इस समय दिल्ली पुलिस द्वारा छात्रों की पिटाई का एक ऐसा वीडियो चल रहा है जिसे देखकर पहली नजर में किसी को भी गुस्सा आ जागएा। इसके विरोध में आइसा नामक छात्र संगठन ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन किया है। इसके साथ गैर भाजपा राजनीतिक दलों में से ज्यादातर ने दोषी पुलिस के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। कुछ ने तो इससे आगे बढ़कर यह कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी पुलिस से छात्रों को पिटवा रहे हैं। यह भारतीय राजनीति है जिसमें हम किसी तरह के गैर जिम्मेवार बयान की उम्मीद कर सकते हैं। मैं चूंकि स्वयं अनेक प्रदर्शनों, धरनों, संघर्षों, आंदोलनों से जुड़ा हूं इसलिए यह कतई सहन नहीं कर सकता कि पुलिस प्रदर्शन करने वालों को पीटे। पुलिस की ऐसी भूमिका का मैं हमेशा विरोधी रहा हूं। दिल्ली में इस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे वामपंथी छात्र संगठन के कुछ छात्रों को पुलिस द्वारा पीटते हुए जो वीडियो दिखाया गया है उसे देखकर ऐसा लगता है कि वाकई पुलिस बर्बरता पर उतर आई है। लेकिन क्या यही सम्पूर्ण या एकमात्र सच है?

वास्तव में इसका दूसरा पहलू ऐसा है जिसे समझे बगैर आप किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते। यह सामान्य नियम है कि आ यदि कोई धरना या प्रदर्शन करते हैं तो पहले पुलिस से अनुमति लेते हैं। इसके पक्ष विपक्ष में तर्क दिया जा सकता है कि अगर हमें किसी घटना, संगठन का विरोध करना है तो हम विरोध के लिए अनुमति क्यों लें? पर यह एक सामान्य नियम है। इसके नकारात्मक पक्ष हैं किंतु इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि इसके बाद हमारी सुरक्षा के लिए और हमारा प्रदर्शन ठीक से संपन्न हो जाए यह जिम्मेवारी पुलिस की हो जाती है। यही नहीं हम यदि अपनी बात लिखित में कहीं देना चाहते हैं तो यह भी उसकी जिम्मेवारी है कि हमारे प्रतिनिधिमंडल को ले जाकर उसे सही जगह पहुंचवाए। वह हमारा विरोध हो सकता, मांग हो सकती या अपील भी हो सकती है। प्रश्न है कि क्या छात्र संगठन ने दिल्ली पुलिस से अनुमति ली थी? नहीं ली थी। वे अनुमति के लिए गए थे। दिल्ली पुलिस ने उनसे कहा था कि आप जंतर मंतर पर प्रदर्शन करें। वहां हम आपकी पूरी सुरक्षा की व्यवस्था करेंगे। वहां से आपकी शिकायत सरकार तक पहुंचाई जाएगी। इनने दिल्ली पुलिस की बात नहीं मानी और पहुंच गए संघ कार्यालय पर। क्यों गए वहां? सबसे पहले तो वहां जाना ही गलत था।

लेकिन इसे कुछ समय के लिए यहीं छोड़ दें तो जो वीडियो चलाया जा रहा है उसके समानांतर भी एक वीडियो है जिसमें कुछ लड़कियां पुलिस को कई तरीके से उकसा रही हैं। वो प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर रहीं है। एक ताली बजाकर कह रहीं हैं बनाओ वीडियो और मोदी को भेजो। इनने ऐसी स्थिति पैदा की जिनमें पुलिस वाले भी गुस्से में आ गए। लेकिन पुलिस ने अगर ऐसी ही बर्बरता की जैसी 30 सेकेंड के वीडियो में दिख रहा है तो जिनकी पिटाई हुई वो कहां हैं? बर्बरता का अर्थ है कि कुछ छात्र-छात्राएं घायल होकर अस्पताल में भर्ती होते या किसी की प्राथमिक चिकित्सा भी हुई होती। इसके कोई प्रमाण नहीं है। इसका अर्थ है कि दो चार की पिटाई तो हो गई, किंतु इतनी बर्बरता नहीं थी कि कुछ लोगों को गहरी चोटें आ जाए और उनको उपचार की आवश्यकता पड़े। इसलिए पहला झूठ तो यही है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों की बेरहमी से पिटाई की। पिटाई होते भी यह देखा गया है कि कुछ छात्र-छात्राएं आराम से खड़े अपने साथी को पिटते देख रहे हैं। इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि प्रदर्शन के तौर-तरीकों को लेकर संभवतः उनके बीच मतभेद था। ऐसे प्रदर्शनों में ऐसा स्वाभाविक होता है। कुछ कहते हैं कि हम एक सीमा तक अपना प्रदर्शन करके निश्चित समय में वापस आ जाएंगे तो कुछ उसे आगे जाने की बात करने लगते हैं। ऐसा लगता है इनके समूह में भी था।

