केरल के कन्नूर जिले में बीते सोमवार की रात को वामपंथी गुण्डों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नौजवान कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या कर दी। लेकिन, कहीं से प्रतिरोध की कोई आवाज नहीं आई। असहिष्णुता के नाम पर देश को बदनाम करने का षड्यंत्र रचने वाले बुद्धिजीवी भी न जाने किस खोल में छिपकर बैठ गए हैं? अवार्ड वापसी तो छोडि़ए किसी ने इस घटना की निंदा तक नहीं की है। सबकी संवेदनाएं न जाने कहाँ चली गईं? तिल का ताड़ बनाने वाले मीडिया संस्थान भी इस जघन्य अपराध पर बहस नहीं करा रहे हैं? दिल्ली से दादरी और हैदराबाद दौड़ लगाने वाले संकीर्ण मानसिकता के नेताओं ने भी आँख मूंद ली हैं। उन्हें हिन्दुओं के भगवान हनुमान का मजाक बनाने और जेएनयू के देशद्रोहियों का समर्थन करने से फुरसत नहीं है। यह कैसी निष्पक्षता है? यह कैसी संवेदनशीलता है? यह कैसी असहिष्णुता है? कुछ घटनाओं पर यह उबाल मारने लगती है जबकि वैसी ही कुछ घटनाओं पर ठण्ड पकड़ लेती है। यह दोगलापन नहीं तो क्या है? क्या इस तरह यह देश चल सकता है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता पीवी. सुजीत की उम्र ही क्या थी? महज 27 साल। पूरी जिन्दगी पड़ी थी उसके सामने। सुजीत के बूढ़े माता-पिता ने अनेक सपने संजोए होंगे। दुर्भाग्य देखिए, उन्हीं बूढ़ी आँखों के सामने उनके लाल को वामपंथी गुण्डे बेरहमी से मार देते हैं। आतंकी मानसिकता के यह अपराधी सुजीत के माता-पिता और भाई को भी मार-मारकर जख्मी कर देते हैं। इतने जघन्य अपराध पर भी देश का बुद्धिजीवी तबका गुड़ खाए बैठा है। देश देख रहा है कि कैसे सारी असहिष्णुता केरल आते-आते सहिष्णुता में बदल जाती है? केवल भारतीय जनता पार्टी और संघ से जुड़े बुद्धिजीवियों ने इस घटना की निंदा की है। हड़ताल की चेतावनी दी है। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने इस घटना के लिए माकपा के नेताओं को जिम्मेदार बताया है। भाजपा की यह बात पुलिस की प्रारंभिक जाँच में सही साबित हुई है। पुलिस ने इस मामले में छह लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार लोगों का संबंध मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से है।

ध्यान रहे कि वामपंथी शासन में विरोधी विचारधार के लोगों की हत्या लम्बे समय से की जाती रही है। भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया में वामपंथ का इतिहास हत्या और हिंसा की राजनीति का है। केरल में ही आरएसएस और भाजपा के 200 से अधिक कार्यकर्ता लाल आतंक का शिकार हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में हुई राजनीतिक हत्याओं को इसमें जोड़ दें तो आम आदमी के रोंगटे खड़े हो जाएंगे। वामपंथी विचारधारा का करीब से अध्ययन किया जाए तो हम पाएंगे कि इसकी बुनियाद में ही हिंसा है। कम्युनिस्टों के आदर्श ब्लादिमिर इल्या उल्वानोव उपाख्य लेनिन की सार्वजनिक घोषणा हमें याद करनी चाहिए-'जो कोई भी नई शासन व्यवस्था का विरोध करेगा, उसे उसी स्थान पर गोली मार दी जाएगी।' वामपंथ में विरोधी विचारधारा के लिए किंचित भी जगह नहीं है। यही कारण है कि कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था में विरोधियों के खून से लाल क्रांति की जाती है। भाजपा के शासनकाल में कोई थोड़ा ऊपर-नीचे बयान भी दे दे तो बुद्धिवादी 'फासीवाद आ गया-फासीवाद आ गया' चिल्लाने लगते हैं। लेकिन, लाल आतंक पर मासूम बन जाते हैं।

जेएनयू में देशद्रोही घटना पर उचित कार्रवाई होने पर वामपंथी नेता सीताराम येचुरी को आपातकाल का अनुभव होने लगता है। लेकिन, जब केरल में एक राष्ट्रभक्त नौजवान की जघन्य हत्या कर दी जाती है तब उनके मुंह से बोल नहीं फूटते हैं। देश में जिन बुद्धिवादियों को अचानक से असहिष्णुता दिखाई देने लगी है, वे सब जान लें कि यह असहिष्णुता नहीं है बल्कि इस दोगले चरित्र की मुखालिफत है। शोषण और अत्याचार पर बुद्धिवादियों की चुप्पी के खिलाफ अब देश बोलने लगा है। यह देश क्यों बोल रहा है? यही बात बुद्धिवादियों को अखर रही है। लेकिन, अब देश इस तरह की घटनाओं के खिलाफ उठकर खड़ा हो रहा है। अवार्ड वापसी गैंग भले ही लाल आतंक पर खामोश रह जाए लेकिन देश बोलेगा। 

- लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में कार्यरत हैं।