कोलकाता, मार्च 28, लखेश्वर चंद्रवंशी : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने कहा कि हम भारत एक संपन्न, समतायुक्त और शोषणमुक्त बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि देश को स्वाभिमान और सामर्थ्य संपन्न बनें और संघ चाहता है कि पूरी दुनिया भारत का नाम ले। इसके लिए हमें अपने जीवन में ‘भारत’ को जीना होगा। संघ इसी के लिए कार्य कर रहा है। डॉ.भागवत कोलकाता में फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल सोसाइटी नामक संस्था के सहसंस्थापक दिवंगत मदनलाल अग्रवाल के जीवन पर लिखी गई पुस्तक के विमोचन के अवसर पर बोल रहे थे।

सरसंघचालक ने मदनलाल अग्रवाल के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए कहा कि उनकी (मदनलाल अग्रवाल) केवल स्मृति को स्मरण में लाकर काम नहीं चलेगा। स्मृति स्मरण से हृदय में जानी चाहिए और हृदय से कृतित्व में आनी चाहिए, इसलिए इस ग्रन्थ का नाम भी अच्छा है - मदनलाल अग्रवाल : व्यक्तित्व और कृतित्व। इसकी आवश्यकता है। आवश्यकता इसलिए भी है कि ये हम सब लोगों का राष्ट्रीय, धार्मिक, सामाजिक सब प्रकार का कर्तव्य है।

सरसंघचालक डॉ.भागवत ने कहा कि हम लोग भारत के हैं। हम लोग ‘भारतमाता की जय’ कहते हैं। जो भारत शब्द है यह केवल भूमि वाचक शब्द नहीं है, यह गुण वाचक शब्द है। और उन गुणों के साथ जब इस भूमि का वासी खड़ा होता है तब वह भारत कहलाता है। अन्यथा वह भारत नहीं कहलाता। सरसंघचालक ने पाकिस्तान का उल्लेख करते हुए आगे कहा कि उन गुणों के साथ खड़ा रहना स्वीकार नहीं था उन्होंने अपना अलग देश बनाया। उन गुणों का वर्णन जहां से आया वह उदगम स्थल, उन्होंने अपना देश वहां बनाया है, पाकिस्तान में। वेदों की रचना, हमारी देवभाषा, आदिभाषा संस्कृत का व्याकरण वहां रचा गया। वहां से हमारे पूर्वज सारी दुनिया में गए। ये सब होने के बाद भी उन्होंने (पाकिस्तान ने) अलग होते समय हमसे यह नहीं कहा कि हम अपने देश का नाम भारत रखेंगे, तुम अपने देश का नाम दूसरा ढूंढो। ये उन्होंने कहा नहीं, उन्होंने अपना नाम अलग लिया। क्योंकि जिन गुणों को वे नहीं चाहते थे, वो सब भारत नाम लेते ही उनके पीछे-पीछे आ जाते। सरसंघचालक ने जोर देकर कहा कि ये भारत का प्रयोजन है कि गुणों को जी कर दुनिया को दिखाना।  

सरसंघचालक ने कहा कि चरित्र की यह परम्परा, जिसे हिन्दू परम्परा कहा जाता है, चलती चली आ रही है। आज दुनिया के किसी भी देश में चले जाओ 200 साल पहले जो वह देश था वह वैसा देखने को नहीं मिलता, वह बदल गया है। वह अच्छाई की तरफ बदल गया या उसका अधःपतन हो गया, लेकिन वह जैसा था, वैसा देखने को नहीं मिलता। एकमात्र दुनिया में भारतवर्ष ऐसा है इसके जो प्राचीनतम जीवन दर्शन है, उसका प्रत्यक्ष आचरण आज भी यहां पर देखने को मिलता है। डॉ.भगवत ने जोर देते हुए कहा कि यह कागज लेखी बात नहीं, आंखन देखि बात है भाई! सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रहमचर्य, तप, संतोष, ईश्वर प्रणिधान, ये सारी बातें जो है यम, नियम, आत्मीयता, आचरण की, ये सारी की सारी आज भी भारत वर्ष में देखि जा सकती है। उस जीवन को भारत कहते हैं भारत के जीवन की यह परम्परा सब प्रकार की आपत्तियों और कष्टों को पार कर आज तक चलती आई। इसका कारण तो जीवन ही है।   

सरसंघचालक ने जोर देते हुए कहा कि ‘भारतमाता की जय’ यदि सारी दुनिया में करवानी है  तो भारत को एक संपन्न, समतायुक्त, शोषणमुक्त भारत बनाया है स्वाभिमान, सामर्थ्य संपन्न भारत बनाना है तो उस भारत को अपने जीवन में जीना पड़ेगा।