उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा भेजे गए 77 नामों में से 34 नामों की स्वीकृति केन्द्र सरकार द्वारा दिए जाने से ऐसा लगने लगा था कि न्यायपालिका और सरकार के बीच बर्फ गलने लगी है, और अंतोगत्वा दोनों के बीच जजों की नियुक्तियों को लेकर कोई आम सहमति बन जाएगी। लेकिन 43 नामों को केन्द्र सरकार द्वारा वापस कर दिए जाने और उन नामों को पुनः कॉलेजियम द्वारा केन्द्र सरकार के पास भेजे जाने से ऐसा लगता है कि न्यायपालिका और सरकार आमने-सामने आ गए हैं। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश बीच-बीच में जजों की नियुक्तियों को लेकर सरकार को निशाने में लेते रहते हैं।

प्रधान न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर ने कहा है कि न्यायधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया हाईजैक नहीं की जा सकती और न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए, क्योंकि निरंकुश शासन के दौरान उसकी एक भूमिका होती है। न्यायपालिका न्यायधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका यानी सरकार पर निर्भर नहीं रह सकती। उन्होंने यह भी कहा कि एन.एस.जी. (न्यायिक नियुक्ति आयोग) मामले में जजों की नियुक्ति में कानूनमंत्री एवं दो अन्य का होना न्यायपालिका की आजादी में खलल था। इसलिए जजों की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ना चाहिए। लोकतंत्र की बात आजाद न्यायपालिका के बिना नहीं हो सकती। इसके पूर्व संविधान दिवस के अवसर पर उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका की यह जिम्मेदारी है कि वह सरकार के अंगों पर निगाह रखे, जिससे वे लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न करने पाए।

यह भी उल्लेखनीय है कि 43 नामों को सरकार द्वारा वापस लौटाये जाने पर कॉलेजियम ने पुन: इन्हीं नामों को वगैर किसी विचार के पुन: सरकार के पास यह कहते हुए कि सरकार इन नामों पर तीन हफ्ते के भीतर विचार करे। जबकि केन्द्र सरकार ने इन नामों को लौटाते वक्त यह कहा था कि इनके खिलाफ गंभीर किस्म की शिकायतें हैं। इसके पूर्व सर्वोच्च न्यायालय सरकार को यह कहकर फटकार लगा चुका था कि नियुक्तियों में देरी क्यों हो रही है? पूरे संस्थान को ठप्प नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लिस्ट के संबंध में कहा गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों की लिस्ट का क्या हुआ? अगर कोई दिक्कत है तो लिस्ट हमें भेजें, फिर से विचार करेंगे। स्पष्ट है सर्वोच्च न्यायालय जब इस तरह की बातें करता है, तो उसका आशय स्पष्ट है कि जजों की नियुक्तियों में विचार करने का एकमात्र अधिकार उसे है, और केन्द्र सरकार समेत किसी अन्य को इसमें किसी किस्म के विचार-विनिमय तक की कोई गुंजाइश नहीं है।

जब प्रधान न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर यह कहते हैं कि न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए वहां तक तो बात ठी है, लेकिन जब प्रधान न्यायाधीश यह फरमाते हैं कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया हाईजैक नहीं की जा सकती, निरंकुश शासन के समक्ष उसकी एक भूमिका होती है और एन.एस.जी. मामले में जजों की नियुक्ति में कानून मंत्री एवं दो का होना न्यायपालिका की आजादी में खलल था, तो यह बातें समझ से परे हैं। वर्ष 2011 में अन्ना आंदोलन के दौरान जब सशक्त एवं निष्पक्ष लोकपाल के गठन को लेकर पूरा देश सड़कों में आ गया था। तब लोकसभा में इस मुद्दे पर बहस के दौरान तात्कालीन प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज ने एक बहुत ही तार्किक एवं युक्ति-संगत बात कही थीं। उन्होंने कहा था- निस्संदेह लोकपाल स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए। लोकपाल की नियुक्ति में सरकार ही सबकुछ हो, ऐसा भी नहीं होना चाहिए, लेकिन लोकपाल के गठन में निर्वाचित सरकार की कोई भूमिका ही न हो यह भी उचित नहीं होगा। ठीक यही बात जजों की नियुक्ति के संबंध में भी कही जा सकती है कि उनकी नियुक्तियों में सरकार ही सबकुछ न हो, पर उसकी कोई भूमिका ही न हो, यह कतई उचित नहीं कहा जा सकता।

जब टी.एस. ठाकुर यह फरमाते हैं कि न्यायिक नियुक्ति आयोग में केन्द्रीय कानूनमंत्री एवं दो अन्य सदस्यों का होना न्यायपालिका की आजादी में खलल था, जबकि उन दो सदस्यों की नियुक्ति स्वतः सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री एवं विपक्ष के नेता द्वारा की जानी थी। यह भी उल्लेखनीय है कि उसमें प्रधान न्यायाधीश के अलावा दो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश भी होते। इस तरह से प्रस्तावित एन.एस.जी. के माध्यम से न्यायपालिका की आजादी पर खलत कैसे पड़ता? यह समझ में न आने वाली बात है। संभवतः टी.एस. ठाकुर यह चाहते हैं कि जजों की नियुक्तियों में सरकार की किसी भी तरह से कोई भूमिका ही न हो। तभी तो वह कहते हैं कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को हाईजैक नहीं करने दिया जा सकता।