वीडियो में एक लड़की की पिटाई देखी जाती है। लेकिन उसका चेहरा नहीं दिखता है। पुलिस कह रही है कि वह लड़की नहीं बड़े बालों वाला लड़का था। इसे आसानी से वीडियो को स्लो मोशन में देखकर पहचाना जा सकता है। वैसे भी दिल्ली पुलिस के जवाब लड़कियों या महिलाओं को उस प्रकार हाथ से नहीं मारते हैं। अगर यह सच है तो फिर ये छात्र संगठन और उनका समर्थन करने वाली मीडिया एकदम झूठ फैला रही है। वैसे भी यह प्रश्न अनुत्तरित है वे वहां गए क्यों? वहां उनके प्रदर्शन करने का उद्देश्य क्या था? किसने उस प्रदर्शन की योजना बनाई? पुलिस की अस्वीकृति के बावजूद वे वहां जाने पर क्यों अड़े रहे? इन प्रश्नों का उत्तर तलाशना इसलिए जरुरी है क्योंकि देश में कभी असहिष्णुता का मुद्दा चलता है, पुरस्कार वापसी होती है तो इस समय रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले को उसे रास्ते पर ले जाने की कोशिश हो रही है। आखिर हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की दु:खद आत्महत्या को लेकर आरएसएस कार्यालय पर प्रदर्शन करने का क्या मतलब है? क्या उसमें कहीं से भी आरएसएस की भूमिका है? वेमुला ने अपने पत्र में तो इसे किसी तरह जातीय उत्पीड़न तक का मामला नहीं माना है। फिर ये संगठन इतने आक्रामक क्यों हैं संघ एवं भाजपा के खिलाफ? ये क्यों नहीं उसकी निष्पक्ष जाचं के निष्कर्षों की प्रतीक्षा कर रहे हैं? न्यायिक जांच आयोग का आदेश हो गया है, तेलांगना सरकार ने सीबीसीआईडी को मामला सौंप दिया है। इसके बाद जांच रिपोर्ट की प्रतीक्षा की जानी चाहिए। कुछ संगठन और लोग अगर जानबूझकर देश में इसके आधार पर झूठ फैलाना चाहते हैं और उस झूठ को क्रांतिकारिता साबित करने के लिए इस तरह धरना प्रदर्शन करेंगे तो फिर संघ के कार्यकर्ता और संमर्थक भी इनका विरोध करने आएंगे और उसके बाद क्या होगा उसका एक ट्रेलर हमने संघ कार्यालय के सामने देखा है।   

अभी तक का अनुभव यही है कि जब भी किसी राजनीतिक दल या संगठन के कार्यालय पर आक्रामक विरोध प्रदर्शन किया जाता है उसमें हिंसा हो जाती है। दोनों पक्षों में टकराव भी हुआ है। भाजपा कार्यालय पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन को याद कीजिए। कितनी हिंसा हो गई थी। उसी तरह भाजपा कार्यालय पर कांग्रेस के प्रदर्शन के समय भी भीड़ंत हुई थी। कांग्रेस कार्यालय पर भाजपा के प्रदर्शन के साथ भी यही हुआ था। इसलिए किसी के कार्यालय पर इस तरह के विरोध प्रदर्शन पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। किंतु कुछ संगठनों का फैशन है कि किसी तरह आरएसएस और भाजपा का विरोध करो और आप पूर्ण विरोधी हो इसे प्रदर्शित करने के लिए जितना आक्रामक हो सकते हो करो, इसके लिए झूठ और पाखंड का जितना सहारा लेना हो लो, आपको इसमें देश के बड़े वर्ग का, भाजपा विरोधी दलों का, मीडिया के एक भाग का पूरा समर्थन भी मिलेगा। यही रोहित वेमुला के मामले में हो रहा है। बिना अनुमति के आप प्रदर्शन करने गए वहां आपने अश्लील शब्दों का प्रयोग किया, पुलिस को मजबूर किया कि वह आपके खिलाफ कार्रवाई करे और अब आप पीड़ित बताकर यह साबित करने की गंदी राजनीति कर रहे हैं कि दिल्ली पुलिस ने जो केन्द्र सरकार के अंतर्गत है वह आरएसएस और भाजपा के इशारे पर आपके साथ बर्बरता बरती है। इसे देश का बहुसंख्य स्वीकार नहीं करेगा।