“आज ‘पतंजलि’ भारत का सर्वाधिक तेजी से बढ़ता ब्रांड है। आज सवा हजार विक्री केन्द्रों वाले पतंजलि को अपने विक्री केन्द्रों की संख्या एक लाख तक ले जाना है। यह बड़ा स्वप्न है, पर स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की इस दृढ़ इच्छाशक्ति से इसका साकार होना कठिन नहीं है।  ”
 

    

- प्रशांत पोळ

आज जिनकी आयु 50 वर्ष के आसपास हैं, ऐसे लोगों को उनके बचपन का कोलगेट का विज्ञापन याद आता होगा - ‘सुबह-सुबह आप कोयले से मंजन करते हो...?’ उस समय पश्चिम भारत में अति लोकप्रिय, नाशिक के बिटको दन्तमंजन पर यह सीधा - सीधा आक्रमण था। सत्तर के दशक में भारत में टूथपेस्ट का मार्केट अत्यल्प था। बड़ी मात्रा में दन्तमंजन का उपयोग किया जाता था। वह भी काला या लाल रंग का। उत्तर भारत में डाबर लाल दन्तमंजन का बोलबाला था। विको वज्रदंती ने उस समय पदार्पण ही किया था।       

ऐसे पृष्ठभूमि में ‘आप नमक और कोयले से दांत घिसते हैं...? यह मसूड़ों के लिए हानिकारक होता है’ ऐसे आक्रामक विज्ञापन करके कोलगेट ने दन्तमंजन के मार्केट को धीरे-धीरे अपने सफ़ेद दन्तमंजन की ओर मोड़ दिया और आगे चलकर उसे चतुराई से टूथपेस्ट की ओर ले गए। कोलगेट इस क्षेत्र में एकछत्र राज करनेवाली कंपनी बन गई और भारत के आधे से अधिक लोग कोलगेट का उपयोग करने लगे...। नियति का न्याय कैसा होता है देखिए - आज वही कोलगेट अत्यंत आक्रामक ढ़ंग से विज्ञापन कर रही है - 'क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है...? आपके पेस्ट में कोयला नहीं हैं...? तो बदलो पेस्ट! कोलगेट का उपयोग करों...!!’        

इन चालीस वर्षों में कोलगेट में ऐसा परिवर्तन कैसे हो गया? इसके लिए पिछले एक-दो वर्षों में अपने देश की बदली हुई परिस्थितियों को देखना चाहिए। जिसे ‘ओरल केयर’ कहा जाता है, उस बाजार में आज भी कोलगेट-पामॉलिव्ह कंपनी ‘राजा’ की भूमिका में है। हिन्दुस्थान लीवर कंपनी इस प्रतिस्पर्धा में बहुत पीछे है। केवल देश में ‘अंडरकरंट’ (अंतर प्रवाह) तेजी से बदल रहा है। दन्तमंजन और हर्बल टूथपेस्ट की ओर लोगों की रूचि बढ़ते हुए दिखाई दे रही है। कोलगेट की बढ़ोतरी पहले की अपेक्षा कम हो गई है। विको और डाबर की बढ़ोतरी हमेशा की ही तरह बनी हुई है। अनेक स्थानों पर ‘विठोबा दन्तमंजन’ जैसे स्वदेशी उत्पाद पैठ बनाने लगे हैं। परन्तु विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगे सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है - ‘पतंजलि’ के रूप में...!

विदेशी कंपनियों को टक्कर

पतंजलि आयुर्वेद यह कंपनी आज ओरल केयर के क्षेत्र में अधिक नहीं है। पर उसकी बढ़ोतरी की गति जबरदस्त है- तूफ़ान की तरह। सिर्फ ओरल केयर ही नहीं, वरन एफ. एम. सी. जी. (फ़ास्ट मूविंग कन्जूमर गुड्स) कम्पनियां प्रायः जिन-जिन क्षेत्रों में हैं, उन सभी क्षेत्रों में पतंजलि ने अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज की है। पिछले वर्ष पतंजलि योगपीठ के सर्वेसर्वा स्वामी रामदेव ने फ्यूचर ग्रुप के ‘बिग बाजार’ के मुखिया किशोर बियाणी के साथ एक संवाददाता सम्मलेन में घोषणा की कि इसके बाद पतंजलि के सभी उत्पाद बिग बाजार के आउटलेट्स पर उपलब्ध होंगे...!      

