यह देश का दुर्भाग्य ही है कि आज हमारे बीच ऐसे नेता खुले आम कह रहे हैं कि “गर्दन पर छूरी रख दो, तब भी नहीं बोलूंगा भारत माता की जय”। आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि ‘भारतमाता की जय’ नहीं बोलनेवाले के समर्थन में लोग तालियां बजाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि इसका विरोध करनेवालों की संख्या कम है। सोशल मीडिया पर जागरूक देशवासी ‘भारतमाता की जय न बोलनेवाले’ को जमकर कोसते हैं। फिर भी हम देशवासियों के लिए यह चिंता का विषय है कि देश के भीतर बड़े-बड़े सियासतदार ‘संवैधानिक अधिकार’ की आड़ में देशविरोधी बोल आसानी से बोल लेते हैं।

गत माह जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में देशविरोधी नारों के चलते समूचे भारत में ‘देशभक्त बनाम देशविरोधी’ का वातावरण बन गया है। कांग्रेस और उसके तमाम समर्थक दल जेएनयू में देशविरोधी नारे लगानेवालों के समर्थन में खड़े हो गए हैं। देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसए) के सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने नागपुर की एक सभा में कहा था कि अफ़सोस की बात है कि देश की जय नहीं कहने की सीख देनेवालों की संख्या बढ़ रही है। भारतमाता की जय बोलनेवाले लोगों की कमी दिख रही है। इसके लिए नई पीढ़ी को सीख देने की जरुरत है। घर में मातृभूमि के सम्मान व जय-जयकार के लिए अलग से कुछ सिखाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, यह तो एक संस्कारित कर्म है। माता की जय-जयकार स्वाभाविक रूप से होना चाहिए।

सरसंघचालक द्वारा “भारतमाता की जय” सिखाने की सीख बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए किसी को भी इसपर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन हैदाराबाद के सांसद और मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुस्लिमीन (एमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी तो शुरू से ही आरएसएस के विरोधी हैं। यानी हिन्दू, हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति के विरोधी हैं। यही कारण है कि सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत द्वारा “भारतमाता की जय” कहने की सीख के विरोध में उतर आए।

लातूर जिले के उदगीर तहसील में एक जनसभा में ओवैसी ने कहा, “मोहन भागवत ने नागपुर में कहा कि मुल्क में ऐसे लोग हैं जो नारे नहीं लगाते भारतमाता के जय का। उनको सिखाना पड़ेगा।” ओवैसी ने सरसंघचालक को चुनौती देते हुए आगे कहा,

““मोहन भागवत साहब! मैं नहीं लगाता नारा, क्या करते आप? नहीं बोलता मैं। मेरे गले में छुरी भी रख देंगे तो नहीं बोलूंगा मैं। हमारे कॉन्स्टीट्यूशन में यह कहीं नहीं लिखा है कि सभी को भारतमाता की जय बोलना।””
 

ऐसा कहकर ओवैसी ने अपने समर्थकों को 'भारतमाता की जय' नहीं कहने के लिए उत्प्रेरित किया है। उसके समर्थक उनके इस वक्तव्य पर तालियां बजा रहे थे।       

ओवैसी अपनी बात इस तरह रख रहे थे, जैसे- “वो संविधान की हर बात को मानते हैं, या जो संविधान में लिखा है बस वही बात कहते हैं और संविधान सम्मत काम करते हैं।” पर वास्तविकता इससे परे है। ओवैसी के वक्तव्य संविधान सम्मत नहीं होते हैं। यही कारण है ओवैसी द्वारा संविधान का हवाला देते हुए ‘भारतमाता की जय’ नहीं बोलने के वक्तव्य पर राज्यसभा सांसद और मशहूर गीतकार व शायर जावेद अख्तर ने राज्यसभा में असदुद्दीन ओवैसी के वक्तव्य की कठोर निंदा की। ओवैसी का नाम लिए बिना अख्तर ने कहा, “वो कहते हैं कि भारतमाता की जय नहीं बोलेंगे, क्योंकि संविधान में ऐसा करने को नहीं कहा गया। लेकिन उसी संविधान में उन्हें शेरवानी और टोपी पहनने के लिए भी नहीं कहा गया।” उन्होंने कहा कि भारतमाता की जय बोलने में हर्ज क्या है? यह हमारा फर्ज नहीं, बल्कि अधिकार है। ऐसा कहते हुए जावेद अख्तर ने सदन में तीन बार ‘भारतमाता की जय’ का उद्घोष किया।   

