जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला के इस बयान से देश में आक्रोश फैला हुआ है कि पाक अधिकृत कश्मीर उनके बाप का है क्या? यह बयान पूरे देश को चुभ गया है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता अगर पूरे कश्मीर को आजाद या पाकिस्तान का भाग मानते हैं तो यह सहन किया जाता है। देश मान चुका है कि वे भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक हैं। लेकिन फारुख अब्दुल्ला कश्मीर की मुख्य धारा के राजनीतिज्ञ हैं। पहले उनके पिता वहां के मुख्यमंत्री थे। बाद में वे बने और फिर उनका बेटा। वे और उनके पुत्र दोनों केन्द्र में मंत्री रह चुके हैं। ऐसे नेता के मुंह से यह बयान अचंभित करने वाला है। उनसे यह पूछा जाए कि अगर पाक के कब्जे वाला कश्मीर हमारे बाप का नहीं है तो फिर किसके बाप का है? फारुख क्यों भूल गए कि जिस संसद के वे सदस्य रहे हैं उसने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया है कि पाक के कब्जे वाले पाकिस्तान भारत का भाग है और इसमें सम्मिलित करना है। इस तरह फारुख का बयान संसद के प्रस्ताव के भी विरुद्ध है।

फारुख अब्दुल्ला कोई नौसिखिए नेता नहीं हैं कि मान लिया जाए उनके मुंह से अचानक कुछ निकल गया हो या आक्रोश में वे बोल गए हैं। वे उम्र के इस पड़ाव में हैं जहां ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती है। वैसे भी इस भाषण के बाद उन्होंने बयान पर कायम होने की बात कही है। जाहिर है, उन्होंने सोच-समझकर ऐसा बोला है। वर्तमान सरकार ने केवल इतना किया है कि जो संसद का प्रस्ताव है उसके अनुसार उसने काम करने का बयान दिया है। यह पहली बार हुआ है कि जब भारत की किसी सरकार ने पाकिस्तान से कहा है कि आपके कब्जे में हमारे कश्मीर का जो भाग है उसे आप कब खाली कर रहे हैं। अब यह भारत सरकार की नीति है कि पाक अधिकृत कश्मीर, जिसमें गिलगिट बाल्टिस्तान भी शामिल है, के लोगों से संपर्क किया जाए, विदेशों में जो भी वहां के लोग रहते हैं उनके साथ संवाद बनाया जाए तथा उनको संगठित कर उनकी पाकिस्तान से अलग होने की लड़ाई को ताकत दिया जाए। गिलगिट बाल्टिस्तान में पिछले वर्ष जब चुनाव कराए गए तब भी भारत ने पुरजोर विरोध दर्ज कराया। भारत का कहना था कि यह क्षेत्र पाकिस्तान का है ही नहीं तो फिर वह चुनाव क्यों करा रहा है?

यह पाकिस्तान की कश्मीर को अलग करने तथा वहां हिंसा फैलाकर भारत को परेशान करने की नीति का जवाब है। हम उनकी तरह आतंकवाद तो पैदा कर नहीं सकते, लेकिन हम केवल अपने भाग वाले कश्मीर तक उनकी दुर्नीतियों का सामाना करें, उसके परिणामों को भुगतें इससे अच्छा है कि हम उस पार के कश्मीर में भी जितना संभव है करें और उसे मुद्दा बनाएं। अगर पाकिस्तान के लिए इस पार का कश्मीर मुद्दा है तो हमारे लिए उस पार का कश्मीर। पाकिस्तान को जवाब देना का यही सर्वथा उचित तरीका है। हम केवल जवाब दें उसकी बजाय पाकिस्तान को जवाब देने के लिए विवश करें। फारुख का बयान भारत की इस नीति के विरुद्ध है। कश्मीर यदि पाकिस्तान की नजर में तथा फारुख अब्दुल्ला की नजर में विवादास्पद क्षेत्र है तो उसमें पाक अधिकृत कश्मीर भी शामिल है। फिर यह विवादास्पद इसलिए है क्योंकि जब अक्टूबर 1947 में कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत में कश्मीर के विलय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया तो पाकिस्तान ने हड़पने की कोशिश की। उस समय भी इसका फैसला हो गया होता। अगर उस समय के नेताओं ने भावुकता से काम नहीं लिया होता तो आज पाक अधिकृत कश्मीर होता ही नहीं। क्या फारुख अब्दुल्ला इस सच को नहीं जानते कि पाकिस्तान ने कबाइलियों के माध्यम से कश्मीर को कब्जाने की कोशिश की थी और उसमें उसे सफलता नहीं मिली? हम यहां उस इतिहास में नहीं जाना चाहते। यह सच सबको पता है कि आज जो पाक अधिकृत कश्मीर है वह इसलिए है, क्योंकि हमने संयुक्त राष्ट्र संघ को बीच में ला दिया।

