“विजय माल्या की तरह देश के अनेक पूंजीशाहों के यहां बैंकों की राशि डूब रही है लेकिन बैंक उनके खिलाफ समय रहते कदम नहीं उठाते। क्यों? जाहिर है, कर्ज देने के पीछे की बेईमानी है।”
 

विजय माल्या का नाम सुनते ही हमारे जेहन में सरेआम विलासितापूर्ण व मौज मस्ती का जीवन जीने वाले शख्स का चेहरा सामने आता है। एक ऐसा शख्स, जो अरबों रुपया पार्टियों पर खर्च करता था, जो अपने दोस्तों को विशेष विमान से क्रिकेट मैच दिखाने विदेश ले जाता था, जो सुन्दर लड़कियों के बीच खड़े होकर कैलेंडर के लिए फोटो खिंचवाता था...। उसी विजय माल्या की वर्तमान छवि बैंकों से कर्ज में लिया गया धन डकारकर देश से भागनेवाले की बन गई है। हालांकि देश में मचे हंगामे के बीच विजय माल्या ने ट्विट करके कहा है कि वो भागे नहीं हैं, देश की न्याय व्यवस्था पर उनको विश्वास है और वो उसका पूरा सम्मान करते हैं। अगर उनकी बात को सच मान लिया जाए तो वे जहां-जहां आवश्यकता होगी उपस्थित होंगे और जांच में सहयोग करेंगे। वैसे भी सीबीआई ने जबसे लुक आउट नोटिस जारी किया वे पांच बार विदेश जा चुके हैं। दरअसल, सीबीआई ने ही अपने लुक आउट नोटिस को कमजोर करके सिर्फ आवाजाही की सूचना तक सीमित कर दिया था। इसलिए हवाई अड्डे पर आव्रजन अधिकारी उनको रोक नहीं सकते थे। तो क्या यह मान लिया जाए कि सारा हंगामा बेवजह का है?

ऐसा नहीं कहा जा सकता है। विजय माल्या को कुछ बैंकों ने विलफुल डिफौल्टर यानी जानबूझकर गबन करनेवाला घोषित कर दिया है। उनके ऊपर बैंकों का 9091 करोड़ का बकाया है जिसमें अकेले किंगफिशर का 7800 करोड़ रुपया  है। माल्या ने अपने ट्विट में नहीं कहा है कि वो बैंकों का पैसा लौटाएंगे। देखना है माल्या का अगला कदम क्या होता है। लेकिन जैसा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया उनके खिलाफ 22 मामले चल रहे हैं। वास्तव में माल्या की नियति अब कानूनी एजेंसियों और न्यायालय के हवाले है। लेकिन इस समय माल्या ही केवल खलनायक लग रहे हैं, जबकि उनके पूरे मामले को गहराई से देखें तो इसमें पूरी बैंक प्रणाली एवं सत्ता प्रतिष्ठान की अंतर्लिप्तता साफ दिखाई देती है तथा उनके जैसे अनेक कारोबारी उसी श्रेणी में हैं। हमारे यहां बैंक उद्योगपतियों और कारोबारियों को जिस तरह कर्ज देने को आतुर रहते हैं वैसे गरीब किसान या ऐसे गरीब व्यक्ति को नहीं जो कुछ हजार या लाख से कोई धंधा करना चाहता हो। विजय माल्या एक समय इस देश में नए कारोबारियों के लिए आइकॉन थे और ब्रांड नाम थे, इसलिए बैंकों ने किंगफिशर एअरलाइन के नाम पर उतना कर्ज दिया जितना माल्या चाहते थे। हालांकि उनको पहले केवल शराब कोराबारी के रूप में ही जाना जाता था, लेकिन उनने अनेक क्षेत्रों में अपने कारोबार को फैलाया। कहा जाता है कि अपने देश की धारणा का ध्यान रखते हुए वे शराब कारोबारी की छवि तोड़ना चाहते थे। सरकार द्वारा जो जानकारी दी गई है उसके अनुसार उनको सितंबर 2004 में पहला कर्ज दिया गया। फिर 2 फरवरी, 2008 को उसका नवीनीकरण हुआ। जब किसी का खाता बिगड़ गया तो फिर उसे किसी प्रकार की बैंकिंग सुविधा मिलनी ही नहीं चाहिए थी। फिर 30 अप्रैल, 2009 को उनका खाता एनपीए भी हो गया। बावजूद इसके 21 दिसंबर, 2010 को उनके खाते को रिस्ट्रक्चर किया गया और सुविधाएं दी गईं। तब तक यह साफ होने लगा था कि उनका एअरलाइन व्यवसाय घाटे में जा रहा है। 2012 आते-आते किंगफिशर एअरलाइन का लाइसेंस रद्द हो गया। सवाल यह है कि उस समय तक बैंकों ने उनसे अपना कर्ज वसूलने के लिए क्या किया? उत्तर है, कुछ भी नहीं। बल्कि माल्या को और अपना गला बचाने के लिए कागजी कार्रवाइयां की गईं।    

बैंक तब जगे हैं जब डियाजियो ने माल्या को युनाइटेड स्पिरिट्स का अध्यक्ष पद छोड़ने को मजबूर किया और उसके एवज में उन्हें करीब 515 करोड़ रुपया देने की घोषणा हुई। डियाजियो के निदेशक मंडल का कहना था कि माल्या का नाम डूबते व्यवसाय से जुड़ गया है इसलिए कोई निवेशक कंपनी में धन नहीं लगाना चाहता। इसलिए उनका अध्यक्ष पद से हटना आवश्यक है। इसके बाद बैंकों को लगा कि उनके पास कोई चारा नहीं है। तो वे पहले कर्ज वसूली प्राधिकरण यानी डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल गए जिसने डियाजियो कंपनी की तरफ से माल्या को 7.5 करोड़ डॉलर (515 करोड़ रु.) देने पर रोक लगा दी। तब तक पता चला कि वे करीब 275 करोड़ तो कंपनी से ले चुके हैं। 17 बैंकों ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया कि उन्हें विदेश जाने से रोका जाए। उसके बाद उनके विदेश चले जाने की सूचना सामने आई। खैर, इसमें हम यहां विस्तार से न जाएं।

