पिछले कुछ समय से आरक्षण का मुद्दा देश में गरमाया हुआ है। बीते साल अगस्त में गुजरात के पटेलों ने आरक्षण की मांग की। अभी फरवरी में हरियाणा के जाटों ने हंगामा खड़ा कर दिया। आरक्षण को लेकर दोनों समुदायों ने उग्र प्रदर्शन किया। आरक्षण की आग में पहले गुजरात जला और इस बार हरियाणा। आरक्षण की इस आग से दोनों प्रदेश ही नहीं, बल्कि समूचा देश ही झुलस-सा गया है। आरक्षण की मांग पर पटेलों और जाटों, दोनों को ही शेष समाज का समर्थन हासिल नहीं हो सका। मोटे तौर पर उसके दो कारण हैं। पहला, आरक्षण की मांग के लिए दोनों ने हिंसक रास्ते का चुनाव किया। दूसरा, शेष समाज यह नहीं समझ पा रहा है कि पटेलों और जाटों को आरक्षण क्यों चाहिए? गुजरात में पटेल और हरियाणा में जाट सक्षम और सम्पन्न वर्ग से आते हैं। आखिर सम्पन्न वर्ग भी आरक्षण की वैशाखी क्यों थामना चाह रहे हैं? उनकी मांग से पिछड़े और सवर्ण दोनों ही बेचैन हैं। दोनों वर्ग इस तरह की मांग को अपने हितों पर कुठाराघात की तरह देखते हैं। सम्पन्न वर्गों द्वारा आरक्षण की मांग करने से समाज में परस्पर अविश्वास और तनाव की स्थिति निर्मित हो रही है। समाज के प्रत्येक वर्ग के बीच समरसता लाने के प्रयास में जुटा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस बात को गहरे से समझता है। यही कारण है कि संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक के बाद जब प्रेसवार्ता में सरकार्यवाह भैयाजी जोशी से प्रश्न किया गया कि आरक्षण पर संघ का क्या एजेंडा है? तब भैयाजी जोशी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दलितों और पिछड़ों को जातीय आधार पर मिलने वाले आरक्षण को संघ न्यायोचित मानता है। लेकिन, यदि सम्पन्न वर्ग आरक्षण की मांग करता है तो यह सही संकेत नहीं है। बीते कुछ समय में सम्पन्न वर्गों द्वारा आरक्षण मांगने के कारण समाज में जिस तरह का विमर्श खड़ा हो रहा है, जिस तरह एक-दूसरे के प्रति वैमनस्यता का भाव बढ़ रहा है, जिस तरह से एक-दूसरे के प्रति अविश्वास गहरा रहा है, उससे संघ चिंतित है। समाज में गहराती दरारों से उत्पन्न हुई यही चिंता सरकार्यवाह के बयान में परिलक्षित होती दिखाई देती है।

एक बात हमें स्पष्टतौर पर समझ लेनी चाहिए कि संघ आरक्षण का विरोधी नहीं है। जैसा कि पिछले वर्ष पाञ्चजन्य में प्रकाशित सरसंघचालक मोहन भागवत के साक्षात्कार के एक अंश पर इलेक्ट्रोनिक चैनल्स ने वितंडावाद खड़ा करके यह साबित करने का प्रयास किया कि संघ आरक्षण को समाप्त कराना चाहता है। केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। सो, टीआरपी के पीछे दौडऩे वाले कुछ चैनल्स और संघ विरोधी बुद्धिजीवियों को प्रोपोगंडा फैलाने में अधिक सहूलियत हुई कि संघ अब भाजपा पर दबाव बनाकर जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था को खत्म करवा देगा। बहरहाल, ऐसा कुछ अब तक हुआ नहीं है। संभवत: आगे भी नहीं होगा। क्योंकि, संघ का स्पष्ट मत है कि जब तक समाज में विषमता है, आरक्षण की आवश्यकता है। हालांकि, संघ आरक्षण को ठीक से लागू कराने का पक्षधर रहा है। संघ का मानना है कि अब भी आरक्षण का लाभ वंचित और पिछड़े समुदाय को नहीं मिल रहा है। आरक्षण का लाभ संबंधित समुदायों में भी कुछ लोगों तक सीमित होकर रह गया है। इसीलिए सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि कितने लोगों को आरक्षण की आवश्यकता है और कितने समय तक उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए, यह तय करने के लिए राजनीतिज्ञों के साथ सेवाभावी लोगों की एक समिति बना देनी चाहिए। राजनीतिक प्रतिनिधि इस समिति में शामिल जरूर होंगे लेकिन आरक्षण की दिशा समाज के प्रतिनिधि तय करेंगे।

एक और बात हमें ध्यान में लानी चाहिए कि आरक्षण पर संघ ने अभी बोलना शुरू किया है, ऐसा नहीं है। आरक्षण पर संघ का मत बदल गया है, ऐसा भी नहीं है। वर्ष 1981 में जब गुजरात और अन्य प्रदेशों में आरक्षण की मांग के कारण तनावपूर्ण स्थितियां निर्मित हुईं थी तब भी संघ ने आरक्षण पर चिंता व्यक्त की थी। उससे पहले भी आरक्षण संघ के विमर्श का हिस्सा रहा है। वर्ष 1981 में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में आरक्षण पर एक प्रस्ताव पारित हुआ था। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि 'संघ यह मानता है कि शताब्दियों से सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए बन्धुओं को शेष समाज के समकक्ष लाने के लिए आरक्षण व्यवस्था को अभी बनाये रखना आवश्यक है।' संघ ने तब भी इस बात का अनुभव किया था कि अतार्किक और राजनीतिक ढंग से आरक्षण की मांग करने से सामाजिक ताने-बाने को गंभीर क्षति पहुंच रही है। तब संघ ने प्रस्ताव में कहा था कि 'गत तीन वर्षों में आरक्षण-नीति के गलत क्रियान्वयन के कारण वांछित लक्ष्य सिद्धि के स्थान पर आरक्षण सत्ता व वोट की राजनीति का एक हथियार मात्र बनकर रह गया है। फलस्वरूप जगह-जगह पर समाज में परस्पर अविश्वास एवं तनाव की स्थिति निर्मित हो रही है।' आरक्षण की समस्या का हल करने के लिए आज जिस तरह की समिति बनाने की बात संघ करता है, 1981 में भी संघ उसी प्रकार की समिति बनाने का प्रस्ताव रखा था।

राजनीतिक दुरुपयोग के कारण आरक्षण पहले से ही संवेदनशील मसला बन गया है। इस विषय पर बात करना आसान नहीं है। इसके बावजूद तमाम जोखिम मोल लेकर भी आरएसएस समाजहित में इस विषय पर सार्थक विमर्श कराने का प्रयत्न कर रहा है। इसलिए हमें ईमानदारी से आरक्षण पर संघ के मंतव्य को समझना चाहिए, न कि बेवजह वितंडावाद खड़ा करना चाहिए। संविधानकारों की मंशा के अनुरूप संघ भी यह मानता है कि आरक्षण रूपी यह वैशाखी स्थायी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। इस वैशाखी को शीघ्र समाप्त होना चाहिए। सक्षम और सम्पन्न वर्गों को अपनी भूमिका पहचाननी होगी। उनका काम आरक्षण मांगना नहीं है, बल्कि पिछड़े समाज का हाथ थामकर उन्हें भी सक्षम और सम्पन्न बनाना है।