मीडिया की समाज में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है, क्योंकि उसके सरोकार पत्रकारिता की विस्तृत और अनन्त दंनिया जुड़े हुए हैं। इसलिए संविधान में मीडिया की स्वतंत्रता को शब्दों की आचार संहिता में परिभाशित नहीं किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत अभिव्यक्ति के अधिकार की गारंटी दी गई है। प्रिंट और टीवी पत्रकारिता की स्वतंत्रता उसी का भाग है। अलबत्ता संविधान में इसकी अलग से चर्चा नहीं है। साफ है, संविधान के रचयिताओं को इसकी व्यापकता का ख्याल था। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि देश व जनता के प्रति जवाबदेह मीडिया स्व-नियंत्रण में रहेगा। लेकिन कई मर्तबा मीडिया जाने-अनजाने या खबर को सनसनीखेज बनाने की दृष्टि से अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर जाता है। पठानकोट के सैनिक अड्डे पर आतंकी हमले की रिपोर्टिंग करते हुए एनडीटीवी इंडिया के पत्रकार के साथ यही हुआ है। चूंकि यह राष्ट्रहित और सैन्य ठिकाने की गोपनीयता बनाए रखने के राष्ट्रीय दायित्व से जुड़ा मुद्दा था, इसलिए प्रसारण के समय सम्पादक मंडल का भी कर्तव्य बनता था कि वह स्वविवेक से काम लेता और आपत्तिजनक अंशों के प्रसारण पर अंकुश लगाता। किंतु ऐसा नहीं हुआ। इसलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से गठित अंतर-मंत्रालयी समिति ने इस प्रसारण को गलत माना और समाचार चैनल को 9 नबम्वर को प्रसारण बंद रखने का आदेश दिया।

टीआरपी के फेर में समाचारों को अनावश्यक रूप से दिलचस्प व सनसनीखेज बनाने के चक्कर में खबरों से खेलना खासतौर इलेक्ट्रोनिक मीडिया का रोजमर्रा का काम हो गया है। इस खिलवाड़ में समाचार अपना अर्थ तो, खोते ही हैं, कभी-कभी वे मानवाधिकारों के ऐसे प्रतिबद्ध पैरोकार बन जाने हैं कि मानवों के नहीं अमानुषों के कहीं ज्यादा पैरोकार दिखाई देते हैं। संवादपालिका होने के नाते पत्रकारिता, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तरह लोकतंत्र का प्रहरी और संवैधानिक मूल्य का रक्षक है। लेकिन जिस तरह से न्यायपालिका सूचना के अधिकार के दायरे में आना नहीं चाहती, उसी तर्ज पर संवादपालिका किसी आचार संहिता के बंधन में बंधना नहीं चाहती है। मीडिया तो इसलिए और उद्दण्ड व उच्श्रृंखल बना रहना चाहता है, क्योंकि समय वह अवैध वित्तीय पूंजी और आवारा मिजाज के नियंत्रण में है। गोया उसे पेड न्यूज से भी कोई परहेज नहीं है। लिहाजा आठवें दशक तक मीडिया का जो अपना विवेक और राष्ट्रवादी परंपरा व सोच थी, वह इस आवारा पूंजी के प्रलोभन और आपस में ही गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लुप्त होती जा रही है। सोशल मीडिया की बेलगामी तो रोजाना एक नया इतिहास रच रही है। मीडिया का इसे बदलता स्वरूप कहा जा रहा है, लेकिन इस बदलाब में मीडिया का नैतिक पक्ष और सामाजिक सरोकार कहां है, इसकी चिंता किसे है?

जहां तक स्व-नियमन का प्रशन है तो हमारे यहां यह अधिकार चौथे स्तंभ को छोड़ अन्य किसी स्तंभ को नहीं है। सभी कानून के दायरे में हैं। गलत आचरण की आशंका में अनेक मंत्री और नौकरशाह जेल की हवा खा चुके हैं। कई पर मामले अदालतों में लंबित हैं। कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति को संसद में महाभियोग का सामना करने के बाद पद से हटना पड़ा था। भारतीय चिकित्सा और बार परिषदों को डॉक्टर, चार्टड एकाउंटेट्स और वकील की मान्यता रद्द करने का अधिकार है। व्यापारियों पर नियंत्रण के लिए आय व विक्रय कर संस्थाओं के अलावा खाद्य व नाप-तौल नियंत्रक संस्थाएं हैं। दवा उद्योग पर दवा नियंत्रक हैं। फिर चौथा स्तंभ क्यों नियंत्रण व दंड से मुक्त रहे?

जहां तक मीडिया की स्वतंत्रता का सवाल है तो दुनिया में एक तिहाई से ज्यादा लोग ऐसे देशों में रहते हैं, जहां मीडिया अपनी मनमानी बरतने के लिए आजाद नहीं है। लिहाजा भारत में ‘भय बिन होय न प्रीत’ सूक्ति वाक्य का औचित्य बनाए रखना है तो मीडिया की नियंत्रक कोई तो ऐसी संस्था हो, जिसके पास नख-दंत हों। भारतीय प्रेस परिषद दोषी पाने पर मीडिया की केवल निंदा कर सकती है। आजादी के पहले मीडिया को आज के जैसी आजादी नहीं थी। जेम्स ऑगस्टन ने भारत का पहला समाचार-पत्र ‘द बंगाल गजट’ नाम से 1870 में शुरू किया था। ऑगस्टन ने उस वक्त के भारत में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिन की पत्नी की आलोचना कर दी थी। इसके बदले में जेम्स को चार महीने की जेल की सजा काटन के साथ, पांच सौ रूपये बतौर जुर्माना भी भरना पड़े थे। यह घटना उस समय की है, जब अंग्रेज शासक थे, और अंग्रेज ही पत्रकार थे। मसलन किसी भारतीय पत्रकार को सजा दी गई होती तो हम इसे आजादी की लड़ाई का परिणाम मान सकते थे। साफ है, यह मुद्दा फिंरगी हुकूमत के हितों पर कुठाराघात से जुड़ा था। हमें इसी तरह से अपने राष्ट्रीय हितों की परवाह लगभग नहीं है?

