राजस्थान के नागौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिनों की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में मीडिया की दिलचस्पी इस बात पर ही ज्यादा रही कि यूनिफॉर्म को लेकर बहुप्रतिक्षित बदलाव होता है या नहीं। नागौर में संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक में जो हुआ, वहां से जो कहा गया वह बहुत अहम है। संघ के शीर्ष अधिकारियों के तीन दिवसीय विचार-विमर्श सत्र के दौरान वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए देश के विभि‍न्न विश्वविद्यालयों में देश-विरोधी ताकतों के खि‍लाफ मजबूती से निपटने के लिए सरकार का आह्वान किया है।

हाल ही में आरक्षण को लेकर हुए आंदोलन का परोक्ष रूप से संदर्भ रखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रभावशाली तबकों की आरक्षण की मांग को खारिज कर दिया और यह पता लगाने के लिए अध्ययन करने की वकालत की कि जरूरतमंद लोगों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है या नहीं। सामाजिक समरसता की वकालत करते हुए संघ ने कहा है कि जाति आधारित भेदभाव के लिए हिंदू समुदाय के सदस्य जिम्मेदार हैं और हमें सामाजिक न्याय के लिए इसे समाप्त करना होगा। उन्होंने इस बाबत बी आर अंबेडकर को याद किया।

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद पिछले दो वर्षों का सबसे बड़ा परिवर्तन यदि कोई है तो वह हिंदू समाज में फिर बिखराव की धाराओं का फूटना है। देश में जातिगत राजनीति का हावी होना है।

“नरेंद्र मोदी की धुरी के साथ राष्ट्रवादी धारा में हिंदू जैसा गोलबंद हुआ था वह आज फिर बिखरा है। कहीं जाट बनाम गैर-जाट का टकराव है तो कहीं पटेल बनाम गैर-पटेल का संकट है तो कहीं कापू बनाम कामा, कहीं दलित आक्रोश, कहीं फारवर्ड बनाम बैकवर्ड के अप्रत्याशित झंझट हैं।”
 

नागौर में कुछ और भी बदलाव के संकेत मिलते हैं। प्रतिनिधि सभा को अपनी रिपोर्ट में संघ के सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी ने मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा उठाया। इसे व्यापक प्ररिप्रेक्ष्य में रखा गया है। संघ ने कहा कि मंदिरों में प्रवेश में पुरुषों और महिलाओं में भेदभाव नहीं किया जाता था। मगर बीच में ये शुरू हुआ। अब इसे मिटाने के लिए आपसी बातचीत और सहमति की जरूरत है। संघ ने सामाजिक समरसता की बात की। हिंदू समाज को जोड़ने और छुआछूत से लड़ने के लिए संघ पहले ही एक गांव में एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान की बात कर चुका है। आरक्षण पर भी संघ ने राय रख दी कि इससे समाज के कमजोर तबके को लाभ मिला है। लेकिन अगर समाज के संपन्न और समृद्ध तबके इसकी मांग करेंगे तो ये ठीक नहीं है।

जिस समय नागौर में संघ देश की दशा और दिशा पर चिंतन कर रहा था, तभी राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद उसकी तुलना आतंकवादी संगठन आईएसआईएस से कर रहे थे। संघ ने इसका खंडन किया और कॉन्‍ग्रेस की मानसिकता पर सवाल उठा दिया। मगर संघ को शायद अब ये भी सोचना होगा कि क्या यूनिफॉर्म बदल लेने से उसके विरोधियों की उसके बारे में राय नहीं बदल जाएगी।