भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान है, लेकिन इस ढांचे को किसी भी स्तर पर विश्वस्तरीय नहीं माना जाता। इसकी सरंचना को विश्वस्तरीय बनाने की दृष्टि से कोशिशें तेज जरूर हो गई हैं। सुविधा संपन्न तेज गति की प्रीमियम और बुलेट ट्रेनों की बुनियादी शुरुआत हो गई है। अब रेल यात्रा को आधिकारिक रूप से सुविधाजनक, सुरक्षित व यात्री फ्रेंडली बनाने पर जोर संभवतः अगले सप्ताह आने वाले रेल बजट में दिखाई देगा।

स्टेशनों के आधुनिकीकरण की चुनौती भी नई चुनौतियों में शामिल है। किंतु इसका विपरीत पहलू यह भी हो सकता है कि इन सुविधाओं की कीमत यात्रियों से ही वसूली जाए। इस नाते इस बजट में वरिष्ठ नागरिकों को वातानुकूलित डिब्बों में मिलने वाली छूट से वंचित किया जा सकता है। साथ ही यदि इस साल सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें रेलवे में लागू होती हैं तो 40,000 करोड़ के इस अतिरिक्त बोझ की भरपाई के लिए यात्री किराए में 10 और मालभाड़े में 5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। नई चुनौतियों के अनुरूप रेलवे ढले, इस लक्ष्य में यह आशंका भी है कि कहीं आम आदमी ही नहीं, निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति की पहुंच से भी रेलवे की दूरी न बढ़ती चली जाए।

देश में आज भी रेल सार्वजनिक छोटी व लंबी यात्रा का सबसे सस्ता माध्यम है। आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद मध्यवर्गीय युवा आजीविका के लिए दूरांचलों में रोजगार करने को विवश हुआ है। इसलिए रेलों में आवाजाही के लिए भीड़ बढ़ने के साथ उच्चस्तरीय मांगें भी बढ़ी हैं। ऐसा इसलिए भी हुआ है क्योंकि चीन व जापान समेत पूरी दुनिया में रेलवे में विस्तार, गति और सुविधाएं हैरतअंगेज हैं। इनकी तुलना में हम वाकई पिछड़े हैं। आम आदमी रेल का टिकट ले भी ले तो उसे सीट की बात तो छोड़िए, ठीक से खड़े होने की जगह भी नसीब नहीं होती। इस आपूर्ति के लिए 45,000 डिब्बों की अतिरिक्त जरूरत है। अतिरिक्त रेल लाइनें बिछाने के साथ इकहरी लाइनों का दोहरीकरण भी जरूरी है, जिससे रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ाई जा सके।

इन बुनियादी सुविधाओं को जमीन पर उतारने की बजाय हमारे यहां अहमदाबाद से मुंबई बुलेट ट्रेन चलाने की बात पर कहीं ज्यादा जोर है। यात्री गाड़ियों को लेकर अकसर रोना रोया जाता है कि ये रेलें केवल आम आदमी की सुविधा एवं सेवा की दृष्टि से घाटे में चलाई जा रही हैं। नतीजतन इन्हें नियमित चलाने के लिए एक यात्री रेल पर दो मालगाड़ियां चलानी पड़ती हैं। इन गाड़ियों का घाटा बढ़ा-चढ़ाकर इसलिए जताया जाता है, जिससे नई यात्री रेलें चलाने का दबाव न बनाया जाए। फिलहाल रेलवे के पास 60 हजार सवारी डिब्बे हैं, जिनमें करीब डेढ़ करोड़ मुसाफिर रोजाना सफर करते हैं। इनमें से वातानुकूलित डिब्बों में महज 2 फीसदी यात्रियों की आवाजाही होती है। ऐसे में यह कैसे विश्वास कर लिया जाए कि सामान्य शयनयान और डिब्बों में सफर करने वाले 98 फीसदी यात्रियों का घाटा 2 फीसदी कुलीन यात्री पूरा कर रहे हैं?

यहां गौरतलब यह भी है कि सामान्य सवारी और शयनयानों में क्षमता से कई गुना यात्री सफर करते हैं। इस आय को यदि वातानुकूलित यान की आय से जोड़ा जाए तो लगभग बराबर बैठती है। सवारी गाड़ियों को चलाने में यदि घाटा है भी तो उसकी भरपाई पास की सुविधा प्रतिबंधित करके की जानी चाहिए। रेलवे में विशिष्ट व अति विशिष्ट लोगों को 28 प्रकार के नि:शुल्क और रियायती पास दिए जाते हैं। देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को यात्रा के लिए 30 प्रतिशत की छूट लंबे समय से जारी है। यह छूट हर दर्जे के यात्री किराए में तो है ही, करोड़पतियों को भी मिल रही है। उन पेंशनधारियों को भी मिल रही है, जो 50-60 हजार रुपए बतौर पेंशन ले रहे हैं।

रेलवे में 11,463 बिना चौकीदार के पार-पथ हैं। इन पर आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। अनेक रेलवे स्टेशनों पर एक से दूसरे प्लेटफॉर्म पर आवागमन के लिए पैदल पार-पुल नहीं हैं। ये बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की बजाय रेलवे देश के प्रमुख स्टेशनों पर विद्युत स्वचलित सीढ़ियों का जंजाल बुनने में लगी है। रेलवे में एकमुश्त निजीकरण करने की बजाय टुकड़े-टुकड़े कई विभागों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला शुरू हो गया है। संकेतक प्रणाली के आधुनिकीकरण और रख-रखाव, लॉजिस्टिक पार्क निर्माण, लोकोमोटिव और कोच के निर्माण से लेकर द्रुत गति की प्रीमियम व बुलेट रेलों का ताना-बाना विदेशाी पूंजी निवेश और निजीकरण के बल पर ही बुना गया है। इसी दिशा में अगली कड़ी के तहत राज्यों के सहयोग से रेल परियोजनाओं का विस्तार किया जाएगा। कैबिनेट ने इस फैसले को मंजूरी दे दी है।

निजीकरण के ये उपाय तत्काल तो ठीक लग रहे हैं, लेकिन कालांतर में ये बेरोजगारी का सबब बन सकते हैं। रेलवे में 1980 के पहले तक करीब 40 लाख कर्मचारी हुआ करते थे, जिनकी अब संख्या घटकर 13.5 लाख रह गई है। ऐसे विषमतापूर्ण विकास को लेकर रेलवे से जुड़े श्रम संगठन लगातार विरोध जता रहे हैं, लेकिन आम आदमी से जुड़ी सुविधाओं को घाटे का सौदा बताकर खास आदमी को सुविधाएं उपलब्ध कराने का भेदभाव नहीं होना चाहिए।