लोकसभा और राज्यसभा में हंगामा और विरोध का सिलसिला जारी है। ऐसा लग रहा है कि सदन हंगामा करनेवालों के लिए ही बना है। लोकसभा की माननीय अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन के तमाम समझाइश का असर मोदी सरकार के विपक्षी दलों पर दिखाई नहीं देता। पहले ‘भूमि अधिग्रहण विधेयक’, फिर कथित ‘असहिष्णुता के नाम पर’ और फिर ‘जेएनयू प्रकरण’ के नाम पर सदन की कार्यवाही को कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों बाधित किया। लोकसभा और राज्यसभा देशहित में विमर्श, चर्चा और निर्णय लेने का स्थान है। लेकिन सदन में हंगामा और विरोध बदस्तूर जारी है। इस माहौल पर देश की जनता खामोश नहीं है। जनता सोच रही है, समझ रही है और अपनी राय गली, मोहल्ला और चौपालों में अपने मित्रों के बीच जाहिर भी कर रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोच-समझकर और बड़ी योजनाबद्ध तरीके से 8 नवम्बर को 500 और 1000 के नोट पर बंदी की घोषणा की। इसके तुरंत बाद कांग्रेस ने भी सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया था। आम आदमी पार्टी (आआपा) भी दो दिन तक खामोश रही। फिर सभी मोदी विरोधी एक हो गए। सबसे पहले तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और पश्चिम बंगाल की मुखिया ममता बनर्जी ने इसका विरोध किया। और इसके बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, गुलाम नबी आजाद और आआपा के केजरीवाल के साथ शिवसेना ने भी अपना विरोध जताना शुरू किया। हालांकि, बाद में शिवसेना के रुख में बदलाव आया और अब वह सरकार के निर्णय के साथ खड़ी दिखाई दे रही है।

विरोध किसलिए?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिए गए ‘नोटबंदी’ के निर्णय से जनता खुश है। सामान्य नागरिक सरकार के इस निर्णय की प्रशंसा कर रहे हैं। हां, कुछ राजनीतिक दल 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट को अचानक बंद कर देने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं। यहां विपक्षी दल नोटबंदी का विरोध करने का कारण क्या बता रहे हैं, यह भी सोचनेवाली बात है।

राहुल गांधी, केजरीवाल सहित सभी विपक्षी दलों का कहना है कि नोटबंदी की वजह से जनता को परेशानी हो रही है, क्योंकि सरकार ने नोटबंदी का फैसला तो ले लिया लेकिन सरकार ने फैसले से पूर्व कोई तैयारी नहीं की थी। तैयारी पूरी नहीं होने के कारण नोटबंदी के बाद लोगों की शादी और इलाज के लिए आवश्यक रुपये उन्हें नहीं मिल पा रहे हैं। नोटबंदी की वजह से कई लोग बैंकों में कतार लगाने से मर गए। यह सही है कि नागपुर में एक बैंक में कार्यरत व्यक्ति का  हार्टअटैक की वजह से निधन हो गया। खबर ऐसी भी आयी कि अधिक काम की वजह से कई बैंक कर्मी परेशान हैं। एक-दो बैंककर्मियों के बेहोश हो जाने की भी खबर चली। वहीं कतार में खड़े एक व्यक्ति या बैंक से घर जाने के बाद कुछ लोगों के निधन हो जाने पर कुछ टीवी चैनलों ने हो हल्ला मचाया कि नोटबंदी ने उन लोगों की जान ले ली। इस खबर के बाद सभी विपक्षी दल बार-बार बोलने लगे और मीडिया भी उनकी बातों को भुनाने में लग गई कि 50, फिर 55 और अब 75 लोग नोटबंदी की वजह से मर गए।

उल्लेखनीय है कि जनता की सुविधा के लिए बैंककर्मी भी खूब मेहनत कर रहे हैं। वहीं सरकार ने शादी का कार्ड दिखाकर बैंकों से 2.50 लाख रुपये निकालने की अनुमति दी। यही नहीं तो सरकारी व निजी अस्पतालों में 500 और 1000 के नोट का उपयोग करने की अनुमति दी, जिसकी वजह से दिनों-दिन बैंकों और एटीएम के बाहर भीड़ कम होती जा रही है। इसके बावजूद तमाम विपक्षी दल लोकसभा और राज्यसभा में सदन की कार्यवाही को चलने नहीं दे रहे हैं। जबकि बैंकों और एटीएम पर अपने पैसे के लिए कतार में खड़े नागरिकों की परेशानियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं। क्यों?

