देशद्रोह के आरोपी और जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को छह माह की अंतरिम जमानत मिलने पर वामपंथी विचारधारा के अनुयायियों में काफी उत्साह है। कन्हैया के जेल से बाहर आने पर वामपंथियों और उसके समर्थकों ने 'होली-दीवाली' सब एकसाथ मना ली। गुरुवार रात को जेएनयू परिसर में कन्हैया कुमार के भाषण के बाद उसके समर्थक गुब्बारे हो गए हैं। सब यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कन्हैया को देश से नहीं बल्कि देश में आजादी चाहिए। वह तो भुखमरी, गरीबी, अव्यवस्था से आजादी मांग रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी चाहिए। खुद को वैज्ञानिक सोच का बतानेवाले तथाकथित प्रगतिशील इस तरह की अतार्किक बहस भी शुरू कर सकते हैं, यह गजब की बात है। यदि अभिव्यक्ति की आजादी नहीं होती तब क्या कन्हैया कुमार जेल से छूटकर जेएनयू में मजमा जुटाकर प्रधानमंत्री को कोस सकते थे? या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्हें वही 'देशविरोधी नारे' लगाने की आजादी चाहिए। भुखमरी, गरीबी और अव्यवस्था से तो सबको आजादी चाहिए। यह सवाल दो साल पहले सत्ता में आई एनडीए सरकार की अपेक्षा करीब 60 साल शासन में रही कांग्रेस से पूछा जाना अधिक व्यवहारिक होता।

अब इसे बदलाव कहा जाए या फिर खुद को बचाने के लिए कन्हैया कुमार की चालाकी, अपने पूरे भाषण में उसने कश्मीर, केरल, बंगाल की आजादी का नारा बुलंद नहीं किया। आतंकी अफजल, मकबूल और याकूब को शहीद नहीं बताया गया। हालांकि इनका विरोध भी नहीं किया। यह संभवतः पहली बार ही था कि कन्हैया की तकरीर के दौरान लाल झंडे की जगह तिरंगा फहराया गया और आखिर में भारतमाता की जय का उद्घोष किया गया। यह भी चौकाने वाला बदलाव है कि जो लोग जेएनयू में 9 फरवरी तक जिस न्यायपालिका को 'हत्यारा' बता रहे थे, अब उन्हें उसी व्यवस्था में भरोसा दिखने लगा है। हालांकि यह बदलाव वास्तविक नहीं बल्कि आभासी है। सब राजनीतिक चतुराई है। वामपंथी इस तरह की राजनीति में माहिर हैं। वरना क्या कारण है कि आत्महत्या कर रहे जिन किसानों को कन्हैया अपना 'पिता' कह रहा था, नंदीग्राम में उन्हीं 'पिताओं' की हत्या करनेवालों के खिलाफ आजतक और कल भी उसने कुछ नहीं बोला। एक दिन पूर्व ही वामपंथी-माओवादी विचारधारा से प्रेरित नक्सलियों ने 16 गरीब मासूम ग्रामीणों की हत्या की है, उनके प्रति भी संवदेना जताना कन्हैया कुमार ने जरूरी नहीं समझा। यह खामोशी क्या सिर्फ इसलिए कि उनकी हत्या करने वाले नक्सली थे? जिस विषय पर वामपंथी फंस जाते हैं, उससे पलटी मारने में भी वे देरी नहीं लगाते। कन्हैया प्रकरण इसका जीता-जागता प्रकरण है। वामपंथी हिटलर को तो गाली देते हैं लेकिन स्टालिन और माओ की तानाशाही और क्रूर प्रवृति पर बात करने से भागते हैं। हिन्दू धर्म का आघात पहुंचाने के लिए अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहिए लेकिन जैसे ही तस्लीम नसरीन और सलमान रुश्दी की बात आती है, ये कन्नी काट जाते हैं। जैसे ही वामपंथियों को अहसास हुआ कि आतंकियों का शहीदी दिवस मनाने से देश आक्रोशित है, उन्होंने कुछ समय से अफजल और याकूब का नाम रटना बंद कर दिया है। देश के जवानों को भी अब कन्हैया कुमार अपना 'भाई' बताने लगा है।

“कन्हैया कुमार का पूरा भाषण आरएसएस, एबीवीपी, भाजपा और नरेन्द्र मोदी के खिलाफ था। अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों को बदनाम करने के लिए उसने 'गोलवलकर और मुसोलनी की मुलाकात' जैसे झूठ का सहारा भी लिया।”
 

यह भी असल वामपंथ की पहचान है। विरोधी को गोएबल्स के सिद्धांत से झूठ के चक्रव्यूह में फंसा दो। बहरहाल, देशद्रोह के आरोपी कन्हैया के भाषण से ऊर्जा पाए वामपंथियों को जोश में होश नहीं खोना चाहिए। उन्हें बार-बार दिल्ली हाईकोर्ट की सीख को याद करना चाहिए और अपनी सोच को बेहतर करना चाहिए। उच्च न्यायालय ने कन्हैया को अंतरिम जमानत देते हुए गंभीर टिप्पणियां की हैं। कन्हैया के मार्गदर्शकों और समर्थकों को उन टिप्पणियों पर ध्यान देना चाहिए। जेएनयू में 9 फरवरी को हुए कार्यक्रम में जो पोस्टर और नारे लगाए गए थे उसकी तुलना दिल्ली हाईकोर्ट ने संक्रमण से की है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यह संक्रमण जेएनयू के छात्रों में फैल गया है और यह महामारी का रूप ले इससे पहले इस पर नियंत्रण जरूरी है। जो भी नारे और पोस्टर जेएनयू में लगाए गए थे, वह किसी भी सूरत में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने यह भी कहा है कि जेएनयू के शिक्षकों को अपनी भूमिका के साथ न्याय करना चाहिए। भटके छात्रों को सही रास्ते पर लाना शिक्षकों की जिम्मेदारी है। लेकिन, प्रतीत होता है कि वामपंथी विचारधारा से प्रेरित शिक्षकों और बुद्धिजीवियों पर न्यायालय के संदेश का कोई असर नहीं है। गुरुवार रात को दो-तीन मीडिया चैनल और पत्रकार भी अति उत्साही दिखाई दिए। उन्होंने कन्हैया कुमार को इस तरह कवरेज दिया मानो सियाचीन से मैदान जीतकर कोई सैनिक लौटा हो। जेएनयू के शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और मीडिया को अपनी जिम्मेदारी को भली प्रकार समझना चाहिए। ऐसा न हो कि हम भावावेश में युवाओं को गलत दिशा की ओर प्रेरित कर दें। उनके आपत्तिजनक कार्य-व्यवहार को ठीक करने की जगह सही ठहरा दें। युवाओं को नियंत्रित करने और उन्हें सही दिशा देने की आवश्यकता है।