असदुद्दीन ओवैसी हमेशा संविधान की आड़ में अपने दोषों को छुपाने की चाल चलते हैं। इतना ही नहीं “अभिव्यक्ति की आजादी” के नाम पर चालाकी भरा वक्तव्य देते हैं। वाक्पटुता में माहिर ओवैसी और उनके भाई अकबरुद्दीन ख़ुद कई भड़काऊ और अनर्गल भाषणों पर कई केस दर्ज हैं। इसपर कोई उनसे सवाल पूछे तो यह कहकर कि “केस अदालत में है, अदालत फैसला करेगा, अदालत पर मुझे भरोसा है” बड़ी चालाकी से सवाल को टाल जाते हैं। आम तौर पर अदालत के फैसलों पर भरोसे की बात करनेवाले असदुद्दीन ओवैसी गत वर्ष जुलाई में आतंकवादी याकूब मेनन के समर्थन में खड़े हो गए थे। ज्ञातव्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 के मुम्बई धमाकों के लिए याकूब मेनन को दोषी पाया था और उसे 30 जुलाई, 2015 को फांसी की सजा देने का आदेश दिया। इससे पहले याकूब मेनन की दयायाचिका को भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ठुकरा दिया था। तब असदुद्दीन ओवैसी ने देश की सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति के इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा था कि याकूब को फांसी की सजा मजहब को आधार बनाकर दी जा रही है। देश पर हमले करनेवाले दोषियों को सजा दिलानेवाले निर्णयों के खिलाफ खड़े होनेवाले असदुद्दीन ओवैसी की वैचारिक सोच क्या कभी देशहित में हो सकती है? कभी नहीं।

ओवैसी का चिंतन हमेशा से हिन्दू विरोधी रही हैं। उनके भाषणों में आरएसएस और हिन्दू विरोध का जिक्र रहता ही है। वे बात करते हैं अल्पसंख्यकों के हित की। अल्पसंख्यकों की हित की बात करने में कोई बुराई नहीं है, पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों की आड़ में बहुसंख्यक हिन्दू समाज का विरोध करना कभी भी न्यायसंगत नहीं हो सकता। मुस्लिम तबकों को इस्लाम के नाम पर बरगलाने में माहिर ओवैसी अपनी राजनीति चमकाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं, यह उनके हाल ही के वक्तव्य से स्पष्ट होता है। सरसंघचालक ने ‘भारतमाता की जय’ कहने की शिक्षा की बात कही तो वे कहने लगे कि वह कभी ‘भारतमाता की जय’ नहीं बोलेंगे। वैसे भी वे अनेकों बार कह चुके हैं कि वे अल्लाह के सिवा किसी के सामने सिर नहीं झुकायेंगे। ऐसा कहकर वह यह भी बताने से नहीं चुकते कि इस्लाम में खुदा के सिवा किसी और के आगे झुकने का रिवाज नहीं है। पर भारतीय इतिहास में हिन्दुओं के साथ ही मुस्लिम देशभक्तों ने भी हमेशा से ही ‘भारतमाता की जय’ का उद्घोष किया है। आज भी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। महान क्रन्तिकारी अशफाक उल्ला खां ने तो यहां तक तक दिया था :-

"जाऊंगा खाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जाएगा; जाने किस दिन हिन्दोस्तान, आजाद वतन कहलाएगा।।

बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं, फिर आऊंगा-फिर आऊंगा; ले नया जन्म ऐ भारत माँ! तुझको आजाद कराऊंगा।।

जी करता है मैं भी कह दूं, पर मजहब से बंध जाता हूं; मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूं।।

हां, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूंगा; औ' जन्नत के बदले उससे, यक नया जन्म ही मांगूंगा।।  

हमारी परम्परा रही है कि हम भूमि और नदी को माता कहते हैं। हम अपनी जन्मभूमि को मातृभूमि और भाषा को मातृभाषा कहते हैं। रामायण में यह उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीराम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा था, - “अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते...जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी..."। जिसका अर्थ है कि “हे लक्ष्मण, भले ही लंका स्वर्णमंडित है, परंतु मुझे उसमें कोई रुचि नहीं है, क्योंकि जन्म देनेवाली मां तथा जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।"

वहीं विष्णुपुराण में कहा गया है कि, -

गायन्ति देवाः किल गीतिकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।

स्वर्गापवर्गास्पद - मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।         

अर्थात देवता गीत गाते हैं कि स्वर्ग और अपवर्ग की मर्गभूत भारत भूमि के भाग में जन्में लोग देवताओं की अपेक्षा भी अधिक धन्य हैं।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा है –

“हे शरणदायिनी देवि, तू करती सब का त्राण है।

हे मातृभूमि! सन्तान हम, तू जननी, तू प्राण है॥”  

‘भारतमाता की जय’ नहीं कहने की बात कहकर असदुद्दीन ओवैसी ने भारतभूमि को भारतमाता कहकर वन्दन करनेवाले ऋषियों और मनीषियों का, देश के लिए बलिदान होनेवाले अनगिनत देशभक्तों और सैनिकों का, देशभक्ति को जाग्रत करनेवाले कवियों, शायरों और साहित्यकारों का, और देश से अगाध प्रेम करनेवाले प्रत्येक भारतवासी की भारतभक्ति का अपमान किया है। लेकिन ओवैसी ने सबसे बड़ा अपमान तो “हमारी भारतमाता” का किया है। जिस भारतमाता की गोदी में वो पले, बढ़े, जहां उन्होंने अन्न खाया, पानी पिया, आज उसी भारतमाता की जय बोलने में उन्हें आपत्ति होती है। यह बेहद शर्मनाक है। अपनी मातृभूमि का जय कहने में जिसे कठिनाई होती है या जिसको शर्म आती है वह भारत का पुत्र या सुपुत्र नहीं हो सकता, वह तो कपूत ही कहलाएगा।