जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय या जेएनयू इस समय राजनीतिक कलाबाजी का केन्द्र बन गया है। इतने नेताओं का छात्रों के बीच जाने का दृश्य इसके पूर्व कम ही देखा गया होगा। जिस तरह वामपंथी, जनता दल यू और कांग्रेस के नेताओं ने वहां भाषण दिया है, देशद्रोह के आरोपी छात्रों का बचाव किया है, सरकार पर हमला किया है उन सबका पहला निष्कर्ष यही है कि यह देशद्रोह का नारा लगाने वाले छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई से आगे निकलकर राजनीतिक टकराव में परिणत हो गया है। संसद और उसके बाहर इसकी प्रतिगूंज हमें सुनाई पड़ेगी। किंतु यदि देश की नब्ज टटोलें तो राजनीतिक पार्टियों से परे लोगों के अंदर जेएनयू में भारत विरोधी एवं आतंकवादियों के पक्ष में नारा लगाने वाले छात्रों के खिलाफ जैसा आक्रोश था वैसा ही इन नेताओं के खिलाफ भी जा रहा है। संदेश यह जा रहा है कि ये नेता भारत को तोड़ने और आतंकवादियों के समर्थन में नारा लगाने वालों के विरोध में आने की जगह अपनी सरकार विरोधी राजनीति की आग झोंक रहे हैं। शायद कई लोग इससे सहमत नहीं हों लेकिन जनता के बीच अगर वे जाएंगे तो उन्हें इसे स्वीकार करना होगा। देशभर में आक्रोश का माहौल है। केन्द्र सरकार भी यदि कड़ा बयान देने या इन छात्रों के विरुद्व कड़ी कार्रवाई को तैयार हुई तो उसका कारण देशव्यापी गुस्से का दबाव ही था। 

हालांकि वामपंथी दलों के नेताओं का आचरण समझ में आनेवाला है, क्योंकि ज्यादातर छात्र उनके संगठन से संबद्ध है। जेएनयू छात्र संघ का गिरफ्तार अध्यक्ष कन्हैया भाकपा के एआईएसएफ का नेता है। अपने कार्यकर्ता को बचाने तथा संगठन को बनाए रखने की उनकी छटपटाहट समझ में आती है। अगर वे अपने कार्यकर्ता के साथ इस समय खुलकर खड़े नहीं होंगे, राजनीतिक गोलबंदी की कोशिश नहीं करेंगे तो उनका छात्र संगठन धाराशायी हो सकता है। इसलिए उनका जेएनयू जाना, पुलिस की कार्रवाई का विरोध करना चिंताजनक तो है, अस्वाभाविक नहीं। ऐसा वे न करते तो अस्वाभाविक होता। लेकिन जनता दल यू और कांग्रेस का रवैया समझ से परे है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने वहां जो भी भाषण दिया वह पहली नजर में हैरत में डालने वाला है। कांग्रेस पार्टी ने देश में सबसे ज्यादा समय तक राज किया है। आतंकवाद का आरंभ भी उसके शासनकाल में हुआ, आतंकवाद से सबसे ज्यादा युद्व उसे करना पड़ा है तथा इंदिरा गांधी एवं राजीव गांधी दोनों उसी आतंकवाद का शिकार हुए। ऐसे में यदि राहुल गांधी पुलिस की या सरकार की कार्रवाई का विरोध करते हैं, उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार देते हैं तो इससे भय पैदा होता है।  

देश को यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस के शासनकाल में ही अफजल गुरु की दया याचिका राष्ट्रपति ने खारिज की एवं उसे फांसी पर चढ़ाया गया। यह मनमोहन सरकार का निर्णय था। तो क्या कांग्रेस अपने निर्णय को वाकई न्यायिक हत्या का भाग मानती है? आखिर जो पोस्टर निकले थे उसमें यही लिखा हुआ था। ये सवाल देश अवश्य पूछेगा। राहुल गांधी एवं कांग्रेस शायद जेएनयू जाते वक्त यह भी भूल गए कि 1980 के दशक के खूंखार आतंकवादी मकबूल बट्ट को भी फांसी पर इंदिरा गांधी के शासनकाल में चढ़ाया गया था। आतंकवादियों ने मकबूल बट्ट को रिहा कराने के लिए राजनयिक रविन्द्र म्हात्रे का पहले अपहरण कर लिया लेकन इंदिरा गांधी झूकी नहीं। म्हात्रे की हत्या हो गई लेकिन इंदिरा ने मकबूल बट्ट को जिन्दा नहीं रहने दिया। राहुल गांधी को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि अगर उनके शासनकाल में इस तरह के नारे खुलेआम लगते तो वे क्या करते? क्या ऐसे नारों पर उनकी सरकारें आंखें मूंदे रखती या कानूनी एजेंसियों को अपना काम करने की छूट देती? क्या हमारे नेताओं की स्मृति इतनी कमजोर है कि वे 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर हुआ हमला भूल गए? उस समय कौन संसद के अंदर या बाहर था जिसके अंदर भय पैदा नहीं हुआ या जिसने गुस्सा प्रकट नहीं किया? जो जनता दल आज पुलिस कार्रवाई के विरोध में शामिल है वह उस समय सरकार का हिस्सा थी। उसके काल में ही अफजल गुरु गिरफ्तार हुआ और उसे सजा मिलने की न्यायालय से शुरुआत हुई। आज यदि वह अफजल गुरु के पक्ष में नारा लगाने वालों के साथ खड़ी होती है तो इससे नया डर पैदा होता है। 

माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी पुलिस कार्रवाई की तुलना आपातकाल में हुई छात्रों कि गिरफ्तारियों से कर रहे हैं। कहां है आपातकाल? आपातकाल इंदिरा गांधी के द्वारा लगाया था और उसके पीछे के कारण सबको ज्ञात है। उनके चुनाव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था, छात्रों का आंदोलन चरम पर बढ़ रहा था। ऐसी कोई स्थिति इस समय नहीं है। दूसरे, आपातकाल लगने के बाद देश के अनेक क्षेत्रों में पुलिस राज जैसी स्थिति थी दिल्ली इसका सबसे बड़ा केन्द्र था। यहां पुलिस सरकार के इशारे पर कार्रवाई करती थी। इस समय जेएनयू में केवल उन छात्रों को पकड़ा गया है या उनकी ही तलाश पुलिस कर रही है जिनने खुलेआम देशद्रोही नारे लगाए। शेष छात्रों की आजादी वैसे ही कायम है। इसलिए आपातकाल कहकर खतरनाक सच को झुठलाने की कोशिश येचुरी कर रहे हैं। राहुल गांधी की भाषा भी वैसी ही थी लेकिन वे आपातकाल शब्द प्रयोग नहीं कर सकते थे, क्योंकि इसे उनकी सरकार ने ही लागू किया था। आखिर ये नेतागण किसलिए जेएनयू गए थे या जा रहे हैं? वामपंथी एवं जनता दल यू के नेताओं ने तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिलकर गिरफ्तार छात्रों को रिहा करने की मांग की। क्यों? क्यों नहीं ये न्यायिक कार्रवाई की प्रतीक्षा करते हैं? आखिर न्यायालय ने बिना आधार के तो कन्हैया को तीन दिनों की पुलिस हिरासत में नहीं भेजा। माननीय न्यायाधीश ने पूछा कि तुमको देश से क्या समस्या है कि देश को तोड़ने का नारा लगा रहे थे या उनका समर्थन कर रहे थे? तो ये बाहर कुछ भी बोलें न्यायालय तो तथ्यों के आधार पर ही काम करती है। 

विडम्बना देखिए कि ये सारे नेता एक ओर तो भारत विरोधी नारों की निंदा करते हैं, लेकिन दूसरी ओर ये नारा लगाने वाले को निर्दोष बताते हैं। मान लीजिए कोई नारा के समय चुप रहा, लेकिन जो कार्यक्रम आयोजित था उसका पोस्टर ही देश विरोध था और उसे प्लेटफार्म उपलब्ध कराना देशविरोधी कार्रवाई में आगा। एक ओर ये कहते हैं कि विश्वविद्यालय को राजनीति से दूर रखा जाए और खुद वहां जाकर राजनीतिक आग सुलगाते हैं। यह और कुछ नहीं कुत्सित राजनीति है। इसका तो समर्थन किया जा सकता है कि यदि कोई निर्दोष है तो उसके खिलाफ कार्रवाई न हो। इसका भी समर्थन होना चाहिए कि दबाव में जो दोषी नहीं है उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई न करे। किंतु भारत विरोधी नारा लगाते पूरे देश ने सुना है। इस तर्क का कोई अर्थ नहीं कि यह वीडियो कहां से आया? प्रश्न यह किया जाना चाहिए कि वीडियो में जो कुछ दिख रहा है वह सच है या नहीं? इसका उत्तर है कि वीडियो सच है। 

वास्तव में राजनीतिक दलों और नेताओं का यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे मामले में, जहां खुलेआम कश्मीर को भारत से अलग करने का नारा लगाया गया हो, जहां भारत को बर्बाद करने तक जंग जारी रखने का ऐलान किया गया हो, जहां संसद हमले के अपराधी अफजल गुरु तथा मकबूल बट्ट के पक्ष में नारे लगाए गए हो, उसमें पूरी राजनीति को साथ खड़ा होना चाहिए ताकि दूसरे ऐसा करने का दुस्साहस न करें। सामूहिक एकजुटता का संदेश ऐसे मामले में जाना चाहिए। देशविरोधियों को लगना चाहिए था कि चाहे कश्मीर हो या आतंकवाद उस पर हमारी राजनीति पूरी तरह एक साथ है। यह भारत की त्रासदी है कि देशद्रोह के मामले में भी हमारी राजनीति ऐसे बंटी हुई है जिनसे देश विरोधी तत्व प्रसन्न हो रहे होंगे। आखिर हमारी राजनीति कहां जा रही है? इस तरह राजनीतिक मतभेद या वैरभाव में नेतागण यदि विवेक खो दें, देश का हित-अहित भूल जाएं, देश विरोधी गतिविधियां करने वालों के खिलाफ कानून को नकारने लगे तो फिर भारत बचेगा कैसे? इसका जवाब इन सबको देना होगा।