Source: न्यूज़ भारती हिंदी01 Feb 2016 11:45:45

अमित शाह को भाजपा अध्यक्ष के रूप में अगला कार्यकाल मिलेगा इसे लेकर किसी को संदेह नहीं था। वे डेढ़ वर्ष पूर्व भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एकमात्र पसंद थे और आज भी हैं। तो उनकी चाहत के विपरीत किसी और के अध्यक्ष पद पर चयन का प्रश्न ही कहां उठता था। संघ भी मोदी को मुक्त होकर काम करने देने के पक्ष में है और इसलिए पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए उनकी सोच को प्राथमिकता दिया जाना लाजिमी था। लेकिन अगस्त, 2014 में जब अमित शाह ने राजनाथ सिंह का औपचारिक रूप से स्थानापन्न किया तब और आज की परिस्थितियों में गुणात्मक अंतर आ गया है। तब भाजपा नरेन्द्र मोदी की तूफानी लोकप्रियता के वाहन में सत्ता तक पहुंची थी। उनके कार्यकाल का हनीमून था। चारों ओर उम्मीद और आशावाद की लहर थी। मोदी के समर्थन में अभूतपूर्व जन आलोड़न का दौर था। स्वयं अमित शाह ने उत्तर प्रदेश प्रभारी के रूप में आशातीत सफलताएं दिलवाईं थीं। वैसी लोकप्रियता और सफलता के काल में अंतर्निहित या सामने खड़ी चुनौतियों का सहसा अहसास नहीं होता। संयोग से उसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड चुनाव में पार्टी को सफलताएं भी मिली। इन सफलताओं में अध्यक्ष के रूप में उनकी महिमा बढ़नी ही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी की सभा में उन्हें अबतक का सबसे सफल अध्यक्ष तक कह दिया।  

जरा आज की परिस्थितियों पर नजर दौड़ाइए। 2016 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी का सफाया हो गया तो बिहार में वह अपनी पुरानी स्थिति भी बरकरार रखने में सफल नहीं रही। यही नहीं हाल के कुछ राज्यों के स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन काफी बुरा रहा है। इसमें मोदी और अमित शाह का गृह प्रदेश गुजरात भी शामिल है। जाहिर है, दोनों समय की तुलना करें तो एकदम दो ध्रुवों जैसी स्थिति नहीं तो लगातार बढ़तीं गुणात्मक प्रतिकूलताएं साफ दिखाई देंगी। कम से कम इतना तो अमित शाह भी स्वीकार करेंगे कि अगस्त, 2014 की अनुकूलता की स्थिति आज नहीं है। लोकप्रियता का तूफान धीमा पड़ा है। सरकार के हनीमून का काल अब खत्म हो चुका है। वास्तव में अध्यक्ष की नेतृत्व क्षमता, प्रबंधन व रणनीतिक कौशल...सबकी असली परख का दौर तो इस नए कार्यकाल में ही होगी। चुनावी दृष्टि से देखें तो इस वर्ष पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी विधानसभा का चुनाव है। इसमें असम को छोड़कर भाजपा कहीं से भी उम्मीद नहीं कर सकती है। किंतु यह कहकर तो आप अपने को बरी नहीं कर सकते कि इन राज्यों में हमारा कुछ दांव पर था ही नहीं। अगर इन चुनावों में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन नहीं किया तो फिर विपक्ष का सरकार पर दबाव बढ़ेगा। इससे बचाने की जिम्मेवारी अमित शाह एवं मोदी की जोड़ी की है। वैसे भी केरल में अमित शाह और मोदी दोनों पूरा जोर लगा रहे हैं। इन राज्यों में प्रदर्शन अच्छा नहीं हुआ तो अर्थ यही लगाया जाएगा कि पार्टी की महिमा क्षीण हो रही है और हार का दौर जारी है। इसका जवाब पार्टी अध्यक्ष के रूप में अमित शाह को ही देना होगा। इसके बाद 2017 में उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर फिर हिमाचल प्रदेश एवं गुजरात का भी चुनाव है। इनमें मणिपुर को छोड़कर सारे राज्यों में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होगी। यहां अमित शाह के लिए करो या मरो की स्थिति होगी। यही स्थिति 2018 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान एवं कर्नाटक विधानसभा चुनाव में होगी। तो कुल मिलाकर 2018 तक 15 राज्यों के विधानसभा चुनावों का सामना भाजपा को अमित शाह के पार्टी नेतृत्व में करनी है। 

इसके बाद बताने की आवश्यकता नहीं है कि इस दूसरे कार्यकाल में अमित शाह के सामने चुनौतियां कितनी बड़ी हैं। अगर अमित शाह एवं मोदी यह स्वीकार कर लेते हैं कि वर्तमान पार्टी एवं सरकार में जो चेहरे हैं उनकी बदौलत इन चुनौतियों को पार पाना संभव नहीं तो वे पार्टी के सांगठनिक एवं वैचारिक पुनर्गठन तथा उसके बाद सरकार के पुनगर्ठन के लिए बड़े कदम उठाएंगे। बड़े कदम का अर्थ है व्यापक बदलाव। इसकी आवश्यकता साफ दिखाई दे रही है। पार्टी में प्रमुख पदों पर दो तीन लोगों को छोड़ दें तो वही चेहरे विद्यमान रहे हैं जो पहले से रहे हैं। अगर ये सब इतने ही योग्य होते तो 2004 में और फिर 2009 में पार्टी की वैसी पराजय नहीं होती। अमित शाह ने अध्यक्ष बनने के बाद जो टीम बनाई उसमें तीन चार लोगों को छोड़कर शेष चेहरे लगभग वही रहे। जो नए आए उनका प्रदर्शन भी ऐसा नहीं रहा जिनसे उम्मीद की जाए। यही स्थिति सरकार की थी। मोदी ने भी जो लोग उपलब्ध थे उनमें ही मंत्रालयों के बंटवारे कर दिए। मोदी सामान्य कार्यों के साथ जिस तेज गति से कुछ मौलिक, कुछ सामान्य बदलाव के कदम उठाने की कोशिश कर रहे हैं उन सबको आधार देने की स्थिति न पार्टी की है और न सरकार में दिखने वाले चेहरे ही उसके अनुरूप दौड़ लगाने की क्षमता प्रमाणित कर पाए हैं। उनमें एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो समय की आवाज और मोदी के आगाज को ठीक से समझ भी नहीं पाया है। इनका पूरा सरोकार यहीं तक सीमित है कि किसी तरह अपना पद और कद बना रहे। ऐसी टीम से आप बड़ा लक्ष्य तो छोड़िए सामान्य चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते। इसके विपरीत इनके कारण आपकी चुनौतियां बढ़तीं हैं। नेता का अर्थ है जनता के बीच काम करते हुए निकला हुआ लोकप्रिय चेहरा। ऐसे कितने चेहरे इस समय पार्टी एवं सरकार में हैं? अगर नहीं हैं तो आपको लाना होगा। नहीं लाएंगे तो फिर चारों खाने चित्त गिरेंगे। 

अमित शाह ने 9 अगस्त, 2014 को पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के अपने पहले अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि मोदी जी के कांग्रेस मुक्त भारत के साथ हमें भाजपा युक्त भारत बनाना है, विपक्ष की मानसिकता से बाहर निकलनी है तथा सत्तारुढ़ दल की तरह व्यवहार करना है। भाजपा युक्त भारत के लिए पार्टी मशीनरी को पूर्ण गतिशील बनाने और उसके द्वारा जन आलोड़न पैदा करने की आवश्यकता है। क्या अमित शाह पार्टी में नए चेहरे के साथ वैसा कलेवर देने पर विचार कर रहे हैं? इसका परीक्षण टीम के गठन से ही हो जाएगा। क्या पार्टी अपने साथ सरकार के पुनर्गठन के लिए भी वैसे लोग उपलब्ध करा पाने की स्थिति में पहुंच पाएगी? आखिर सरकार में भी तो पार्टी से ही लोगों को लिया जाएगा। ये ऐसे प्रश्न है जिन पर भाजपा का आगामी राजनीतिक और चुनावी प्रदर्शन निर्भर है। सत्तारूढ़ पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती होती है, सरकार और संगठन में तालमेल। इस मामले में अमित शाह का पहला कार्यकाल बुरा नहीं तो आदर्श भी नहीं रहा है। सरकार और पार्टी तथा सरकार और कार्यकर्ता के बीच दूरी बढ़ी है। सरकार की छवि केवल सरकारी जन संचार माध्यमों के यांत्रिक प्रचार से बेहतर नहीं होती। जनता की नजर में बेहतर बनाए रखने में पार्टी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह तभी हो सकता है जब पार्टी में संतुलित, विषयों के जानकार, जनता की नब्ज पहचानने वाले, देश की अंतर्धारा को समझने वाले तथा पार्टी के प्रति समर्पित निष्ठावान और व्यवहार कुशल लोगों की टीम हो। अगर मोदी और अमित शाह की सोच इस दिशा में जाती है तो उनको परिश्रम करके ऐसे लोगों की तलाश करनी होगी और वे मिल भी जाएंगे। अगर सोच नहीं जाती है तो फिर कुछ भी उम्मीद करना बेमानी होगा।