विरोधियों की असली पीड़ा

नोटबंदी के विरोधी दल कांग्रेस, आआपा, तृणमूल और सीपीएम के नेता जोर देकर कह रहे हैं, “मोदीजी ने अपने मित्रों और भाजपा के लोगों को पहले ही नोटबंदी की जानकारी दी थी।” लेकिन विरोधियों की यह बात सही नहीं है। ऐसा कहकर विरोधी इस बात को साबित कर रहे हैं कि उनको अपने धन का जुगाड़ करने में समय नहीं मिला। ऐसा लगता है कि यही उनकी असली पीड़ा है कि उनको समय नहीं मिला। संभवतः इसलिए 25 नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “भारत का संविधान” पुस्तक के विमोचन में कह दिया, “पिछले 70 साल में कानूनों और संविधान का दुरुपयोग करने वालों ने देश को भ्रष्टाचार में डुबो दिया है। इन दिनों देश भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ रहा है और इस लड़ाई में आम नागरिक एक ‘सैनिक’ है। लेकिन कुछ लोग अब भी आलोचना कर रहे हैं कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की। मेरा मानना है कि मुद्दा यह नहीं है कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की थी। बल्कि मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को इस बात की पीड़ा है कि सरकार ने उन्हें किसी तैयारी का मौका नहीं दिया।” प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा, “अगर इन लोगों को तैयारी करने के लिए 72 घंटे मिल जाते तो वे तारीफ करते कि मोदी जैसा कोई नहीं है।” 

जबरदस्त जनसमर्थन

मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले को जनता का जबरदस्त समर्थन है। ऑटो चालक, चायवाला, सब्जीवाला आदि छोटे व्यवसायी कह रहे हैं कि ‘उनका व्यवसाय थोड़ा मंद हो गया था लेकिन अब वह ठीक से चल रहा है। हम सरकार के इस फैसले के साथ खड़े हैं।’ देश के ईमानदार लोग घर में संग्रहित धन को बैंकों में जमा कर रहे हैं, इससे देश का राजकोष निरंतर समृद्ध हो रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, नोटबंदी के फैसले के सिर्फ 13 दिनों के बाद ही जनधन खाता में लोगों ने 21,000 करोड़ जमा कराए हैं। वहीं नोटबंदी के चलते आतंकियों व नक्सलियों की मदद करनेवाले देशद्रोहियों और विदेशी शत्रुओं के षड्यंत्रों पर निश्चित रूप से लगाम लगा है। यह स्पष्ट है कि वो लोग इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं जिनके पास कालाधन है। सरकार को इन विरोधियों के धन की तलाशी करनी चाहिए। सीमा पर हमारे जवान देश व हमारी सुरक्षा के लिए दिन-रात खड़े हैं। इसी तरह देशहित में लिए गए सरकार के इस निर्णय के साथ जनता खड़ी है।

ऐसे में जनता पूछ रही है कि विपक्षी दल सदन की कार्यवाही क्यों चलने नहीं दे रहे हैं। चाय के ठेले, गांव के चौपाल और शहरों बस स्टैंड से लेकर किराने के दुकान सहित ट्रेन की जनरल और स्लीपर कोच में सफ़र कर रहे यात्री कहते हैं कि सदन नहीं चलने देनेवाले विपक्षी दलों पर सदन में कार्रवाई क्यों नहीं होती? लोग पूछ रहे हैं कि सांसदों को वेतन कितना मिलता है? संसदीय कार्य में भाग लेने पर कितना रूपया मिलता है?

जनता के इस सवाल पर हमने कुछ खोज की तो पाया कि इस समय संसद सदस्‍य को 50,000/- रु. प्रतिमाह वेतन, 45,000/रु. प्रतिमाह नि‍र्वाचन क्षेत्र भत्ते के रूप में मि‍लते हैं और 45,000/रु. प्रति‍माह कार्यालयीन व्‍यय के रूप में मि‍लते हैं जि‍समें 15,000/रु.लेखन-सामग्री व पत्राचार और 30,000 वैयक्तिक सहायक के लि‍ए सम्मिलित हैं। सदस्य को सभा अथवा समि‍ति‍यों की बैठक अथवा अन्‍य संसदीय कार्य में भाग लेने के लि‍ए 2000/- का दैनि‍क भत्ता भी मि‍लता है।

जब हमने सासदों के वेतन और संसदीय कार्य में भाग लेने के लिए मिलनेवाले दैनिक भत्ते के बारे में पूछनेवालों को बताया तो जनता की प्रतिक्रिया बहुत बढ़िया लगी। एक ने कहा कि संसदीय कार्य में रूकावट डालनेवालों को सदन से उठाकर बाहर कर देना चाहिए। दूसरे ने कहा कि हंगामा करनेवाले सांसदों के दैनिक भत्ते को बंद कर देना चाहिए। तीसरे ने तो ऐसा सवाल किया, “भैया! सदन में हंगामा और विरोध तो सांसद करते हैं तो लोकसभा अध्यक्ष बार-बार “आई एम सॉरी” क्यों कहती है?”

हमने कहा, “सांसदों का मान रखने के लिए।” मेरी बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए वह बोला, “जो लोकसभा स्पीकर की बात न माने, उनकी समझाइशों की अवमानना करे उसका क्या मान रखना। स्पीकर को “आई एम सॉरी” के बदले उनपर सख्त कार्रवाई करना चाहिए।”

जन-मन की बात को प्रस्तुत करने का मन हुआ और यह लेख लिखा। लोकसभा अध्यक्ष एक शिक्षक की तरह सांसदों की उद्दंडताओं या शोर-शराबे को संयमित करते हैं। तथापि एक शिक्षक के रूप में उद्दंडता करनेवाले को दंडित भी करते हैं। ऐसे में देखना होगा कि लोकसभा व राज्यसभा में सरकारी रुपयों व समय का अपव्यय करनेवाले सांसदों पर स्पीकर कौन-सा रुख अपनाते हैं? या फिर हंगामा ऐसा ही चलता रहेगा या फिर सदन की कार्यवाही इसी तरह बाधित होती रहेगी?