ग्लोबल वॉर्मिंग का बढ़ना। यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है पर दोनों में गहरा संबंध है। खाने की थाली में सजा लजीज मांसाहार हमारे स्वास्थ्य पर चाहे जो प्रभाव डाल रहा हो लेकिन पर्यावरण पर तो इसका बहुत बुरा असर हो रहा है। आखिर निरीह जीवों की हत्या और आह से सना भोजन कैसे स्वास्थ्य एवं सौभाग्यवर्द्धक हो सकता है?

आज विश्व के हर कौने से वैज्ञानिक व डॉक्टर यह चेतावनी दे रहे हैं कि मांसाहार कैंसर आदि असाध्य रोगों को देकर आयु को क्षीण करता है और शाकाहार अधिक पौष्टिकता व रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है। फिर भी मानव यदि अंधी नकल या आधुनिकता की होड़ में मांसाहार करके अपना सर्वनाश करे तो यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।

पूरी दुनिया में नॉन वेज (मांसाहार) की संस्कृति के पनपने के अनेक कारण हैं लेकिन आर्थिक विकास और औद्योगीकरण ने मांसाहार को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विकासशील देशों ने विकास एवं तथाकथित पाश्चात्य आधुनिक जीवनशैली के नाम पर इसे अपनाया है। इन देशों में जैसे-जैसे आर्थिक विकास हो रहा है वैसे-वैसे मांस व पशुपालन उद्योग फल-फूल रहा है। लेकिन स्वास्थ्य एवं मानवीय दृष्टि से मांसाहार के पनपने से अनेक तरह की विसंगतियां एवं विषमताएं जीवन को अंधकारमय बना रही है। इसके बढ़ते प्रचलन से जहां प्राकृतिक अंसतुलन का खतरा है वहीं इसने मैड काऊ, बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू जैसी नई महामारियां पैदा की हैं। मांस उत्पादन में खाद्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर बर्बादी भी होती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही मांस के लिए 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए काफी जमीन और संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में लगा दी गई है।

व्यक्ति को वही चीजें खानी चाहिए जो प्राकृतिक हैं। जो कुछ भी प्राकृतिक है हमेशा तुम्हें संतुष्टि देता है, क्योंकि यह तुम्हारे शरीर को तृप्त करता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भोजन की तीन श्रेणियां बतायी हैं। प्रथम सात्विक भोजन, जिनमें फल, सब्जी, अनाज, मेवे, दूध, मक्खन आदि की गणना की गयी है जो आयु, बुद्धि और बल को बढाते हैं, अहिंसा, दया, क्षमा, प्रेम आदि सात्विक भावों को उत्पन्न कर सुख शांति प्रदान करते हैं। द्वितीय राजसी भोजन है, जिसमें गर्म तीखे, कड़वे, खट्टे, मिर्च-मसाले वाले उत्तेजक पदार्थ हैं, जो दुःख, रोग तथा चिंता प्रदान करने वाले हैं। तृतीय तामसी भोजन है जिसमें बासी, रसहीन, अधपके, सड़े-गले, अपवित्र, नशीले पदार्थ तथा मांस, अंडे आदि जो बुद्धि भ्रष्ट करने वाले, रोग, आलस्य आदि दुर्गुणों को जन्म देने वाले हैं, जिनके द्वारा क्रूर भाव उत्पन्न होते हैं।

स्वस्थ भोजन ही तन और मन को स्वस्थ रखता है। स्वस्थ भोजन से आशय है, वह भोजन जिसमें खनिज पदार्थ, प्रोटीन, कार्बोहाइट्रेड और विटामिन्स सहित कई पोषक तत्व हों। ये सभी चीजें समान अनुपात में हों तो भोजन शरीर के लिए अमृत बन जाता है। भोजन तभी स्वस्थ है जब तक प्राकृतिक हो। संतुलित शाकाहारी भोजन शरीर को सभी पोषक तत्व प्रदान करता है। यही नहीं, वह हृदय रोग, कैंसर, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, जोड़ों का दर्द व अन्य कई घातक एवं जानलेवा बीमारियों से हमें बचाता भी है। नए शोध के अनुसार, शाकाहारी होना हमारे हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद हैं। जो लोग सब्जियों से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते हैं उनका रक्तचाप सामान्य रहता है जबकि मांस का अधिक सेवन करने वाले ज्यादातर लोग हाई ब्लड प्रेशर के शिकार होते हैं। लंदन में हुए शोध के अनुसार उन लोगों में हाई ब्लड प्रेशर ज्यादा पाया गया जो मांस से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते थे। अनुसंधान के अनुसार, शाकाहारी प्रोटीन में एमीनो एसिड पाया जाता है। यह शरीर में जाकर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। धार्मिक आधार और सैद्धांतिक तौर पर भोजन ऐसा होना चाहिए जिससे न तो किसी का दोष लगा हो, ना पाप करके या चोरी करके लाया गया हो, न ही हत्या अथवा हिंसा करके बनाया गया हो।

