तो सारे कयासों पर विराम लग गया। पाकिस्तान में जनरल राहील शरीफ को सेवानिवृत्ति मिल गई एवं लेफ्टिनेंट जनरल कमर जावेद बाजवा को उनकी जगह नया थल सेना प्रमुख नियुक्त कर दिया गया। अपने तीन कार्यकाल में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पांचवे थल सेना अध्यक्ष को नियुक्त किया है। निश्चय ही उनको सेना प्रमुख बनाने के पहले नवाज शरीफ ने हर पहलू पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया होगा। आखिर जनरल जहांगीर करामात की जगह जनरल परवेज मुशर्रफ को उन्होंने ही नियुक्त किया था और उसके बाद क्या हुआ यह हम सबको पता है। वहां तख्ता पलट हुआ, शरीफ को सपरिवार निर्वासित जीवन तक व्यतित करना पड़ा। वे उसे दु:स्वप्नों की तरह भूल जाना चाहेंगे। उसकी पुनरावृत्ति न हो इसके लिए वे पूरी तरह सतर्क होंगे। हालांकि जनरल महमूद हयात का नाम बाजवा से उपर चल रहा था लेकिन नवाज शरीफ ने बाजवा का चयन किया और जनरल हयात को ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी का चेयरमैन बनाया गया। तो यहां दो प्रश्न हमारे सामने उठते हैं। एक कि जिस तरह से सेना प्रमुख के रूप में आसानी से राहिल शरीफ सेवानिवृत्त हो गए और उनकी जगह नए सेना प्रमुख आ गए उसका पाकिस्तान के लिए क्या अर्थ है। दूसरे, भारत के लिए उसके क्या मायने हैं? आखिर भारत के साथ वो किस तरह के रिश्ते चाहेंगे?

दूसरा प्रश्न हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी नियुक्ति ऐसे समय हुई जब नियंत्रण रेखा एवं सीमा पर पाकिस्तान की ओर से लगातार युद्ध विराम का उल्लंघन हो रहा है तथा दोनों ओर से गोलीबारी जारी है। पूरी स्थिति ऐसी है कि कब क्या हो जाए कोई नहीं कह सकता। पाकिस्तान ने राहिल शरीफ के नेतृत्व में इस वर्ष 270 बार से ज्यादा युद्ध विराम का उल्लंघन किया है। क्या जनरल बाजवा उस नीति को आगे बढ़ाएंगे या फिर उसमें बदलाव करेंगे? वस्तुतः पाकिस्तान में जैसा हम जानते हैं सेना एक ऐसी संस्था है जिसकी विदेश नीति में प्रभावी भूमिका होती है और खासकर भारत से संबंधित नीतियों में। भारत की तरह वहां सेना केवल राजनीतिक नेतृत्व की नीतियों का पालन नहीं करती। कई बार राजनीतिक नेतृत्व को सेना की सोच के अनुसार भी काम करना पड़ता है। तो बाजवा क्या करेंगे? कई विश्लेषक उनके एक वक्तव्य को उद्धृत करते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान के लिए आंतरिक आतंकवाद भारत से बड़ा खतरा है। वैसे भी पाकिस्तानी सेना जानती है कि भारत अपनी ओर से कभी आक्रमण नहीं करने वाला, युद्ध नहीं थोपने वाला। इसलिए उनका बयान व्यावहारिक था।

सेना प्रमुख बनने के बाद केवल व्यक्तिगत सोच का महत्व नहीं होता, सेना के मुख्यालय की सोच और नीति को आगे बढ़ाना होता है। सेना के मुख्यालय की सोच भारत विरोध की रही है। राहिल शरीफ ने अपने सेवानिवृत्त होने के पहले यह धमकी दी कि अगर पाकिस्तान ने सर्जिकल स्ट्राइक किया तो भारत की पीढ़ियां याद करेंगी और उन्हें पढ़ाया जाएगा कि सर्जिकल स्ट्राइक क्या होता है। बाजवा इस नीति से पीछे हट जाएंगे कहना कठिन है। जब नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने थे उनकी नीति भारत सहित पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाने की थी। किंतु समय बीतने के साथ उनको नीतियां बदलनी पड़ी या वे बदलने को मजबूर हो गए। जब पूर्व सेना प्रमुख जनरल अश्फाक कयानी ने दोबारा अपने सेवा विस्तार से इन्कार कर दिया तो राहिल शरीफ पहली पसंद नहीं थे लेकिन वे बने और उनके कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय वजीरीस्तान में जर्बे अज्ब ऑपरेशन चलाना था जो पाकिस्तान में हिंसा फैला रहे आतंकवादियों के खिलाफ था, विशेषकर तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान और उसके सहयोगियों के खिलाफ। जून, 2014 में उत्तरी वजीरिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ चलाए गए इस ऑपरेशन के बाद राहिल के उन आलोचकों का मुंह बंद हो गया जो कहते थे कि उनमें  काबिलियत नहीं है। कराची में आतंकवादियों के खिलाफ एक्शन लेने और शांति कायम करने में भी राहिल शरीफ की भूमिका अहम रही है। लेकिन जो कुछ कयास लगाए गए कि वे नवाज शरीफ पर अपनी नीतियां आरोपित करते हैं उनके पक्ष में ज्यादा प्रमाण नहीं आए। माना जाता है कि बाहर जो भी छवि बनी हो राहिल पूरे कार्यकाल में सरकार के समर्थक के रूप में बने रहे। सरकार की विदेश और सुरक्षा नीति में कभी भी राहिल शरीफ का बड़ा हस्तक्षेप नहीं रहा। वे उस पर कभी कुछ सार्वजनिक रूप से बोलते थे। यही कारण था कि वो सोशल मीडिया में कभी भी ज्यादा लोकप्रिय नहीं रहे।

वास्तव में जिस तरह से शांतिपूर्वक पद का स्थानांतरण हुआ उसमें राहिल शरीफ की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ समय के लिए यह मानना होगा कि जनरल कयानी और फिर जनरल शरीफ दोनों का जाना पाकिस्तान में लोकतंत्र के सफलता की पटरी पर चलने का संकेत है। जनरल शरीफ पिछले 20 साल में निर्धारित सेवाकाल के बाद अवकाश ग्रहण करने वाले पहले सेना प्रमुख हैं। भविष्य का कुछ नहीं कह सकते लेकिन अभी इसका यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है। अगर वाकई वहां लोकतंत्र मजबूत होता है और सेना का प्रभाव थोड़ा कम होता है तो यह पूरे क्षेत्र के हित में होगा। किंतु ज्यादा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। भारत के संदर्भ में तो कतई नहीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिसम्बर, 2015 में लाहौर गए जहां से वे नवाज शरीफ के घर तक गए लेकिन पठानकोट हो गया और पूरा माहौल मिनट में मटियामेट। ऐसा आगे भी हो सकता है। कमर बाजवा की नियुक्ति किन कारणों से हुई है? वह अभी ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट के इंस्पेक्टर जनरल थे। राहिल शरीफ भी आर्मी चीफ बनने से पहले इस पर पर रह चुके थे। कमर बाजवा को कश्मीर और उत्तरी इलाकों के मसलों की गहरी समझ है। कश्मीर मुद्दे को लेकर उनको खासा अनुभव है। बलोच रेजिमेंट का होने की वजह से उत्तरी इलाके की समस्याओं के बारे में भी उनका व्यावहारिक अनुभव है। जाहिर है वहां के विद्रोह से निपटने में उनकी समझ का परीक्षण होगा। बाजवा ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण कॉर्प-10 का भी नेतृत्व किया है। कॉर्प 10 सेना का वो हिस्सा है जो भारत से सटे सीमा पर और नियंत्रण रेखा पर तैनात रहता है। बाजवा गिलगिट और बाल्टिस्तान में फोर्स कमांडर की पोस्ट पर भी रह चुके हैं। बलोच रेजीमेंट से पाकिस्तान को पहले भी 3 सेना प्रमुख (जन. याहया खान, जन. असलम बेग और जन. अशफाक परवेज कयानी) मिल चुके हैं। कहने का तात्पर्य यह कि अगर कश्मीर और बलूचिस्तान का अनुभव उनके सेना प्रमुख बनाए जाने का कारण है तो फिर इसका निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है। इन दोनों मामलों पर भारत की नीतियां स्पष्ट हैं।

हमारे पूर्व सेना प्रमुख जनरल विक्रम सिंह कांगों में शांति मिशन के दौरान बाजवा के साथ काम कर चुके है। उन्होंने उन्हें प्रोफेशनल सैनिक कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि देश के अंदर आने पर प्राथमिकताएं बदल जातीं हैं। इसलिए कांगो मिशन के आधार पर हम निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। उन्होंने कहा कि हमें बाजवा और उनके दृष्टिकोण के प्रति सतर्क रहने और निगाह बनाए रखने की जरूरत है। वास्तव में बलूच और कश्मीर दोनों पर कोई सेना प्रमुख पाकिस्तान की परंपरागत नीतियों से बाहर नहीं निकल सकता। इसलिए जनरल बाजवा से भी हम तत्काल ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते। हालांकि अगर वो जेहादी ताकतों को पाकिस्तान के लिए खतरा मानते हैं तो उनकी नीतियां बदलनी चाहिए। लेकिन कश्मीर में सक्रिय जेहादी तत्वों को पाकिस्तानी मुजाहिद मानते हैं। क्या बाजवा की सोच इससे अलग होगी? क्या कश्मीर की नियंत्रण रेखा पर काम करते हुए या गिलगिट, बाल्टिस्तान में सेवाएं देते हुए उनकी सोच थोड़ी अलग थी? ऐसा था नहीं तो फिर हम तत्काल यह क्यों मान लें उनके आने से स्थितियां बदल जाएंगी? पाकस्तानी सेना भारत को दुश्मन देश मानकर काम करती है। उसका बहुत साफ लक्ष्य है भारत को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाना। जनरल बाजवा इसमें आमूल बदलाव ले आएंगे ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। एक ओर बाजवा ने पद भार ग्रहण किया और दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में एक जगह नगरोटा में सेना पर हमले हुए जिसमें दो जवाब शहीद हुए तथा दूसरी जगह सांबा में सीमा सुरक्षा बल पर आतंकवादियों ने हमला किया। हालांकि बाजवा ने कहा कि नियंत्रण रेखा पर हालात सुधरेंगे। देखना है वे क्या करते हैं। स्वयं पाकिस्तान के हित में यही है कि युद्ध विराम का वह पालन करे तथा आतंकवादियों का निर्यात करना बंद करे। युद्ध विराम के उल्लंघन से पाकिस्तान को अब ज्यादा क्षति हो रही है।