यह सब दृष्टि से एक बड़ी घोषणा थी। हरिद्वार की एक छोटी सी लगनेवाली आयुर्वेद उत्पादन की कंपनी ने बिग बाजार के साथ हाथ मिलाया है यानी एफ. एम. सी. जी. के कार्पोरेट क्षेत्र में दमख़म के साथ पदार्पण किया है! अगले बीस माह में पतंजलि ने केवल बिग बाजार के रिटेल स्टोर्स के द्वारा व्यवसायिक लक्ष्य रखा है- एक हजार करोड़ रुपयों का...। मार्च, 2015 के आर्थिक वर्ष में पतंजलि ने दो हजार करोड़ के अपने टर्न-ओवर को पार कर लिया। और इस वर्तमान आर्थिक वर्ष में पतंजलि ने लक्ष्य रखा है लगभग 5 हजार करोड़ रुपयों से आगे निकलने का। अर्थात एक वर्ष में ढ़ाई गुना बढ़ोतरी...!           

भारत के एफ. एम. सी. जी. के व्यवसायिक इतिहास में इतने तीव्र गति में व्यवसायिक वृध्दि की घटना पहली बार होगी और यह एक रिकॉर्ड बनेगा...।     

भारतीय बाजार में क्रय-विक्रय

आज बाजार में पतंजलि उत्पादों की तरह उत्पादन करनेवाली कंपनी है- डाबर। गत वर्ष इस डाबर कंपनी का वार्षिक कारोबार 7806 करोड़ रुपये था। सन 1884 में स्थापित हुए, यानी 130 वर्ष से भी अधिक समय भारतीय बाजार में दृढ़तापूर्वक पैर जमाकर खड़े रहनेवाले डाबर से भी बाबा रामदेव की पतंजलि इन डेढ़-दो वर्षों में आगे निकल जाएगी, यह निश्चित है।    

बाबा रामदेव ने यह चमत्कार कैसे किया...? 2012 में यानी सिर्फ साढ़े तीन – चार वर्ष पहले जब बाबा रामदेव ने ‘पतंजलि योगपीठ लोकोपयोगी वस्तुओं के बाजार में (एफ.एम.सी.जी. उत्पादनों के क्षेत्र में) उतरेगी’ ऐसी घोषणा की थी, तब अनेकों को लगा कि ये क्या पागलपन है। उनकी उपेक्षा की गई। यह समय था दिल्ली में होनेवाले कांग्रेस के भ्रष्ट शासन के विरुद्ध आन्दोलन का। अन्ना हजारे का नाम देशभर गूंज रहा था। रामलीला मैदान पर बाबा रामदेव के सार्वजनिक आयोजन को तत्कालीन कांग्रेस शासन ने कुचलकर रख दिया था। इस पृष्ठभूमि में स्वामी रामदेव की घोषणा बहुतों को ‘सिर्फ राजनीतिक खेल’ प्रतीत हुई। इस तरफ किसी ने गंभीरता से ध्यान नहीं दिया।          

केवल बाबा रामदेव के दिमाग में यह चित्र स्पष्ट था। वे तथा उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने निश्चित योजना बनाई। मल्टीनेशनल कंपनियों के किसी भी ‘लिक’ पर नहीं चलना है, यह निश्चित था। इन सबके पीछे ‘स्वदेशी’ यह मूलमंत्र था...। और इसके बाद गत तीन-चार वर्षों में जो हुआ वह सबको अचम्भित करनेवाला था। भारतीय बाजार में, अपने आसपास ही एक इतिहास बन रहा था...।

आज कार्पोरेट बोर्डरूम में पतंजलि की ही चर्चा होती है। बाजार में पतंजलि के खेल को समझने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। पतंजलि के व्यवसाय का विश्लेषण और उसपर पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन यह एफ.एम.सी.जी. के सेल्स मीटिंग्स का आवश्यक भाग सिध्द हो रहा है...।    

