(12 दिसम्बर, बलिदान दिवस पर विशेष)

जब भी, जहां कहीं ‘स्वदेशी’ की चर्चा होती है, तब एक नवजवान का चित्र आंखों के सामने उभर कर आता है। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत युवा जब अपने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर हो जाता है तब वह देश के सम्मुख एक महान आदर्श छोड़ जाता है। 12 दिसम्बर, 1930 भारत के स्वदेशी आंदोलन का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन के रूप में स्मरणीय है। इसी दिन ‘स्वदेशी’ की प्रेरणा और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार का संदेश देते हुए बाबू गेनू ने अपना बलिदान दिया था, इसलिए आज भी इस दिन को स्वदेशी दिवस के रूप में याद किया जाता है।  

एक सामान्य सा दिखने वाला युवा बाबू गेनू का जन्म पुणे जिले के महालुंगे पडवल नामक ग्राम में वर्ष 1908 में हुआ था। उनके पिता का नाम ज्ञानबा और माता का नाम कोंडाबाई था। गरीब किसान परिवार में जन्में गेनू का बचपन बड़ी कठिनाई में गुजरा। गेनू तब 2 वर्ष का था जब उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनके बड़े भाई भीम ने उसके संरक्षण का भार उठाया। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से गेनू की माँ मुंबई आकर एक कपड़ा मिल में मजदूरी करने लगी। बाद में गेनू भी अपनी माँ कोंडाबाई के साथ मुम्बई में रहने लगा। जल्दी ही उन्हें उसी कपड़ा मिल में काम मिल गया, जहां उसकी माँ मजदूरी करती थीं।

उन दिनों अंग्रेज सरकार ने भारत में लूट मचा रखी थी। अंग्रेज भारत से कच्चा माल इंग्लैंड ले जाया करते और उसी माल पर प्रक्रिया कर अधिक दाम में भारत सहित दुनियाभर में बेचते। अंग्रेजों ने भारत के किसानों और मजदूरों की मेहनत से ऊपजे अन्न और वस्तुओं पर आर्थिक नीति बनाकर षड्यंत्रपूर्वक लूट का सिलसिला जारी रखा था। अंग्रेजों की इस कुटिल चाल को विफल करने के लिए लोकमान्य तिलक ने अपनी लेखनी और प्रबोधन से ‘स्वदेशी आन्दोलन’ की प्रेरणा जगायी। उनकी प्रेरणा से स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने विदेशी सामान का बहिष्कार करने का प्रबल अभियान चलाया। बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व स्वदेशी आन्दोलन ने ‘सत्याग्रह’ का रूप ले लिया और देश की अस्मिता का प्रतीक बन गया।

बाबू गेनू का एक मित्र प्रल्हाद जो तत्कालीन परिस्थितियों से पूरी तरह परिचित था। वह बाबू से स्नेह रखता था और उसी ने बाबू को देश के प्रति कर्तव्य की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रहलाद उसे देशभक्ति की बातें सुनाता था और वह स्वयं भी उस समय के आंदोलनों में हिस्सा लेता था। इस दौरान बाबू राष्ट्रीय विचारधारा के एक मुस्लिम शिक्षक एक सम्पर्क में आया। उन्होंने बाबू को समझाया कि जिस मिट्टी में हम बड़े हुए हैं हम उसी की संतान हैं। अपने देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराना हमारा परम कर्तव्य है।

1919 में हुए जलियावाले बाग के भीषण हत्याकांड के वर्णन को सुनकर बाबू का मन द्रवित हो गया। वहीं, 1928 में साइमन कमीशन को प्रतिकार करते हुए लाला लाजपतराय की हत्या का भी बाबू पर गहरा प्रभाव पड़ा। गांधीजी के प्रति उसके मन में अगाध श्रद्धा थी। वह कांग्रेस का सक्रिय कार्यकर्ता था। बाबू ने अपनी स्वतंत्रवाहिनी बनाई थी और उन्होंने तानाजी पथक का गठन किया था। कुछ धन संग्रह करके उन्होंने चरखा बनवाया। बाबू व उनके समस्त मित्रगण प्रतिदिन चरखा अवश्य काटते थे। स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने की मानो लहर सी चल रही थी। 26 जनवरी, 1930 को पूरे देश ने “सम्पूर्ण स्वराज्य मांग दिवस” मनाया। इस आन्दोलन में बाबू गेनू ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन के चलते बाबू को तीन माह की जेल हुई। जेल में ही उन्हें अपनी मां के निधन का समाचार मिला। बाबू ने अपने मित्रों से कहा कि, अब मैं पूरी तरह से मुक्त हो गया हूं, भारतमाता को मुक्त कराने के लिए कुछ भी कर सकता हूं। अक्टूबर, 1930 में बाबू गेनू, प्रल्हाद और शंकर के साथ जेल से बाहर आए। बाबू ने घर-घर जाकर स्वदेशी का प्रचार-प्रसार प्रारम्भ कर दिया। दीपावली, 1930 के बाद विदेशी माल के बहिष्कार का आंदोलन पूरे देश में फैल गया। बाबू गेनू ने अपने सभी मित्रों के साथ मिलाकर तय किया कि विदेशी वस्तुएं ले जाने वाले ट्रकों को रोकेंगे।

12 दिसम्बर को सत्याग्रह का दिन तय किया। 12 दिसम्बर, 1930 को शुक्रवार का दिन था। मुंबई के कालबा देवी इलाके में एक गोदाम विदेशी माल से भरा था। उसे दो व्यापारियों ने खरीद लिया। उन्होंने तय किया इसे लारियों से भरकर मुंबई की कोट मार्केट में ले जाएंगे। मुम्बई के मुलजी जेठा मार्केट से विदेशी कपड़े जाने थे, जिनको रोकने की जिम्मेदारी मुम्बई शहर की तत्कालीन कांग्रेस ने बाबू गेनू और उनके तानाजी पथक संगठन को सौंपी। बाबू गेनू ने विदेशी कपड़ों से भरी लॉरियां, ट्रक आदि को रोकने का निश्चय किया गया। मि. फ्रेजर को इस बात की जानकारी मिल गई। इसलिए उसने पुलिस बल को पहले ही बुला लिया था। सुबह साढ़े दस बजे से ही सत्याग्रहियों की टोलियां जयघोष करती हुई आने लगीं। बाबू गेनू के नेतृत्व में तानाजी पथक भी आया। विदेशी माल से भरे ट्रक दौड़ने लगे। विदेशी कपड़ों से भरी हुई लॉरी आ रही थी। बाबू ने लॉरी रूकवाने का प्रयास किया। कड़े पुलिस बंदोबस्त के बावजूद घोई रेवणकर नामक युवक लॉरी के सामने लेट गया। ड्राइवर ने ब्रेक लगाया और गाड़ी रुक गई। पुलिस ने खींचकर उन्हें परे कर दिया और उनकी जमकर पिटाई की। ‘भारतमाता की जय’ और “वन्दे मातरम्” के नारों से वातावरण गूंज उठा। भीमा घोंई से तुकाराम मोहिते तक यह क्रम चलता रहा। धीरे-धीरे पुलिस का गुस्सा बढ़ता गया।

अब आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने बल प्रयोग प्रारम्भ कर दिया। सत्याग्रहियों का जोर भी बढ़ रहा था। तभी लॉरी के सामने स्वयं बाबू गेनू आ गया। क्रुद्ध पुलिस का नेतृत्व कर रहे अंग्रेज सार्जेण्ट ने आदेश दिया, ‘लॉरी चलाओ, ये मर भी गया तो कोई बात नहीं।’ ड्राइवर भारतीय था उसका नाम बलवीर सिंह था। उसने लॉरी चलाने से मना कर दिया। तब अंग्रेज सार्जेण्ट ने स्वयं लॉरी चलानी प्रारम्भ कर दी। लॉरी बाबू गेनू के ऊपर से गुजर गयी। वह गम्भीर रूप से घायल हो गया। पूरी सड़क बलिदानी खून से लाल हो गई। अन्तिम सांसे ले रहे बाबू को निकट के अस्पताल में भर्ती करवाया गया जहां सायंकाल उनकी मृत्यु हो गई। बाबू की अन्तिम यात्रा के दिन पूरा मुम्बई बंद रहा। एक अनाम मजदूर जन-जन का श्रद्धेय बन गया।

बाबू की स्मृति में उनके गांव महालुंगे पडवल में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है। उनकी याद में दिल्ली के आर.के.पुरम्, सेक्टर-8 और 9 के बीच के मार्ग का नाम रखा गया है। मुंबई की एक सड़क एवं देश के अनेकों संस्थानों का नामकरण भी उनके नाम से हुआ है। स्वदेशी के लिए बलिदान देने वालों में बाबू गेनू का नाम सबसे पहले आता है। प्रत्येक वर्ष 12 दिसम्बर का दिन ‘बाबू गेनू की स्मृति’ में “स्वदेशी दिवस” के रूप में मनाया जाता है।