कुल मिलाकर उनका कहने का आशय यह है कि व्यवस्थापिका और कार्यपालिका पर तो न्यायपालिका का पूरा नियंत्रण रहेगा, लेकिन न्यायपालिका संविधान की मूल भावना ‘संतुलन एवं निरोध’ को धता बताकर अपने लिए सारे फैसले खुद करेगी। जिसका निष्कर्ष यह है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में वह पूरी तरह स्वच्छंद होनी चाहिए। वह चाहती है कि उसके कुकृत्यों, स्वेच्छाचारिता एवं भ्रष्ट कृत्यों की ओर किसी को आंख उठाकर देखने का हक न रहे। यह बताने की जरूरत नहीं कि न्यायपालिका में भी इसी समाज से लोग जाते हैं, और जब समाज भ्रष्ट है तो न्यायपालिका उससे कैसे अछूती रह सकती है। ‘‘सम्पूर्ण सत्ता सम्पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है’’ यह सिद्धांत प्रत्येक जगह लागू होता है, इसके बावजूद यह बड़ा प्रश्न है कि न्यायपालिका अपने लिए सम्पूर्ण सत्ता क्यों चाहती है? जबकि न्यायाधीशों के भ्रष्टाचरण के प्रकरण आए दिन सामने आते रहते हैं। ज्यादा सामने इसलिए नहीं आते कि न्यायालय अवमानना के माध्यम से न्यायपालिका ने अपने लिए खौफ का माहौल बना रखा है। कभी संतानम कमेटी ने कहा था कि छोटी अदालतें भ्रष्टाचार के अड्डे हैं। पर टी.एस. ठाकुर के अनुसार न्यायपालिका की कार्य प्रणाली में किसी किस्म के सुधार की जरूरत नहीं है। जबकि यह बड़ी हकीकत है कि दुनिया के किसी भी देश में ऐसा प्रावधान नहीं है कि जज ही जजों को नियुक्त करें और उनके विरुद्ध कार्यवाही का कोई प्रावधान न हो। ऐसी स्थिति में एटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी का यह कहना सर्वथा उचित है कि संविधान ने सभी के लिए लक्ष्मण रेखा तय की है। कहने का तात्पर्य यह कि न्यायपालिका की भी एक लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए।

विडम्बना की बात यह कि न्यायपालिका स्वतः अपनी ही बातों पर गंभीर नहीं है। एन.एस.जी. कानून को संविधान विरोधी घोषित करते वक्त उसने केन्द्र सरकार को जजों की नियुक्ति के संबंध में एम.ओ.पी. बनाने को कहा था- जिसे केन्द्र सरकार जुलाई में ही प्रस्तुत कर चुकी है। पर एम.ओ.पी. के प्रारूप पर वह बार-बार आपत्ति जताकर जजों की नियुक्तियों में सारे अधिकारों को अपने पास रखना चाहती है। एम.ओ.पी. के जरिए सरकार ऐसी व्यवस्था चाहती है कि कॉलेंजियम जिन नामों का प्रस्ताव करे- उसमें संबंधित व्यक्ति की पात्रता एवं योग्यता साफ-साफ झलकनी चाहिए। यानी कॉलेजियम अपने चहेतों के बजाय मेरिट के आधार पर जजों की नियुक्तियां करे। मोदी सरकार चाहती है कि उच्च न्यायालयों में जो जज नियुक्त हों उनकी ईमानदारी एवं निष्ठा पूरी तरह असंदिग्ध हो। मोदी सरकार यह भी चाहती है कि जजों के विरुद्ध आने वाली शिकायतों के निपटारे की स्थायी एवं पारदर्शी व्यवस्था हेतु एक सचिवालय बनाया जाए, जिसमें शिकायतों को समयबद्ध, पारदर्शी और कारगर ढंग से निपटाया जा सके। लेकिन न्यायपालिका ‘‘अति स्वतंत्र नहीं सिर पर कोई’’ की तर्ज पर अपने को जवाबदेही से पूरी तरह मुक्त रखना चाहती है।

एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का कहना था- ‘‘व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में बड़ा कौन? यह ऐसा प्रश्न है कि दायां पैर बड़ा कि बायां पैर। उनका कहना है कि सबसे बड़ा धर्म होता है, और उसी के अनुसार सभी को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।’’ पर न्यायपालिका है कि सबको तो अपने डंडे से हांकना चाहती है, पर अपने लिए कोई भी युक्तियुक्त नियंत्रण स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यह शुभ लक्षण है कि न्यायपालिका से जुड़े कुछ लोग जिसमें तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी हैं- कॉलेजियम व्यवस्था को अपर्याप्त बताकर उसमें पारदर्शिता एवं सर्वसम्मति की मांग कर रहे हैं। पर यह ‘‘आमने-सामने’’ का टकराव देश के लिए निहायत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। बेहतर होगा कि न्यायपालिका अपना आत्मावलोकन करने का प्रयास करे।