हिंदुस्तान लीवर, नेस्ले, कोलगेट-पॉमोलिव्ह, प्रोक्टर एंड गैम्बल जैसी विदेशी कम्पनियां तो परेशान हैं ही, परन्तु आय.टी.सी., डाबर, गोदरेज, मारिको, इमामी जैसी भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी उधेड़बुनमें लगी हैं, कि यह सब हुआ कैसे...? मारिको जैसी मुम्बई की कंपनी को 5,733 करोड़ रुपयों का कारोबार करने के लिए तीस वर्ष लगे और बाबा रामदेव की यह पतंजलि सिर्फ चार से पांच वर्षों में पांच हजार करोड़ रुपयों की छलांग लगाएगी? यह कैसे संभव हो सकता है...? इसी सवाल में डाबर भी उलझ गया है। सात हजार आठ सौ करोड़ रुपयों के कारोबार के लिए उन्हें 130 वर्ष लग गए और इस बाबा रामदेव ने ऐसी कौन सी जादू की छड़ी घुमाई कि आनेवाले दो-तीन वर्षों में वे हमसे आगे निकल जाएंगे ?    

विदेशी कम्पनियां तो बहुत बौखला गई हैं। उनके किसी भी ‘टेक्निक’ का उपयोग पतंजलि नहीं करती हैं। इसलिए पतंजलि को ऐसी सफलता मिली कैसे, यह उनके सामने उलझन है।

गत तीन वर्षों में बाबा रामदेव के पतंजलि ने भारत में स्थापित, विशेषतः विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा बनाए गए, मार्केटिंग के सभी नियमों की पूरी तरह धज्जियाँ उडाई है। उन्हें तोड़ दिया है। फेंक दिया है। ध्वस्त कर दिया है...। आक्रामक विज्ञापन नहीं- मूलतः पिछले वर्ष तक तो विज्ञापन ही नहीं, इस कारण ‘प्रोडक्ट हैमरिंग’, ‘लोगो हैमरिंग’ ये मार्केटिंग के पसंदीदा तरीके भी नहीं। पाँच सितारा होटलों में पार्टियां नहीं, उत्पादनों का प्रमोशन नहीं। मार्केटिंग का ट्रेनिंग नहीं, सेल्स ट्रेनिंग भी नहीं है। पर बाबा रामदेव ने यह चमत्कार करने के लिए आखिर क्या किया...?         

इसका उत्तर आसान है। बाबा रामदेव ने लोगों में विश्वास निर्माण किया। यह विश्वास था योग का, योग आधारित जीवन पध्दति का, प्राकृतिक उत्पादनों का, स्वदेशी जीवनमूल्यों का...।  

गत दस वर्षों से अपने योग शिविर के माध्यम से स्वामी रामदेव यह विश्वास निर्माण का कार्य कर ही रहे थे। बड़ी मात्रा में उन्होंने लोगों को इस नैसर्गिक जीवन पध्दति की ओर खींचकर लाया था। ‘योग’ यह कार्पोरेट जगत में ‘क्रेज’ बनता जा रहा था। अनेक बहुराष्ट्रीय और आई. टी. कम्पनियां अपने कर्मचारियों के लिए ‘योग वर्ग’ का आयोजन करने लगे।          

इसी समय स्वामी रामदेव अपने योग शिविर के माध्यम से विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लूट नीति की पोल खोल रहे थे, धज्जियां उड़ा रहे थे। स्वदेशी जीवन पध्दति का महत्त्व उनको बता रहे थे। प्रयत्न होते गए... मानसिकता तैयार होती गई। और इसी दौरान स्वामीजी ने समूचे देशभर में पतंजलि का संजाल बिछाना शुरू किया। एकदम छोटे-छोटे गांवों से स्वामीजी के अनुयायी खड़े हो गए। उनकी बैठकें, उनके सम्मलेन, हरिद्वार में उनकी प्रदेशानुसार बैठकें...ये सब हो ही रहे थे।     

