हंबन्टोटा यह नाम हम भारतीयों ने सुना सन २०१११ के क्रिकेट वर्ल्ड कप के समय. इस वर्ल्ड कप के २ मैच (श्रीलंका – कनाडा और पाकिस्तान – केन्या), हंबन्टोटा में खेले गए, २० और २३ फरवरी, २०११ को. तब यह नाम अचानक सामने आया था. इसके पहले हंबन्टोटा में क्रिकेट का इतना अच्छा, विश्व स्तरीय स्टेडियम हैं, यह किसी को पता ही नहीं था. स्टेडियम तो छोडिये, श्रीलंका में हंबन्टोटा नाम का कोई शहर भी हैं, ये किसको मालूम था..?


 लेकिन सन २०११ ने हंबन्टोटा का एक बिलकुल अलग रूप लोगों के सामने लाया. एक अत्यंत विकसित शहर. उससे भी ज्यादा, एक विकसित और अति आधुनिक बंदरगाह. और यह कमाल था, चीन का..!

 जी हां. श्रीलंका के हंबन्टोटा का महत्व चीन ने समझा. श्रीलंका के बिलकुल दक्षिणी छोर का यह समुद्री गांव. अंतर्राष्ट्रीय समुद्री यातायात की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान पर. प्रतिवर्ष इस समुद्री रास्ते से ३६,००० से भी ज्यादा जहाज गुजरते हैं, जिनमे साढ़े चार हजार तो तेल से भरे टेंकर होते हैं. ये सारे जहाज, मुख्य रास्ते से थोडा हटकर, थोडा अन्दर आकर, कोलंबो बंदरगाह पर रुकते हैं. लेकिन यदि हंबन्टोटा को विकसित बंदरगाह के रूप में खड़ा किया तो अनेक जहाज़ों का अतिरिक्त समय और इंधन बच जाएगा. कोलंबो बंदरगाह का बोझ कम होगा और हंबन्टोटा एक सामरिक रूप से बड़ा बंदरगाह बन कर उभरेगा.

 सन २००० के बाद से, अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत, चीन ऐसे सामरिक ठिकाने ढूंढ ही रहा था, जिसे बाद में मोतियों की माला (String of Pearls) कहा गया. हंबन्टोटा इसमें बिलकुल फिट  बैठता था. मानो मोतियों की माला का सिरमौर मोती. श्रीलंका की सरकार भी उसका विकास करना चाहती थी. पर पैसों की समस्या थी.

 


यह सब जब चल रहा था, तो सन २००४ की सुनामी ने सब कुछ नष्ट कर दिया. हंबन्टोटा वीरान हो गया. आखिरकार श्रीलंका सरकार ने पैसों और कुछ शर्तों के बदले हंबन्टोटा चीन को सोंप दिया. तत्कालीन राष्ट्रपति महेंद्र राजपक्षे की इसमें प्रमुख भूमिका थी.

 चीन के लिए यह एक सुनहरा अवसर था. लगभग सवासौ करोड़ डॉलर्स से उसने इस बंदरगाह को बनाया. चीन की ‘चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी’ ने इसका निर्माण किया. नवंबर २०१० में, नियत समय से पांच माह पूर्व, चीनी कंपनी ने इसके प्रथम चरण के निर्माण को पूर्ण किया और यह नया बंदरगाह, जहाजों की आवाजाही के लिए खोल दिया.

 चार हजार एकड़ में फैले इस विशाल बंदरगाह का तीसरा और चौथा चरण पूर्ण हो चुका हैं. अत्याधुनिक स्टेडियम, विश्वविद्यालय परिसर, अत्यंत भव्य शॉपिंग मॉल्स तथा महेंद्र राजपक्षे के नाम से बनाया हुआ अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा... चीन ने इन सबमे बड़ा निवेश किया हैं.

 लगभग १५ वर्ष पहले, जो हंबन्टोटा एक छोटासा, उपेक्षित सा समुद्री गांव था, आज वह चीन की मदद से श्रीलंका का दूसरा सबसे बड़ा शहर / बंदरगाह बनने जा रहा हैं...!

 चीन ने यह निवेश किसी परोपकारी भावना से नहीं किया हैं. न ही केवल व्यापारी हेतु से. चीन नजरों में हंबन्टोटा का सामरिक महत्व बहुत ज्यादा हैं.

 भारत का दक्षिण भाग समुद्र से घिरा हैं. इस पूरे क्षेत्र में श्रीलंका और मालदीव के सिवाय और कोई देश नहीं हैं. मालदीव तो बहुत छोटा सा देश हैं और श्रीलंका के साथ हमारे संबंध दुश्मनी के नहीं हैं. इसलिए हम मानते थे की हमारा पूरा दक्षिणी क्षेत्र शत्रुओं के हमले से सुरक्षित हैं.

 लेकिन अब ऐसा नहीं हैं..!

 हंबन्टोटा में इतना बड़ा निवेश करने के एवज में, चीन ने वहां पर अपना नौसैनिक अड्डा बनाया हैं. वहाँ पर चौबीसों घंटे, तीन सौ पैंसठ दिन चीनी सेना खड़ी हैं. पूर्व से पश्चिम किनारों तक और पश्चिम से पूर्व किनारों तक जाने वाले हमारे सभी जहाजों को हंबन्टोटा होते हुए ही गुजरना पड़ेगा. अर्थात संकट की घडी में चीन हमारी यह आपूर्ति शृंखला (सप्लाई चैन) रोक सकता हैं.

 भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी खतरे की घंटी हैं..!!