शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की यह नियति है कि उसके अधिकारी कुछ भी बोलेंगे उस पर विवाद होगा ही। भले वो बातें चाहे जितनी संतुलित हों, जितने तार्किक हों और जितने सहमतिकारक हों, उनमें से उतने अंश निकाल लिए जाएंगे जिनसे वो असंतुलित, अतार्किक और असहमतियों वाला बयान बन जाए। हाल में संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी द्वारा राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत पर दिए गए वक्तव्य पर चल रहा विवाद इसी श्रेणी का है। संघ से वैचारिक मतभेद समझ में आने वाली है। विचारों और सोच से सहमति-असहमति एक खुले एवं लोकतांत्रिक समाज का लक्षण है। इससे हर पक्ष को अपने विचार को लेकर लगातार आत्मविश्लेषण करते रहना पड़ता है तथा बोलते समय सतर्क भी। इससे समाज स्वस्थ और जीवंत बना रहता है। किंतु असहमति या सहमति तो उससे हो सकता है जो है। अगर वह है ही नहीं, जो विचार किसी ने प्रकट ही नहीं किया या जो किसी संगठन या व्यक्ति का विचार है नहीं उससे असहमति प्रकट करने या उस पर विवाद पैदा करने को क्या कहेंगे?

भैया जी जोशी के बयान को कुछ हलकों में ऐसे प्रकट किया मानो वे भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा को नकार रहे हों, राष्ट्रगान जनगण मन को खारिज कर रहे हों और इनकी जगह भगवा ध्वज तथा वंदे मातरम को अपनाने की वकालत कर रहे हों। अगर ऐसा है तो इसका विरोध किया जाना चाहिए। किंतु क्या वाकई जोशी ने ऐसा ही कहा? संघ की ओर से विवाद पर स्पष्टीकरण आ गया है। बयान जारी कर संघ ने कहा है कि भैया जी जोशी ने ध्वज या राष्ट्रगान में कोई बदलाव करने की बात नहीं कही थी। वह सिर्फ राज्य शक्ति और राष्ट्र के बीच अंतर के बारे में चर्चा कर रहे थे। इसी संदर्भ में उन्होंने वंदे मातरम को भारत की सांस्कृतिक पहचान और भगवा ध्वज को भारत की प्राचीन संस्कृति का प्रतीक बताया था। इस बयान के अनुसार जोशी ने कहा कि 1947 में संविधान सभा ने तिरंगा को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया था और उसे भारतीय गणराज्य ने बरकरार रखा। भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए यह अनिवार्य है कि वह उस प्रतीक का सम्मान करें। इस स्पष्टीकरण के बाद वैसे भी विवाद खत्म हो जाना चाहिए। किंतु विरोधी मानने वाले नहीं हैं। जोशी ने वही कहा जो संघ ने अपने बयान में बताया है। उन्होंने कहा कि

“हम तिरंगा, जो हमारा राष्ट्रीय ध्वज है और भगवा झंडा, जो हमारी प्राचीन संस्कृति का प्रतीक है, दोनों को पूज्य मानते हैं। इसी तरह उन्होंने कहा कि जन-गण-मन राज्य की धारणा को प्रकट करता है जबकि वंदे मातरम हमारी सांस्कृतिक पहचान को प्रकट करता है।”

उन्होंने कहा कि जन-गण-मन आज हमारा राष्ट्रगान है। इसका सम्मान किया जाना चाहिए। इस बात का कोई कारण नहीं है कि कोई और भावना पैदा होनी चाहिए। हालांकि, वंदे मातरम में जिस भावना का इजहार किया गया वह राष्ट्र के चरित्र और शैली को अभिव्यक्त करता है। दोनों सम्मान के हकदार हैं। कुल मिलकार उनका कहना था कि हम सबको राष्ट्रगान और राष्ट्र गीत दोनों का समान रूप से सम्मान करना चाहिए।

इस वक्तव्य में कहा गया है कि देश तिरंगा झंडा को छोड़कर भगवाध्वज को तथा जनगणमन का छोड़कर वंदेमातरम को अपना ले? तो जो कहा ही नहीं गया उस पर विवाद हो रहा है। हम झंडे के विकास का अध्ययन करें तो यह पता चलता है कि भगवाध्वज को भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान के रूप में तब से अपनाया गया था जबसे दुनिया में राष्ट्र, राज्य की अवधारणा पैदा भी नहीं हुई थी। जोशी ने एक प्रश्न के उत्तर में राज्य, देश और राष्ट्र के बारे में अपने विचार स्पष्ट किए थे। उन्होंने कहा कि राज्य एक राजनीतिक ईकाई है, देश एक भौगोलिक ईकाई है जिसकी सीमा में परिवर्तन होता रहता है, किंतु राष्ट्र सनातन ईकाई है यह उस संस्कृति और दर्शन का प्रतीक है जिसे उस क्षेत्र के वासियों ने जीवन शैली के रूप में अपनाया हुआ है। वास्तव में भारतीय राष्ट्र की यही अवधारणा है। यहां अनेक राज्य थे, लेकिन एक विस्तृत भूखंड की संस्कृति और सभ्यता में ऐसी अंतर्निहित एकता थी जिसे राष्ट्र के रूप में माना गया। चूंकि हमने नेशन स्टेट यानी राष्ट्र राज्य की पश्चिमी अवधारणा को स्वीकार लिया और भारतीय अवधारणा को भूल गए इसलिए इसे समझने में समस्या आती है, लेकिन सच यही है।  

