वैश्विक आर्थिक मंदी, सूखा और पीड़ित किसानों को मुआवजा देने के बावजूद मध्य प्रदेश सरकार में वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कमोवेश बेहतर बजट पेश किया है। डेढ़ लाख करोड़ के आकार के ऊपर पहुंचे इस बजट में सभी वर्गों, पक्षों और विषयों को ध्यान में रखने की कोशिश की गई है। इस कारण यह बजट समावेशी अवधारणा को पूरा करते हुए ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय‘ की उक्ति को चरितार्थ करने वाला बजट है। यदि इस बजट में विलासिता की वस्तुओं, महंगी कारों और शराब में कर वृद्धि कर दी गई होती तो यह बजट सोने में सुहागा वाला बजट कहला सकता था। इस बजट में कृषि और कृषि को बढ़ावा देनी वाली योजनाओं को पोषित करने पर ज्यादा बल दिया गया है, इस नाते यह कृषि केंद्रित बजट दिखाई दे रहा है। ऐसा इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि आज भी प्रदेश की 72 प्रतिशत आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है और मध्य प्रदेश की जो विकास दर 10 फीसदी बनी हुई है, उसमें प्रमुख भागीदारी कृषि की ही है। इस तथ्य की पुष्टि राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश को लगातार पिछले चार साल से मिल रहे ‘कृषि-कर्मण सम्मान’ से होती है। किसानों की उत्पादक क्षमता के चलते ही आज प्रदेश गेहूं उत्पादन में नंबर 1 पर आ गया है।  

पूरे बजट में कृषि और ग्रामीण विकास के लक्ष्य की प्रधानता दिख रही है। जिस प्रदेश में जब कृषि विकास का मुख्य पर्याय हो, तब यही होना चाहिए। इसलिए

“मध्य प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण फसलें उगाने की दृष्टि से दो नए कृषि विश्वविद्यालय और होशंगाबाद में एक नया कृषि महाविद्यालय खोले जाने का प्रावधान किया गया है। कृषि शिक्षा के लिए 4448 करोड़ रुपए का प्रावधान है।”
 

इस राशि से किसानों को आधुनिक तकनीक से खेती करने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। हालांकि हमारे देश में अब विवि अब दो कारणों से सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। एक तो इनमें देशज कृषि को बढ़ावा देने के उपायों की बजाय,बीजों को विदेशी तकनीक से अनुवांशिक रूप से परिवार्धित करने की तकनीक विकसित करके बीजों का मालिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बनाया जा रहा है। बाद में ये कंपनियां मुंह मांगे दाम किसानों को बीज बेचती हैं। दूसरे किसानों को कृषि विभाग और विवि के वैज्ञानिक बाजार की जरूरतों के हिसाब से फसल उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करते हैं इस कारण फसलों में एकरूपता आ रही है। ऐसे में यदि प्राकृतिक आपदा आ पड़ती है तो पूरी फसल चौपट हो जाती है। जबकि पारंपारिक खेती में भूमि और क्षेत्रीय जलवायु के हिसाब से फसलें बोई जाती थीं। नतीजतन 1985 तक मध्य प्रदेश अनाज, दालों व तिलहन के उत्पादन में आत्मनिर्भर प्रदेश था, किंतु सोयाबीन की फसल को सरकार द्वारा प्रोत्साहित करने की वजह से फसल उत्पादन में एकरूपता आ गई और गेहूं व चावल को छोड़ दालों और तिलहनों का उत्पादन बंद हो गया।  

“बजट में उद्यानिकी जैविक खेती, दुग्ध उत्पादन और मछली पालन को भी प्रोत्साहित करने के उपाय किए गए है। पशुओं को चारा और चलित चिकित्सा उपलब्ध कराने पर भी सरकार का जोर है।”
 

किसानों को हेल्थ कार्ड और नि:शुल्क फसल बीमा के प्रावधान के तहत 4600 करोड़ रुपए रखे गए हैं। बीमा के साथ दिक्कत यह है कि ज्यादातर फसल बीमा निजी बीमा कंपनियों से कराया जाता है। कंपनियां प्रीमियम तो ले लेती हैं, किंतु न तो किसान को पॉलिसी दी जाती है और न ही नुकसान होने पर बीमाधन दिया जाता है। बीमा की इस प्रक्रिया को पारदर्षी बनाने की जरूरत है। बीते कृषि वर्ष में कृषि को बड़ी हानि हुई है, लेकिन कंपनियों ने कितने किसानों को फसल बीमा दिया, इसके आंकड़े देखने में नहीं आए हैं?  

