जैसे ही केंद्र सरकार ने लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी और पीएम हारिज के नाम को दरकिनार करते हुए लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत को नया थल सेनाध्यक्ष बनाया, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए राजनीति की शुरुआत कर दी है। फिलहाल थल सेना उपाध्यक्ष बिपिन रावत 31 दिसम्बर को जनरल दलबीर सिंह सुहाग की जगह लेंगे किन्तु ऐसा प्रतीत होता है मानो कांग्रेस ने उनकी नियुक्ति को लेकर सरकार से दो-दो हाथ करने की ठान ली है। कांग्रेस का कहना है कि नए थल सेनाध्यक्ष की नियुक्ति में अनुभव वरीयता का ख्याल नहीं रखा गया। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि लेफ्टिनेंट जनरल रावत की क्षमताओं को लेकर शक नहीं है, लेकिन सरकार को ये जवाब जरूर देना चाहिए कि इस नियुक्ति में उच्च अधिकारियों की अनदेखी क्यों की गई? 

सेनाध्यक्ष की नियुक्ति का निर्णय सरकार के हाथ में होता है। सरकार इस नियुक्ति में तात्कालिक स्थिति तथा योग्य व्यक्ति के अनुभव को मांपदंड बनाते हुए नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। बिपिन रावत की नियुक्ति में भी सरकार की यही सोच रही है। ऐसा नहीं है कि बिपिन रावत के उच्च अधिकारी नकारा हैं या उनकी क्षमताओं पर सरकार को कोई शक है किन्तु वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए रावत की नियुक्ति उचित जान पड़ती है।

इसलिए लेफ्टिनेंट जनरल रावत का चयन

देश के 26वें थल सेनाध्यक्ष बनने वाले रावत सितंबर 2016 में वाइस चीफ बने थे। वाइस चीफ बनने से पहले वह पुणे में सदर्न कमांड के जीओसी इन कमांड थे। लेफ्टिनेंट जनरल रावत सेना में दिसंबर 1978 में शामिल हुए। उन्हें 11 गोरखा राइफल्स की पांचवीं बटैलियन में कमिशन मिला था। रावत के पास अशांत इलाकों में लंबे समय तक काम करने का अनुभव है। बीते तीन दशकों में वह भारतीय सेना में अहम पदों पर काम कर चुके हैं। पाकिस्तान से लगती LoC, चीन से जुड़ी एलएसी और पूर्वोत्तर में वह कई अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। रावत 1986 में चीन से लगे लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर इन्फेन्ट्री बटैलियन संभाल चुके हैं। इसके अलावा वे 5 सेक्टर राष्ट्रीय राइफल्स और कश्मीर घाटी में 19 इन्फेन्ट्री डिविजन की अगुआई भी कर चुके हैं। ब्रिगेडियर के तौर पर उन्होंने कॉन्गो में यूएन पीसकीपिंग मिशन के मल्टीनैशनल ब्रिग्रेड की अगुआई भी की थी। दरअसल, बिपिन रावत को संतुलित तरीके से सैन्य संचालन, बचाव अभियान चलाने और सिविल सोसायटी से संवाद स्थापित करने के लिए जाना जाता है और यही वजह है कि सरकार ने उन्हें उभरती चुनौतियों से निपटने, उत्तर में सेना के पुनर्गठन, पश्चिमी फ्रंट पर लगातार जारी आतंकवाद व प्रॉक्सी वॉर और पूर्वोत्तर में जारी संघर्ष के लिहाज से सबसे सही विकल्प माना है। पाकिस्तान की ओर से जारी आतंकवाद और चीन की अरुणाचल प्रदेश में बढ़ती सक्रियता के चलते रावत का चयन उपयुक्त है। मगर कांग्रेस ने सेना में नियुक्ति को राजनीतिक रंग देकर मानसिक दिवालियेपन का उदाहरण पेश किया है।

फिर जहां तक सेना की नियुक्तियों में उच्च अधिकारियों के मापदंड की बात है तो 1983 में थल सेनाध्यक्ष की नियुक्ति सीनियरिटी को अनदेखा किया गया था। तब जनरल एएस वैद्य को आर्मी चीफ बनाया गया था, जबकि ज्यादा सीनियर ले. जनरल एसके सिन्हा मौजूद थे। तब किसकी सरकार थी यह शायद बताने की जरुरत नहीं है। 1988 में भी एयर मार्शल एमएम सिंह की जगह एसके मेहरा को भारतीय वायुसेना का प्रमुख बनाया गया था किन्तु उस दौर में राष्ट्रीय महत्व के इस मुद्दे पर किसी ने सवाल नहीं उठाये थे। ऐसा प्रतीत होता है मानो नोटबंदी और अपने घटते जनाधार की बौखलाहट में कांग्रेस ने हर उस विषय को विवाद का रंग देना शुरू कर दिया है जिससे सरकार के समक्ष प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न हो।

हालांकि, इस मामले में कांग्रेस ही दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने इस मुद्दों को सेना की साख पर हमला बताया है। वैसे भी सेना के नाम पर राजनीति की मंजूरी किसी को नहीं दी जा सकती। फिर चाहे वह सत्ता पक्ष हो या विपक्ष। कांग्रेस के शासनकाल में सेना को राजनीति में घसीटने का जो चलन शुरू हुआ था वह अब विकृत रूप लेता जा रहा है।

हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और रक्षा मंत्री का सेना को लेकर वाकयुद्ध दुनिया देख चुकी है। ऐसे निरर्थक बयान और सवाल सेना के मनोबल को तोड़ते हैं। देखा जाए तो भारतीय सेना इस समय दो-दो मोर्चो पर लड़ रही है। उसके लिए सीमा की सुरक्षा भी जरूरी है और खुद को राजनीति से बचाना भी। यह दु:खद स्थिति है और ऐसा नहीं होना चाहिए। एक उदाहरण देता हूं- नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीते 60 वर्षों में पहली बार धरती के स्वर्ग का नजारा नरक से भी बदतर नजर आ रहा था। बाढ़ की विभीषिका ने जम्मू-कश्मीर के नैसर्गिक सौंदर्य को लील लिया था। करीब चार लाख लोग जीवन की आस में थे और राज्य सरकार का तंत्र दम तोड़ चुका था। ऐसे में भारतीय सेना ने कमान अपने हाथ में ली व बाढ़ में फंसे लोगों की जिंदगी बचाई। चाहे 16 घंटे में पुल बनाने का कारनामा हो अथवा लोगों को बचाते हुए अपनी जान खो देना, सेना का हर जवान, जो इस आपदा में राहत पहुंचा रहा था, वंदनीय था। सेना का यह जज्बा निश्चित तौर पर देशभक्ति की भावना को कभी मरने नहीं देता। सच्चे अर्थों में सेना का हर सैनिक भारत रत्न है।

सोचिए, जब उस सेना को राजनीतिक दल निजी स्वार्थ के चलते राजनीतिक कलाबाजी में उलझाते हैं तो सैनिकों के मनोबल पर क्या असर पड़ता होगा? अतः कांग्रेस यह सरकार को तय करने दे कि किसे सेना की कमान सौंपनी है और किसे अन्य महत्वपूर्ण मोर्चे पर काम करना है। कांग्रेस अपना घर संभाले जहां बिना किसी योग्यता और वरिष्ठता के किसी भी चाटुकार को बड़े से बड़ा पद दे दिया जाता है। चाटुकारों को पद, यह कांग्रेस के लिए शान की बात होगी; देश की शान सेना है और उस पर राजनीति देश बर्दाश्त नहीं करेगा।