भारत में तीन लाख करोड़ रुपयों से अधिक कारोबार वाली एफ. एम. सी. जी. साम्राज्य को इस अभियान की भनक तक नहीं थी। समझने की इच्छा तो थी ही नहीं। और इसलिए 2012 में स्वामी रामदेव द्वारा ‘लोकोपयोगी वस्तुओं के बाजार में उतरने की’ घोषणा की ओर व्यवसायिक क्षेत्रों ने ध्यान तक नहीं दिया। राजनीतिक दलों ने इसका केवल संज्ञान ही लिया।     

प्रारंभ में, सिर्फ एक वर्ष के भीतर, पतंजलि के उत्पादन की बिक्री करनेवाली 1000 आउटलेट्स भारत में तैयार हो गई। इसमें से अधिकांश स्वामी रामदेव के कार्यकर्ता थे। वे बड़ी निष्ठा और प्रामाणिकता से उत्पादों की बिक्री कर रहे थे। आज देशभर में लगभग सवा हजार स्थानों पर पतंजलि के उत्पादों को बिक्री के लिए रखा गया है। इसमें अब शहरी क्षेत्रों में ‘बिग बाजार’ और रिलायंस फ्रेश जैसे मॉल भी जुड़ गये है और शीघ्र ही भारत के सभी खादी भंडारों में भी पतंजलि के उत्पादन बिक्री के लिए उपलब्ध रहेंगे। 

ऐसा भाग्य भारत में आज तक किसी भी स्वदेशी / विदेशी कंपनी को नहीं मिला है..!

कार्पोरेट जगत में इस ‘सफलता’ पर जमकर शोध किया जा रहा है। पतंजलि ने भारत के सामान्य वस्तुओं के बाजार को बदलकर रख दिया ऐसा कार्पोरेट जगत ही कह रहा है। ‘पतंजलि’ विषय पर ‘गूगल’ में शोध किया जाए तो इस सफलता के ‘रहस्य’ खोजनेवाले अनेक ‘पेपर्स’ मिलते हैं। धनबाद मायनिंग विश्वविद्यालय में बिज़नेस मैनेजमेंट सिखाने वाली मृणालिनी पांडे ने पतंजलि की सफलता का गहन अध्ययन किया है। ‘मार्केटिंग के किसी भी प्रस्थापित तरीकों का उपयोग किए बिना, सफलता को खींचकर लाने का उदाहरण यानी पतंजलि’, ऐसा वे कहती हैं।                    

कार्पोरेट जगत में स्वामी रामदेव की सफलता के लिए एक नया शब्द गढ़ा गया – ‘कन्टेन्ट मार्केटिंग’। कुछ मार्केटिंग गुरुओं का कहना है, “हम किसी एक उत्पाद को ग्राहक तक ले जाने के लिए सभी तरह की पध्दति अपनाते हैं। इसमें आक्रामक विज्ञापन होता है। उस विज्ञापन का ‘हैमरिंग’ होता है। हम ग्राहकों के दिलो-दिमाग तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए जोर लगाते हैं। बाबा रामदेव ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने ‘प्रोडक्ट्’ बेचा ही नहीं, बल्कि ‘कन्टेन्ट’ बेचा। परन्तु बेचने के लिए अपने पास (बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास) मूलतः ‘कन्टेन्ट’ है क्या...?”         

स्वामी रामदेव ने भले ही प्रोडक्ट मार्केटिंग नहीं किया, लेकिन उत्पादन की गुणवत्ता का आग्रह किया। उनकी ‘पैकेजिंग’ अच्छी होगी, यह देखा गया। यह सब करने के लिए उन-उन क्षेत्रों के विशेषज्ञ मनुष्यों को लिया गया। इसके लिए अन्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों से भी विशेषज्ञों को उठाकर लाया गया। उनको अच्छी पगार दी गई। और मुख्यतः उनके समक्ष ‘स्वदेशी’ यह मिशन रखा गया।      

इन सभी का अत्यंत सकारात्मक परिणाम हुआ। उत्पादनों की कीमत अन्य प्रतिस्पर्धियों की अपेक्षा लगभग तीस प्रतिशत कम रखी गयी। वितरण का मजबूत संजाल था ही। इस कारण उत्पादों की बिक्री को अच्छा साथ मिला। 

