Source: न्यूज़ भारती हिंदी03 Feb 2016 12:08:40

- आर.एल.फ्रांसिस

आरक्षण को लेकर कुछ समय से एक नए तरह की बेचैनी देश के कई हिस्सों में देखी जा रही है। हमारे देश की राजनीति में आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जो थोड़ा-बहुत हर वक्त सुलगता रहता है और जब-तब लपटों की भी शक्ल अख्तियार कर लेता है। पिछले साल गुजरात में पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग ने विस्फोटक रूप ले लिया था। अब आंध्र प्रदेश की बारी है, जहां कापु समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर उबल पड़ा है। वे चाहते हैं कि उन्हें पिछड़े वर्ग के तहत आरक्षण दिया जाए। इस मांग को लेकर शुरू हुआ उनका आंदोलन रविवार को हिंसक हो गया।

गुजरात में पाटीदार, उत्तर भारत में जाट और अब आंध्र प्रदेश में कापू समुदाय की आरक्षण को लेकर उपद्रव तक करने की बेताबी किसी और सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा कर रही है? आंध्र प्रदेश में हिंसा भड़की। पूर्वी गोदावरी जिले के दो पुलिस थानों सहित कई दूसरी जगहों पर भी तोड़फोड़ की गई, ट्रेनों में आग लगाई गई। आरक्षण की मांग कापू जाति ने की है। इसे प्रभावशाली समुदाय माना जाता है।

गुजरात का पाटीदार और आंध्र प्रदेश का कापू समाज खेती-किसानी में अपने इलाकों में अव्वल रहा है। इन समुदायों का सियासी असर भी काफी रहा है और इनके नेता आला पदों पर पहुंचते रहे हैं। आंध्र में कापू और रेड्डियों की लम्बे समय तक राज्य की राजनीति में तूती बोलती रही है। लेकिन वहां एन.टी.रामराव के नेतृत्व में तेलुगूदेशम के साथ कम्मा समुदाय के उदय के बाद राजनीति में उनका दबदबा कुछ घटा है। मौजूदा मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भी कम्मा हैं। ये सभी बड़ी खेतिहर जातियां हैं और अपने-अपने इलाकों में काफी प्रभावी हैं।

आरक्षण का जमीनी सच तो यह है कि यह अपने मकसद से भटक चुका है। आरक्षण का लाभ सरकारी योजनाओं की तरह गैर जरूरतमंद उठा रहे और आरक्षण के पात्र लोग सिर्फ व्यवस्था का मुंह ताक रहे हैं। देश में जिस तरह की आर्थिक नीतियां अंगीकार की जा रही हैं, वह नौकरी के अवसरों को ही कम कर रही हैं। आंध्र प्रदेश में कापू,  गुजरात के पटेल समुदाय की हैसियत नेतृत्वकारी प्रभावशाली संपन्न समाज के रूप में हैं। अब समय आ गया है कि आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय बहस और आरक्षण की बदलते दौर में उसकी खामियों के साथ निरपेक्ष समीक्षा होनी चाहिए।

जरूरत है, नए विजन, साहस, राजनीतिक इच्छाशक्ति से एकदम नई एप्रोच की। यह एप्रोच आर्थिक कसौटी की है। मतलब जाति नहीं गरीबी की कसौटी पर आरक्षण होगा। आरक्षण के फार्मूले से क्रीमी लेयर, जाति को पूरी तरह निकाल बाहर करना चाहिए। कांग्रेस और भाजपा दोनों में यह आम राय बने कि जाति कोई हो, जो गरीबी रेखा से नीचे है, उसे आरक्षण का हक होगा। अब यह कहना आसान है और सोच भी सकना असंभव। मगर सोचना पड़ेगा। इसलिए कि जाट, मराठा, पटेल, भूमिहार, रेड्डी, वोकलिंगा, भारत का चर्च नेतृत्व सब कतार लगाए हुए हैं।

कापू जाति के नेताओं ने चेतावनी दी है कि कापू जाति को ओबीसी में शामिल करने की अधिसूचना जारी कर दी जाए। ऐसा ना हुआ, तो वे आमरण अनशन करेंगे। कुल मिलाकर हालात कुछ-कुछ गुजरात जैसे हैं, जहां आरक्षण की मांग पटेल समुदाय ने की है। पिछले वर्ष जब पटेल आंदोलन भड़का, तभी ये अंदेशा जताया गया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अपेक्षाकृत मजबूत जातियों में यह आग फैलेगी। गूर्जर और जाट समुदाय ऐसी मांग उठा चुके हैं। आंध्र प्रदेश में (राज्य विभाजन के बाद) कापू जाति की आबादी साढ़े 23 फीसदी है। तटीय आंध्र इलाके में इनका खासा प्रभाव है। यह जाति तेलुगू देशम पार्टी का समर्थक रही है।

अब चूंकि उनके आंदोलन से चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी सरकार परेशानी में पड़ी है, तो वाईएसआर कांग्रेस इस मांग के पक्ष में आ खड़ी हुई है। इसलिए आशंका है कि आंध्र प्रदेश लंबे समय तक जातीय आरक्षण की आग में झुलसता रह सकता है। असल में यह अंदेशा कई दूसरे राज्यों में भी गहरा रहा है। ऐसा तब तक होता रहेगा, जबतक राजनीतिक दल आरक्षण के सवाल पर दो-टूक नीति नहीं अपनाते। वे ऐसा करना चाहें तो सुप्रीम कोर्ट की कई टिप्पणियां उनके लिए मार्ग-दर्शक हो सकती हैँ। कोर्ट ने पिछले साल पूछा था कि आरक्षण की सीमा और समय सीमा क्या है? इस सवाल को नजरअंदाज कर पार्टियां अपने लिए गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे मुसीबत को न्योता दे रही हैं।