मछली पालन की प्रदेश में बड़ी संभावनाएं, बड़े बांधों की उपलब्धता के कारण बढ़ गई हैं। इस हेतु बजट में 39 करोड़ का प्रावधान किया गया है। दरअसल एक समय प्रदेश में केवल 7 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचाई के लिए जल था, जबकि अब 35 लाख हेक्टेयर भूमि सिंची जा रही हैं। इसे बढ़ाकर 50 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य रखा गया है। इस दृष्टि से पुराने तालाबों के जीर्णोंद्धार और नहरों की मरम्मत के लिए 251 करोड़ रुपए रखे गए हैं। मसलन प्रदेश के पास जल के विपुल भंडार है। लेकिन उस अनुपात में मछली का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। ऐसा अफसरशाही के अडंगों के चलते हो रहा है। राष्ट्रीय उद्यानों व आरक्षित वनों में जो तालाब हैं, उन पर वन, सिंचाई और राजस्व तीनों विभाग ही अधिकार जताते हैं। ऐसे में इन तालाबों की मछली पालन के लिए विधिवत नीलामी नहीं होती है। जो मछली पैदा होती भी है, उसे सरकारी अमला अपने स्तर पर बेचकर पैसा हड़प लेता है। इससे सरकारी राजस्व की बड़ी हानि हो रही है। यदि इन तालाबों के मालिकाना हक का स्पष्टीकरण हो जाए और तालाबों में मछली उत्पादन किया जाए तो बड़ी मात्रा में राजस्व तो मिलेगा ही, ग्रामीणों को रोजगार भी मिलेगा।

उद्योगों को बढ़ावा देने की दृष्टि से भी सरकार कृत संकल्पित दिखाई दी है। इंदौर में डिजीटल आईटी पार्क बनाया जा रहा है। नए उद्योगों के प्रोत्साहन के लिए 2200 करोड़ रुपए प्रस्तावित हैं। आनलाइन खरीद पर कर बढ़ाकर सरकार ने फुटकर वस्तुओं के विक्रेताओं के हितों का सरंक्षण किया है। इसी तरह प्लास्टिक की वस्तुओं पर कर बढ़ाकर सरकार ने पर्यावरण सरंक्षण पर ध्यान दिया है। हालांकि प्लास्टिक की वस्तुएं दैनिक जीवन में हर वर्ग के व्यक्ति के लिए इतनी जरूरी हो गई हैं कि उनके बिना गुजारा ही संभव ही नहीं है। प्लास्टिक की बाल्टी, मटके, मग्गे और डलिएं हर गरीब के घर की जरूरत बन गई हैं। लिहाजा ये चीजें अब गरीबों को महंगे दामों में मिलेंगी। सरकार उद्योगों को प्रोत्साहित करने के बावजूद खनिज उत्खन्न एवं उसके प्रसंस्करण को बढ़ावा नहीं दे पाई है। ऐसा वैश्विक, आर्थिक मंदी के चलते ही हो रहा है।

“इस बजट में प्रदेश सरकार ने पर्यटन उद्योग से आय बढ़ाने के कुछ नए उपाय करने जा रही है। इससे स्थानीय समुदायों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे।”
 

अभी तक पर्यटन से जुड़े ज्यादातर भवन व भूखंड राजस्व विभाग के अंतर्गत है, जबकि पर्यटन को बढ़ावा देने का दायित्व मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम को है। मालिकाना हक निगम का नहीं होने के कारण निगम को न तो बैंकों से कर्ज मिलता है और न ही वह इसमें किसी उद्योगपतियों को पीपीपी योजना के अंतर्गत सहभागी बना सकता है। इसलिए सरकार अब इन भवनों और भूखंडों का स्वामित्व निगम को सौंपने जा रही है। मध्य प्रदेश सरकार की पुरानी इमारतों में होटल, रेस्तरा खोलने का प्रस्ताव भी अच्छा है।

हालांकि बजट भाषण देते हुए जयंत मलैया ने मध्य प्रदेश में प्रतिव्यक्ति आय 12000 रुपए होने का दावा किया है। बावजूद मध्य प्रदेश बेहतर मानव सूचकांक के स्तर पर पिछड़ा हुआ है। 70 प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और अमीर व गरीब के बीच खाई निरंतर चौड़ी हो रही है। प्राथमिक शिक्षा का स्तर भी गिरा हुआ है। बावजूद इस स्तर को सुधारने की बजाय नए महावि़द्यालय और विवि खोलने की बात की जा रही है, जबकि इन्हें खोलने की बजाय हर स्तर की शिक्षा में गुणात्मक सुधार के लिए पर्याप्त मात्रा में शिक्षकों व प्राध्यापकों की जरूरत है। बिना शिक्षक के विद्यालय व महाविद्यालयों की कोई उपयोगिता नहीं है। यदि कालांतर में मध्य प्रदेश को हर स्तर पर सुदृढ़ बनाना है तो सामाजिक प्रतिमानों में समरसता के लिए समावेशी उपायों की जरूरत है।