जो चाहा...मिलेगा  

पतंजलि ने दैनंदिन उपयोग की सभी वस्तुओं का अपने उत्पादन में समावेश किया। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की सभी वस्तुएं उनकी लिस्ट में है। इसमें स्नान का साबुन, हैंडवॉश, कपडे धोने का साबुन, तेजस ब्यूटी क्रीम, एंटीरिंकल क्रीम, केशकांति शैम्पू, दन्तकान्ति टूथपेस्ट तथा मंजन, बालों के लिए विविध तेल, इसके अतिरिक्त आटा, बेसन, दलिया, दालें, पापड़, आचार, ज्यूस, चाय, तुलसी-चाय, अगरबत्ती, मोमबत्ती, घर बुहारने का झाड़ू... जो चाहिए वो। आप जो कहेंगे वह वस्तु उपलब्ध है।      

पतंजलि का पूरी ध्यान ग्रामीण क्षेत्रों की ओर है। यहां रोजगार निर्माण के लिए विशेष प्रयत्न किये जाते है। आगे पतंजलि अति व्यवसायी होगा कि नहीं... पता नहीं। आज तक तो पतंजलि के उत्पाद किसी मिशन की तरह बनाए जाते हैं। उत्पादनों का विकेंद्रीकरण करने का प्रयत्न होता ही है। अनेक स्थानों पर यह उत्पादन किया जाता है। हरिद्वार के कारखानों में इसका परीक्षण होने के बाद ये सामान, पतंजलि के ब्रांड के साथ बाजार में आता है। 

आज ‘पतंजलि’ भारत का सर्वाधिक तेजी से बढ़ता ब्रांड है। इसका झटका सभी प्रतिस्पर्धियों को लगा है, विशेषकर विदेशी कंपनियों को। क्योंकि स्वामी रामदेव उनपर सतत आक्रमण करते रहते हैं। आज सवा हजार बिक्री केन्द्रों वाले पतंजलि को अपने बिक्री केन्द्रों की संख्या एक लाख तक ले जाना है। यह बड़ा स्वप्न है, पर स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की इस दृढ़ इच्छाशक्ति से इसका साकार होना कठिन नहीं है। ऐसा हुआ तो भविष्य में पतंजलि देश की सबसे बड़ी कंपनी बन जाएगी, इसके साथ ही देश के बाजार को अपने हिसाब से चला भी सकेगी..!            

झटपट पकाओ, बेफिक्र खाओ...!

देशभर में मैगी पर बंदी होने के कारण जो ‘खालीपन’ तैयार हो गया था, इसे दूर करने के लिए अनेक कंपनीयां प्रयत्न कर रही थी। लेकिन इन सभी के बीच ‘पतंजलि आयुर्वेद’ ने ‘धमाकेदार एंट्री’ की।   

15 नवम्बर, 2015 को लौंच किए गए पतंजलि नुडल्स की टैगलाइन्स है – ‘झटपट बनाओ, बेफिक्र खाओ...!’ यह नुडल्स गेहूं के आंटे से बना है। इस तरह के नुडल्स को आकर्षक बनाना कठिन होता है। इसलिए पहले मैगी बनानेवाली नेस्ले कंपनी ने भी अनेक वर्षों तक मैदा से तैयार किए गए नुडल्स को ही बाजार में उतारे थे। गेहूं के नुडल्स को उन्होंने बहुत देरी से लाया। लेकिन पतंजलि केवल गेहूं के नुडल्स पर ही जोर दे रहा है।        

नेस्ले की मैगी में पाम तेल का उपयोग किया जाता था, जो कि स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। पतंजलि के इस नुडल्स में ‘राईस ब्रांड तेल’ का उपयोग किया जाता है। और नेस्ले की 25 रुपयों की तुलना में पतंजलि के नुडल्स सिर्फ 15 रुपयों में मिल रही है। यानी, इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बाबा रामदेव की पतंजलि उन्हीं की भाषा में मुंहतोड़ जवाब दे रही है...।  

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मूल मराठी आलेख : 'साप्ताहिक विवेक' 25 अक्टूबर, 2015  

हिन्दी अनुवाद : लखेश्वर चंद्रवंशी