यह भारत का दुर्भाग्य है कि यहां फारुख अब्दुल्ला जैसे नेता हैं जो ऐसे बयान देकर अपना ही पक्ष कमजोर करने की कोशिश करते हैं। उनके बयान को पाकिस्तान की मीडिया ने जितना महत्व दिया वह स्वाभाविक है। पाकिस्तान कह रहा है कि कश्मीर पर भारत की नीति पर देश में मतभेद है। इससे दुनिया में भी यह संदेश जाता है कि कश्मीर को लेकर भारत मंें ही एक राय नहीं है। उनको लगता है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री रहा हुआ कोई व्यक्ति इस तरह पाक अधिकृत कश्मीर पर भारत के दावे को नहीं मानता तो हम क्यों मानें। विश्व समुदाय के सामने यह सच तो नहीं है कि फारुख के ऐेसे वक्तव्य पर देश की आम जनता का रुख क्या है।

यह विचार करने वाली बात है कि आखिर फारुख ने इस तरह का वक्तव्य क्यों दिया? उन्हें पता था कि इसके खिलाफ देश में व्यापक प्रतिक्रिया होगी। उन्हें यह भी पता था कि कश्मीर के पाकपरस्त अलगाववादियों को छोड़कर कहीं से उनको समर्थन नहीं मिलने वाला। यह सब जानते हुए उन्होंने यदि बयान दिया है तो इसके कुछ तो कारण होंगे? तो क्या हो सकते हैं वे कारण? क्या सत्ता से बाहर होने के बाद नेशनल कॉन्फरेंस का आत्मविश्वास डोल गया है? उसे लगता है कि उसका जन समर्थन धीरे-धीरे छीज रहा है और उसे वापस लाने के लिए ऐसी बातें बोलना जरुरी है? यह हो सकता है। क्या उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस को सुर्खियों में लाने के लिए ऐसा बोला? क्या कश्मीर में बढ़ते इस्लामिक कट्टरता के सामने यह फारुख अब्दुल्ला जैसे नेताओं का आत्मसमर्पण हैं? ये तीनों कारण हो सकते हैं। कश्मीर के अनेक नेताओं का रवैया दोहरा रहा है। वो दिल्ली में कुछ बोलते हैं तथा घाटी में कुछ। हालांकि अब मीडिया की कृपा से उनकी कोई बात छिपी नहीं रहती। इस कारण उनके लिए जवाब देना कठिन हो जाता है। 

फारुख की बात मानी जाए तो पाक अधिकृत कश्मीर पर हमारा दावा बनता ही नहीं है। तो क्या वे बताएंगे कि पाकिस्तान का दावा कैसे बनता है? वे कहते हैं कि पाकिस्तान इसमें एक पक्ष है और आपको बात करनी होगी। देश की सरकार फारुख अब्दुल्ला के निर्देश में तो नीति निर्धारित नहीं कर सकती फिर भी मान लीजिए उनकी बात कुछ समय के लिए मान भी लिया जाए तो पाकिस्तान से क्या बातचीत होगी? कश्मीर मामले पर आज तक जो बातचीत हुई उसका नतीजा जो है सबके सामने है। फारुख अब्दुल्ला भूल गए कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण उन्हें स्वयं प्रदेश छोड़ना पड़ा था। वे लंबे समय लंदन जाकर रहे। तो पाकिस्तान की नीति साफ है। आप बातचीत करिए या कुछ करिए उसको कश्मीर मुद्दे को सुलगाए रखना है और इसके लिए उसके पास रास्ता यह है कि आतंकवादियों को प्रशिक्षित करके सीमा पार कराते रहो ताकि हिंसा के द्वारा वे कश्मीर को अस्थिर बनाने की कोशिश करते रहे। फारुख यह भी कहते हैं कि जो लोग लंबे समय से उस भाग में रह रहे हैं वो क्यों हमारे साथ आएंगे। विचित्र तर्क है। वो हमारे साथ आएंगे नहीं आएंगे इस पर तो विचार बात में होगा। पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़े वर्ग के अंदर असंतोष है। वहां लोग तमाम दबावों और भय के बावजूद सड़कों पर उतर रहे हैं यह सच है। फारुख अब्दुल्ला को यह दिखाई नहीं देता तो कुछ नहीं किया जा सकता है। हमारी नीति साफ है। हम पाक अधिकृत कश्मीर पर अपने दावे को जोरशोर से उठाएंगे, वहां के पाकिस्तान से असंतुष्ट होकर संघर्ष करने वालों को मदद करेंगे, भारत के पक्ष में आने के लिए उन्हें प्रेरित करेंगे, पाकिस्तान की पकड़ वहां कमजोर हो इसके लिए हर संभव कोशिश करेंगे...। फारुख अब्दुल्ला जैसे लोगों को सलाह होगी कि वे इस तरह पाकिस्तान समर्थक बयान देना बंद करें। उनका बयान अस्वीकार्य और निंदनीय है। देश के लोगों को भी ऐसे बयान के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए। इसका हर ओर से विरोध हो, निंदा के शब्द आएं ताकि दूसरे लोग उनके जैसे बयान देने का साहस तक न कर सकें।