पिछले पांच लघु-आलेखों में चीन की बाह्य चुनौतियों की चर्चा मैंने की थी. चीन ने नेपाल से बनाए मधुर संबंधों से लेकर तो गिलगिट-बाल्टिस्तान में चीन की बढती उपस्थिति, ग्वादर, मालदीव्स, हंबन्टोटा, कॉक्स बाजार (चिटगांव) आदि स्थानों पर चीनी नौसेना के अड्डे और इनके द्वारा, भारत को घेरते हुए बनाई गई ‘मोतियों की माला’ हमने देखी. चूँकि इस लघु – लेखमाला की मर्यादा मात्र ७ आलेखों की हैं, इसलिए मियांमार जैसे स्थानों पर चीन के उपस्थिति की बहुत ज्यादा चर्चा करना संभव नहीं था.


 चीन ने जो बाह्य चुनौतियाँ पिछले पंधरा – बीस वर्षों में हमारे सामने खड़ी की हैं, उसी प्रकार जबरदस्त आंतरिक चुनौती भी हमें दी हैं. चीन ने हमारी आर्थिक संप्रभुता के सामने ही प्रश्नचिन्ह लगाने के पूरे प्रयास किये हैं.

 हम सब ने भी अनुभव किया होगा, की पिछले १० – १५ वर्षों में यकायक हमारे बाजार चीनी सामानों से पट गए. अत्यंत कम कीमतों में सामान उपलब्ध कराने के कारण हमारे स्थानीय उत्पादक रास्ते पर आ गए और समय की नजाकत देखते हुए वे भी उत्पादक (producer) से ट्रेडर बन गए. वे खुद भी चीनी सामान खरीदकर बेचने लगे.

 सन २००० के आसपास चीन ने ‘विश्व व्यापार संघ’ (WTO) की सदस्यता स्वीकार की. हम तो उसके सदस्य पहले से ही थे. अतः भारत और चीन के बीच मुक्त व्यापार की शुरुआत हुई. इसे कहा तो गया ‘द्वीपक्षीय व्यापार’. लेकिन वास्तविकता में चीन अपना सामान हमारे यहां थोपता रहा, हम खरीदते रहे. हमारे पास जो बेचने को था (software, मसाले आदि), वो चीन को खरीदना नहीं था. अतः चीन के साथ हमारा व्यापारिक घाटा दिन-ब-दिन बढ़ता ही गया.

 पिछले वर्ष हमारी कुल आयात ६१० बिलियन अमरीकन डॉलर्स थी. इसमें चीन का कुल हिस्सा था – १२.७%. अर्थात हमारे तेल (पेट्रोलियम पदार्थों) की आयात से भी ज्यादा आयात हमने चीन से की हैं. और हमारी महत्वपूर्ण विदेशी मुद्राएं हमने लाईट की मालाएँ, प्लास्टिक के खिलौने जैसे चीनी माल को खरीदने में गवा दी हैं.

 इसके विपरीत अगर हम निर्यात देखे, तो पिछले वर्ष हमारा कुल निर्यात था ४७७ बिलियन अमरीकन डॉलर्स. इसमें चीन का हिस्सा मात्र ४.२% हैं.

 अगर ताजा आंकड़े देखे तो भी हमारे ध्यान में आयेगा की चीन से हमने ६१. ५४ बिलियन अमरीकन डॉलर्स का आयात किया और चीन को मात्र ९.६८ बिलियन अमरीकन डॉलर्स का निर्यात किया हैं. अर्थात चीन के साथ हमारा व्यापारिक घाटा, ताजा आंकड़ों में ५१.८६ बिलियन अमरीकन डॉलर्स हैं..!

 ये आंकड़े भयानक हैं. चीन की व्यापार करने की शैली में नैतिकता, गुणवत्ता, स्थायीत्व इन सब बातों का दूर – दूर तक कोई स्थान नहीं हैं. इसलिए सस्ते दामों पर, कम गुणवत्ता वाला, सामान्य जरूरतों का सामान बेचकर चीन ने हमारा बाजार बड़े पैमाने पर ध्वस्त किया हैं. साथ ही हमारी बहुमूल्य विदेशी मुद्रा, फ़ालतू चीजों के लिए खर्च करवाई हैं.

 बाह्य चुनौतियों के साथ, चीन की यह आंतरिक चुनौती भी अत्यंत गंभीर हैं..!!