आजादी के बाद हमने इस राष्ट्र राज्य की अवधारणा के अनुरूप अपना संविधान बनाया, उसके अनुसार आजादी के आंदोलन के दौरान विकसित हुए तिरंगा झंडा को राष्ट्र ध्वज के रूप में स्वीकार किया। इसके विकास का भी अपना इतिहास है और 22 जुलाई, 1947 को भारत के संविधान द्वारा इसे स्वीकारने के पहले इसके विकास के इतिहास को पढ़ना चाहिए। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में एक झंडे की आवश्यकता महसूस होना स्वाभाविक था। इस दिशा में सन् 1904 में विवेकानन्द की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने पहली बार एक ध्वज बनाया, जिसे बाद में सिस्टर निवेदिता ध्वज के नाम से जाना गया। यह ध्वज लाल और पीले रंग से बना था। पहली बार तीन रंग वाला ध्वज सन् 1906 में बंगाल के बँटवारे के विरोध में निकाले गए जलूस में शचीन्द्र कुमार बोस लाए थे। सन 1908 में भीकाजी कामा ने जर्मनी में तिरंगा झंडा लहराया और इस तिरंगे में सबसे ऊपर हरा रंग था, बीच में केसरिया, सबसे नीचे लाल रंग था। इस ध्वज में भी देवनागरी में वंदे मातरम् लिखा था। इस ध्वज को भीकाजी कामा, वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने मिलकर तैयार किया था। प्रथम विश्व युद्ध के समय इस ध्वज को बर्लिन कमेटी ध्वज के नाम से जाना गया, क्योंकि इसे बर्लिन कमेटी में भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा अपनाया गया था। सन 1916 में पिंगली वेंकैया, एस.बी. बोमान जी और उमर सोमानी ने मिल कर नेशनल फ़्लैग मिशन का गठन किया। वेंकैया ने राष्ट्रीय ध्वज के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से सलाह ली और गांधी जी ने उन्हें इस ध्वज के बीच में अशोक चक्र रखने की सलाह दी, जो संपूर्ण भारत को एक सूत्र में बाँधने का संकेत बने। पिंगली वेंकैया लाल और हरे रंग के की पृष्ठभूमि पर अशोक चक्र बना कर लाए पर गांधी जी को यह ध्वज ऐसा नहीं लगा कि जो संपूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व कर सकता है। सन् 1931 में 7 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई। इसी साल कराची कांग्रेस कमेटी की बैठक में पिंगली वेंकैया द्वारा तैयार ध्वज, जिसमें केसरिया, श्वेत और हरे रंग के साथ केंद्र में अशोक चक्र स्थित था, को सहमति मिल गई। आज़ादी से कुछ दिन पहले फिर यह सवाल उठा कि राष्ट्रीय ध्वज को क्या रूप दिया जाए। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई और 14 अगस्त को कमेटी ने इस तिरंगे ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज मान लेने की सिफ़ारिश की जिसे स्वीकार कर लिया गया।

इसी तरह राष्ट्र गान का भी मामला है। वंदे मातरम बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय रचित गीत है जिसकी भारतीय स्वंतत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही। सन् 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कोलकता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया। सन् 1901 में कोलकाता में हुए अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया। सन् 1905 के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया। तो यह गीत कभी अछूत नहीं रहा। कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वंदे मातरम गीत के प्रयोग के अनेक उदाहरण हैं। सन् 1929 में प्रकाशित शहीद पं.राम प्रसाद बिस्मिल की प्रतिबन्धित पुस्तक क्रान्ति गीतांजलि में पहला गीत मातृ-वन्दना वन्दे मातरम् ही था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी, 1950 में वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने सम्बन्धी जो वक्तव्य पढ़ा उसे देखिए- शब्दों व संगीत की वह रचना, जिसे जन गण मन से सम्बोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभायी है; को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को सन्तुष्ट करेगा।’ तो संविधान सभा ने इसे स्वीकार कर लिया। इस तथ्य को आज याद दिलाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि दुर्भाग्यवश कुछ लोग वंदे मातरम को सांप्रदायिकता का स्वर साबित करने पर तुले हैं। भैयाजी जोशी की आलोचना करने के पीछे यह कारण भी है। किंतु जोशी ने जो कहा वही सच है और उसके पीछे इतिहास के प्रमाण एवं भारतीय सोच और दर्शन का आधार है।