दुनिया के किसी भी धर्म में मांसाहार का उपदेश नहीं दिया गया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कहा है कि मांसाहार से मनुष्य का स्वभाव हिंसक हो जाता है, जो लोग मांस भक्षण या मदिरापान करते हैं, उनके शरीर तथा वीर्यादि धातु भी दूषित हो जाते हैं। बौद्ध धर्म में पंचशील अर्थात सदाचार के पाँच नियमों में प्रथम और प्रमुख नियम किसी प्राणी को दु:ख न देना है। बौद्ध धर्म के मतानुसार बुद्धिमान व्यक्ति को आपातकाल में भी मांस खाना उचित नहीं है।

सिख पंथ : गुरुवाणी में परमात्मा से सच्चे प्रेम करने वालों को हंस तथा अन्य लोगों को बगुला बताया गया है। उन्होंने हंस का भोजन मोती तथा बगुलों का भोजन मछली, मेंढक आदि बताया है। इस्लाम मजहब : इस्लाम के सभी संतों-शेख इस्माइल, ख्वाजा मोइनद्दीन चिश्ती, हजरत निजामुद्दीन औलिया, बूअली कलन्दर आदि ने नेकरहमी, आत्मसंयम, शाकाहारी भोजन तथा सबके प्रति प्रेम का उपदेश दिया था। उनका कहना था कि अगर तू सदा के लिये स्वर्ग में निवास पाना चाहता है, तो खुदा की सृष्टि के साथ दया हमदर्दी का बर्ताव कर।’

जीव या पशु संरचना पर ध्यान देने पर हम देखते हैं कि सर्वाधिक शक्तिशाली, परिश्रमी, व अधिक सहनशीलता वाले पशु जो लगातार कई दिन तक काम कर सकते हैं, जैसे हाथी, घोड़ा, बैल, ऊंट आदि सब शाकाहारी होते हैं। इंग्लैंड में परीक्षण करके देखा गया है कि स्वाभाविक मांसाहारी शिकारी कुत्तों को भी जब शाकाहार पर रखा गया तो उनकी बर्दाश्त शक्ति व क्षमता में वृद्धि हुई।

अपने शरीर के समान दूसरों को भी उनका शरीर प्रिय है और उसके लिए उनका मांस वैसा ही बहुमूल्य है जैसे अपने लिए अपना मांस। फिर केवल जिव्हा के स्वाद के लिए मांस भक्षण करना हिंसा ही नहीं अपितु परपीड़न की पराकाष्ठा भी है। सुश्रुत संहिता में लिखा है कि भोजन पकाना यज्ञ की तरह एक पवित्र कार्य है। उस पवित्र कार्य में हिंसा जैसे जघन्य पाप का क्या अर्थ?

प्रकृति ने मनुष्य को स्वभाव से ही शाकाहारी बनाया है। कोई भी श्रमजीवी मांसाहार नहीं करता, चाहे वह घोड़ा हो या ऊंट, बैल हो या हाथी। फिर मनुष्य ही अपने स्वभाव के विपरीत मांसाहार कर संसार भर की बीमारियां और विकृतियां क्यों मोल लेता है?

मांसाहार उसमें तामसी वृत्तियां पैदा कर उसे क्रूर और हिंसक बनाता है, उसके शरीर की रोग-निरोधक क्षमता को कम कर उसे रक्तचाप तथा हृदय रोग जैसी दुसाध्य बीमारी लगाता है, उसके श्वास और पसीने को दुर्गुण युक्त बनाता है। उसके मन में काम, क्रोध और प्रमाद जैसे दुर्गुण उत्पन्न करता है। कहा भी है जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन। मांसाहार के लिए कटने वाले प्राणी की आंखों में जो भय और पीड़ा होती है, वह उसके रक्त में मिलकर सामिषभोजी की धमनियों तक पहुंचता है और उसे भीरू बनाता है। उसके आत्मबल का हृास करता है।

महात्मा गांधी कहते थे कि स्वाद पदार्थ में नहीं, अपितु मनुष्य की अपनी जिव्हा में होता है। नीम की चटनी से जीभ के स्वाद पर नियंत्रण कर लेने वाले गांधी के देश में आज मांसाहार का विरोध तो दूर, उल्टे टी.वी. और रेडियो जैसे संचार माध्यमों द्वारा अंडों के आकर्षक विज्ञापन प्रसारित किये जाना विडम्बनापूर्ण हैं। यह चिन्तनीय है, अहिंसा के उपासक देश के लिए लज्जास्पद भी। न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में मांसाहार पर नियंत्रण के लिये जन-जागृति माहौल बनना ही चाहिए। इसका विरोध करना अहिंसा के पक्षधर प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक का नैतिक दायित्व है तथा मुख सुख के लिए निरीह प्राणियों और अजन्मे अंकुरों की निर्मम हत्या के विरुद्ध जनमानस तैयार करना सबका प्रथम कर्तव्य है।