इस लिहाज से तय है कि आंतकी हमलों और उनके खिलाफ कार्रवाई के दौरान मीडिया को कुछ भी दिखाने या लिखने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। मीडिया ने जो भूल पठानकोट में की थी,  कमोबेश मुंबई के ताज होटल पर आंतकी हमले के दौरान भी यही भूल की थी। इससे आतंकियों को सुरक्षा बलों और होटल में ठहरे नागरिकों पर आसानी से स्वयं सुरक्षित रहते हुए रास्ता खुलता चला गया था। इससे सबक लेते हुए एनडीटीवी को सावधानी बरतने की जरूरत थी। लेकिन ऐसा न करते हुए रिपोर्टर ने छिपे आतंकियों को अप्रत्यक्ष रूप से यह जानकारी दी कि पठानकोट वायुसेना के संवेदनशील स्थल कौन-कौन से हैं। इस हवाई ठिकाने पर रखे गोला-बारूद के भंडार, मिग विमान, रॉकेट लांचर, मोर्टार, हेलिकॉप्टर और ईंधन टैंकों की उस समय जानकारी दी गई जब सुरक्षा बल आतंकियों से जान हथेली पर रखकर मुकाबला कर रहे थे। इन सैन्य-खुलासों का इस्तेमाल आतंकी या उनको दिशा-निर्देश दे रहे सरगना भारी तबाही में बदल सकते थे। बाबजूद तीन सैनिकों की शहादत के बाद आतंक की इस साजिश से मुक्ति मिल पाई थी। यह साजिश जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर ने रची थी। इसीलिए इस खबर को समिति ने ‘रणनीतिक रूप से संवेदनषील ब्योरों का प्रसारण’ माना। आतंकी हमले के समाचार प्रसारण के संदर्भ में किसी टीवी चैनल के विरूद्ध यह पहली दंडात्मक कार्रवाई है। बाबजूद 24 घंटे प्रसारण पर लगा यह प्रतिबंध महज सांकेतिक है।

तय है, मीडिया को ऐसा सब-कुछ परोसने की छूट नहीं मिलनी चाहिए, जो राष्ट्रविरोधी हो? वैसे भी टेलीविजन दृश्य व श्रव्य माध्यम है और इसका तत्काल व्यापक असर पड़ता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि टीवी पत्रकारिता को नियंत्रण में रखने या सजा देने के नियम हैं ही नहीं। केबल टीवी नेटवर्क (नियम) अधिनियम के तहत काबू करने के कानून हैं। लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में अकसर ऐसे कानूनों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। इन कानूनों का यदि प्रभावी, समुचित व पारदर्शी ढंग से पालन हो तो मीडिया की उद्दण्डाता पर एक हद तक लगाम लग सकती है। कई दफह आत्मबल की कमी के चलते सत्ता-तंत्र मीडिया से पंगा लेने में डरता है, क्योंकि मीडिया ने वर्तमान में आवारा पूंजी निवेश से सत्ता के समानांतर बड़ी ताकत हासिल कर ली है। यही वजह है कि कमजोर मनस्थिति और भ्रष्ट नेता मीडिया के आगे नतमस्तक की मुद्रा में बने रहने में अपनी भलाई समझते हैं। इसलिए अकसर, वे यह कहते मीडिया से पीछा छुड़ाते दिखते हैं, कि मीडिया पर नियंत्रण के लिए पर्याप्त कानून नहीं हैं। यदि कानून नहीं हैं, तो उन्हें बनाए जाने की पहल करने की जरूरत है। क्योंकि मीडिया में सनसनी, अभद्रता, अश्लीलता और हिंसा,  मसाला फिल्मों की तरह बढ़ती जा रही है।

खबरें उत्सर्जित की जा रही हैं और समाचार, मनोरंजन व विज्ञापन के बीच कोई भेद नहीं रह गया है। इन्हें इस तरह से दृश्य और भाषा की लच्छेदार चाशनी में गूंथकर पेश किया जाता है कि सामान्य दर्शक को इनमें भेद करना मुश्किल होता है। आतंकवाद, चरमपंथ और असामाजिक गतिविधियों से जुड़ी खबरें भी इसी लहजे में परोसी जा रही हैं। इसलिए जरूरी है कि देश में जो एक लाख अखबार और 890 टीवी चैनल हैं, वे न्यूनतम मर्यादा के दायरे में तो रहें ही? इनका विस्तार अनंत ब्रह्माण्ड की तरह फैल रहा है, क्योंकि देश की सवा सौ करोड़ जनता में सूचना और मनोरंजन की भूख लगातार बढ़ रही है। गोया यह ख्याल रखने की जरूरत है कि हमारे पूर्वजों ने आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बड़ी कुर्बानियां दी हैं। लिहाजा ये कुर्बानियां और इनके द्वारा दिए मूल्य किसी भी आर्थिक विकास और उसमें किए वित्त पोषण में  होम न हो जाएं।