जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में देश विरोधी नारेबाजी के आरोप में छात्र संगठन के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को वामपंथी नेताओं से लेकर अरविन्द केजरीवाल और राहुल गांधी गलत बता रहे हैं। वामपंथी नेताओं के पेट में दर्द क्यों उठा है? यह समझ आता है। भारत को अपमानित करने का आयोजन जिन विद्यार्थियों ने किया है, वे वामपंथी विचारधारा के ही हैं। वैसे, भी वामपंथी विचारक हमेशा ही राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को अभिव्यक्ति की आजादी की ढाल देने का प्रयास करते हैं। देश विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने का वामपंथी इतिहास सबके सामने है। आजादी के आंदोलन में वाम विचारक अंग्रेजों की जी-हुजूरी कर रहे थे। अंग्रेजों के लिए जासूसी तक का काम वामपंथियों ने किया है। महान देशभक्त और देश के नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को गाली देने वाले लोग कौन हैं? नेताजी को ‘तोजो का कुत्ता’ किसने कहा? वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध में वामपंथी किसके साथ खड़े थे? जब सारा देश अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ा रहा था, उनके लिए दुआयें कर रहा था तब वामपंथी चीन के साथ खड़े नजर आए थे। इसलिए उनसे कोई अपेक्षा देश को नहीं है। देश उनके लिए कभी प्राथमिकता में रहा ही नहीं है। यह उनके पतन का कारण भी है। 

लेकिन, अरविन्द केजरीवाल और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी देश को बर्बाद करने की कसम उठाने वाले अराजक तत्वों (इन्हें विद्यार्थी कहना ही गलत है) का समर्थन करके क्या साबित करना चाहते हैं? जिस घटना की निंदा पूरा देश कर रहा है, आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी उसके समर्थन में आवाज बुलंद कर रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा है कि 'निर्दोष' छात्र को गिरफ्तार करवाकर नरेन्द्र मोदी ने बहुत बड़ी गलती की है। भले ही यह कार्रवाई स्वाभाविक है लेकिन, केजरीवाल को सोते-जागते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही दिखाई देते हैं। उन्हें अपनी ही पार्टी के स्टार प्रचारक और लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास को देख-सुन लेना चाहिए था। कुमार विश्वास का स्पष्ट मत है कि इस तरह की हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, देशद्रोहियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए। कुछ यही मत कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी सहित एक-दो नेताओं का भी है। लेकिन, कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी कुछ और ही सोचते हैं। 'पाकिस्तान जिन्दाबाद और हिन्दुस्तान बर्बाद हो' का नारा बुलंद करने वाले विद्यार्थियों का समर्थन करके राहुल गांधी ने साबित कर दिया है कि वह इस देश को ठीक से नहीं समझ पाए हैं। भारत का आम आदमी अपने देश से बहुत प्रेम करता है। वह किसी भी कीमत पर देश के लिए गालियां नहीं सुन सकता। 

सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने भी जेएनयू परिसर में बढ़तीं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर दु:ख जताया है। दिल्ली और उसके आसपास के निवासियों ने भी इस घटना पर विरोध जताया है। लोगों ने जेएनयू के छात्रों को मकान खाली करने के नोटिस थमा दिए हैं। देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। लेकिन, यह सब राहुल गांधी को दिखाई नहीं दे रहा है। राहुल गांधी बड़ी बेशर्मी के साथ जेएनयू परिसर में पहुंचते हैं और भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल युवकों का समर्थन करते हैं। 'आपकी आवाज दबाकर सरकार सबसे बड़ा देशद्रोह कर रही है।' यह बयान देकर राहुल गांधी भारत विरोधी नारेबाजी का समर्थन करते दिखाई दे रहे हैं। यानी राहुल गांधी भी मानते हैं कि आतंकवादी अफजल और मकबूल भट्ट शहीद हैं। भारत को बर्बाद हो जाना चाहिए। जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान को दे दिया जाना चाहिए। राहुल गांधी ने अराजक विद्यार्थियों को हौसला दिया है कि वह जो कर रहे हैं, उसे आगे भी करते रहें। राहुल गांधी के जेएनयू जाने और अराजक विद्यार्थियों के समर्थन में खड़े होने से देश में कांग्रेस की साख एक बार फिर कमजोर हुई है। राहुल गांधी के इस तरह के व्यवहार से कांग्रेस के प्रति रहा-सहा सम्मान भी लगातार कम होता जा रहा है। 

कांग्रेस के युवराज को समझना होगा कि भारत में इस तरह की राजनीति स्वीकार नहीं है। वामपंथी दल और भारतीय जनता पार्टी के इतिहास का अध्ययन राहुल गांधी को करना चाहिए। उन्हें समझ आएगा कि भारतीय परंपराओं के निरादर के कारण आज वामपंथी दलों की क्या स्थिति है, वहीं भारतीय मूल्यों का सम्मान करने के कारण भाजपा कहाँ है। राहुल चाहते हैं कि भारत कांग्रेस मुक्त न हो, तो कांग्रेस की राजनीति को भारतीय मूल्यों से युक्त होना होगा। राहुल गांधी को अपने आसपास से चापलूसों की फौज हटाकर अकेले ही एक बार देश का मिजाज समझने के लिए देशाटन पर निकल जाना चाहिए। शायद तब उन्हें समझ आएगा कि सवा सौ करोड़ भारतवासियों के लिए यह देश मात्र भूखण्ड नहीं है। उनके लिए माँ है भारत। राष्ट्र देवता है। अपनी माँ के खिलाफ यह देश अपशब्द नहीं सुन सकता। देशद्रोहियों के समर्थन में खड़े होने वाले भी देशद्रोही ही माने जाते हैं। 

- लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।