लेकिन केवल माल्या को खलनायक बनानेवाले कई तथ्यों को नजरअंदाज कर रहे हैं। आखिर माल्या को जो 9000 करोड़ रुपया का कर्ज दिया गया वह किस एवज में? माल्या ने जो संपत्ति बैंकों में गिरवी रखी थी, वो लिए गए कर्ज का 15वां हिस्सा भी नहीं था। यह यूं ही तो नहीं हुआ होगा। जाहिर है, इसके पीछे भी लेन-देन का खेल हुआ होगा। अगर माल्या 2012 के बाद बीच-बीच में ब्याज की राशि चुका देते तो यह खेल अंदर ही अदर चलता रहता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया तो बैंक प्रबंधन को लगा कि अपना गला भी फंसा सकता है, इसलिए उन्होंने कानूनी कार्रवाई का कदम उठाया है। स्वयं सीबीआई ने प्रश्न उठाया है कि जब माल्या की कंपनी डूब रही थी, तो एक बैंक ने उन्हें 800 करोड़ रु. का कर्ज कैसे दे दिया? बैंकों पर जो प्रश्न उठ रहे हैं उनका जवाब तो उन्हें देना ही होगा। अगर सीबीआई की ही बात मानें तो बार-बार लिखित तौर पर कहने के बावजूद बैंकों ने माल्या को धोखेबाज घोषित कर शिकायत दर्ज नहीं कराई। जांच एजेंसी ने अपनी पहल पर ही केस दर्ज किया। प्रवर्तन निदेशालय ने मामला बाद में दर्ज किया है। प्रवर्तन निदेशालय तो केवल हवाला आदि की ही जांच कर सकता है कि उनने इनमें से कितनी राशि विदेश भेजी।

हम यहां माल्या के बड़े व्यवसायी से पतन तक आने की कथा में नहीं जाना चाहते। हालांकि व्यवसाय में आनेवाले नए लोगों के लिए उसे जानना जरुरी है कि किस तरह एक आदमी 28 वर्ष की उम्र में पिता के उत्तराधिकारी के रूप में अपनी कंपनी का अध्यक्ष बना, धीरे-धीरे देश-विदेश में कंपनियां खरीदता और कारोबार बढ़ता जा रहा था, दूसरे कारोबारी उसकी नकल करते थे...उसकी ऐसी दुर्दशा हो गई कि वह बैंक के कर्ज का ब्याज तक नहीं लौटा सकता और उसे जबरन अपनी ही एक कंपनी के अध्यक्ष पद से हटने को बाध्य होना पड़ता है। लेकिन यहां मूल विषय है हमारे देश में जनता की बैंकों में जमा पूंजी का पूंजीशाहों के कब्जे में चला जाना। विजय माल्या की कर्ज कथा तो एक उदाहरण मात्र है कि किस तरह हमारे देश के बैंकर बैंकिंग कारोबार कर रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि किस तरह हमारी आपकी गाढ़ी कमाई को डुबोने के खेल में ये अंतर्लिप्त हैं। भाजपा और कांग्रेस के आरोप-प्रत्यारोप में न जाएं तो भी इसके पीछे राजनीतिक हस्तक्षेप की भूमिका से इन्कार करना कठिन है। आज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की दशा किसी से छिपी नहीं है। आम आंकड़ा यह है कि 4 से 5 लाख करोड़ के बीच एनपीए यानी ऐसा कर्ज हो गया जिसकी वापसी की संभावना नहीं। केवल इन बैंकों को चलाने के लिए 1 लाख 80 करोड़ रुपया की पूंजी चाहिए। अभी बजट में सरकार ने 25 हजार करोड़ रुपया दिया है जो कि अगले चार साल में कुल 70 हजार करोड़ के रिकैपिटलाइजेशन या पुनर्पूंजीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है।

विजय माल्या की तरह देश के अनेक पूंजीशाहों के यहां बैंकों की राशि डूब रही है लेकिन बैंक उनके खिलाफ समय रहते कदम नहीं उठाते। क्यों? जाहिर है, कर्ज देने के पीछे की बेईमानी है। जिस तरह किंगफिशर एअरलाइन के बंद हो जाने के बाद भी बैंकों ने कर्ज वापसी के लिए कदम नहीं उठाया उसी तरह अन्य कंपनियों के साथ भी हुआ है। कुछ कंपनियों का कारोबार खराब हो सकता है और यह बात समझ में आती है। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो जानबूझकर बैंकों की राशि को डकारने के लिए कंपनियां डुबाते हैं, अपने को बैंक्रप्ट यानी कंगाल घोषित कर देते हैं। मजे की बात देखिए कि एक कंपनी के कारण वे कंगाल हैं तो दूसरी कंपनी आराम से चल रही होती है। ऐसे सारे लोगों को विलफुल डिफॉल्टर यानी जानबूझकर कर्ज हड़पने वाला घोषित कर कार्रवाई हो, उनकी दूसरी कंपनियों या संपत्ति को अटैच करने का कदम उठाया जाए तो दूसरे डर से इस तरह धोखाधड़ी करने से बचेंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं।