जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कुछ विद्यार्थियों ने आतंकवादी अफजल गुरु और मकबूल भट्ट की याद में कार्यक्रम किया। दोनों आतंकियों को शहीद का दर्जा दिया गया। अभिव्यक्ति की आज़ादी यहीं नहीं थमी। जेएनयू परिसर में खुलेआम पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाये गए। कितने दुर्भाग्य की बात है कि एक तरफ देश का जवान हनुमंथप्पा अस्पताल में मौत से संघर्ष कर रहा है वहीं दूसरी तरफ इसी देश के कुछ युवा देशद्रोहियों को शहीद का दर्जा दे रहे हैं। यह किस तरह की विचारधारा है? देश को लज्जित करने वाले इस आयोजन के पीछे वामपंथी विचारधारा से पोषित विद्यार्थी हैं। क्या वामपंथ देशद्रोह की सीख देता है? क्या वामपंथ आतंकियों का सम्मान करना सिखाता है? वामपंथियों को एक बार ठीक प्रकार से आत्मचिंतन करना चाहिए। सड़ांध मार रही अपनी विचारधारा को थोड़ा उलट-पलट कर देख लेना चाहिए। खुद को इस देश से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। आखिर न्यायालय से दोषी करार दिए गए अपराधियों को शहीद कहना, किस तरह सही ठहराया जा सकता है? उनको हीरो साबित करके ये विद्यार्थी क्या सन्देश देना चाह रहे हैं? क्या गैरजिम्मेदार अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहने वाले बता सकते हैं कि इस तरह के आयोजनों को देशद्रोह क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु और जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में शामिल मकबूल भट्ट के समर्थन में मार्च निकालने वाले लोगों को क्यों नहीं देशद्रोही माना जाना चाहिए? क्यों नहीं इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए? शिक्षा संस्थानों को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का अड्डा बनने से बचाना होगा। अखिल भारतीय विधार्थी परिषद् ने जेएनयू प्रशासन से कार्यक्रम के आयोजक छात्रों को निष्कासित करने की मांग की है। फिलहाल तो प्रशासन ने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं। जेएनयू प्रशासन के अधिकारियों ने माना है कि छात्रों की यह हरकत 'अनुशासनहीनता' है और देश के विघटन की कोई भी बात 'राष्ट्रीय' नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि जेएनयू के मुख्य प्रॉक्टर की अध्यक्षता वाली समिति मामले की जांच कर अपनी रिपोर्ट देगी। जेएनयू के कुलपति जगदीश कुमार ने कहा, 'अधूरी सूचना देकर कार्यक्रम की इजाजत मांगी गई थी। लिहाजा, यह अनुशासनहीनता है। मुख्य प्रॉक्टर की अध्यक्षता वाली समिति कार्यक्रम के फुटेज की जांच करेगी और वहां मौजूद रहे लोगों से बात करेगी। रिपोर्ट के आधार पर विश्वविद्यालय उचित कार्रवाई करेगा।'

गौरतलब है कि विद्यार्थी परिषद् की सजगता के कारण ही यह आयोजन विस्तार नहीं ले सका। वरना तो झूठों का समूह सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर अनुमति लेकर राष्ट्र विरोधी कार्यक्रम का सफल आयोजन कर लेता। विद्यार्थी परिषद् ने जेएनयू परिसर में चस्पा पोस्टर देखकर कार्यक्रम के पीछे का उद्देश्य भांप लिया। परिषद् के कार्यकर्ताओं ने इस कार्यक्रम पर अपना विरोध जताया और कुलपति को पत्र लिखकर कहा कि किसी शैक्षणिक संस्था में इस तरह के आयोजन नहीं होने चाहिए। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मार्च को रद्द करने का आदेश जारी किया। इसके बाद भी वामपंथी छात्र संगठनों के समर्थन से मार्च निकाला गया और पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाये गए। जम्मू-कश्मीर को भारत से 'आज़ाद' करने की मांग की गयी। भारत वापस जाओ के नारे लगाये गए। कोई बता सकता है कि यह किस तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी है? बहरहाल, वामपंथियों की इसी तरह की विचारधारा और नकारात्मक मानसिकता के कारण जेएनयू बदनाम होता आया है। छात्रों की घटिया हरकत की पूरे देश में निंदा हो रही है। सबसे पहले इन छात्रों के अभिभावकों को ध्यान देना चाहिए कि उनके बच्चे किस राह पर आगे बढ़ रहे हैं? जेएनयू प्रशासन और केंद्र सरकार को भी चिंता करनी होगी कि शिक्षा के मंदिर दूषित न हों। ढोंगी बुद्धिवादियों की ओर से तमाम आलोचनाओं को झेलने का साहस दिखाते हुए सरकार को इस तरह की गतिविधियों को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने चाहिए। किसी भी नजरिये से यह सब देश हित में नहीं है।