दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के व्यक्तित्व पर अनेक लोग शोध कर रहे हैं। कारण, उनके व्यक्तित्व में इतने अंतर्विरोध सामने आए हैं कि यह कहना कठिन हो गया है कि उनको किस तरह का व्यक्ति माना जाए। हालांकि उनके साथ एक समय कंधा से कंधा मिलाकर काम करने वाले कुछ पुराने साथियों का निष्कर्ष उनके बारे में बिल्कुल साफ है। वे उन्हें किसी भी दृष्टि से एक संवेदनशील, शालीन, ईमानदार, लोकतांत्रिक संस्कार का तथा जनता व समाज के प्रति समर्पित व्यक्ति नहीं मानते। वैसे उनको जनता के लिए लड़ते, बिजली के खंभों पर चढ़ते...बिजली बिल के विरोध में लंबा अनशन करते देखने से यह जरुर लगता था कि इस आदमी में समाज के सामान्य लोगों के प्रति निश्चय ही गहरी संवेदनशीलता है तभी तो ऐसा कर रहा है। उसके अंदर यदि समाज के प्रति समर्पण नहीं होगा, व्यक्तित्व में ईमानदारी नहीं होगी तो फिर वह क्यों इस तरह का कष्ट उठाएगा? इसी तरह यदि उसमें लोकतांत्रिक संस्कार नहीं है तो फिर लोकतांत्रिक तरीके से वह संघर्ष करने में विश्वास नहीं करता। लंबे-लंबे अनशन, धरना नहीं करता। किंतु अब उनको काम करते इतना समय हो गया है कि बिल्कुल निरपेक्ष होकर उनका मूल्यांकन किया जा सकता है। मूल्यांकन के बाद किसी भी तटस्थ व्यक्ति का निष्कर्ष यही आएगा कि केजरीवाल में वाकई सामान्य संवेदनशीलता और मनुष्यता नहीं है। उनके लिए केवल और केवल राजनीति सर्वोपरि है।

इस समय का एक उदाहरण लीजिए। लातूर में पानी के संकट के भयावह होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक निर्णय लिया कि निकट जहां भी पानी हो वहां से रेलवे के द्वारा भेजा जाए। यह एक अच्छा कदम है और साहसी निर्णय भी। इसमें पानी से छटपटाते लोगों के प्रति संवेदनशीलता भी है। अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर इस कदम की सराहना की। उन्होंने लिखा कि 21 वीं सदी में यदि एक व्यक्ति भी पानी की कमी से मरता है तो हमारे लिए शर्म की बात होगी। यहां तक तो ठीक था। फिर उन्होंने लिखा कि दिल्ली के लोग अगले दो महीने तक प्रतिदिन 10 लाख लीटर पानी महाराष्ट्र को देने के लिए तैयार हैं। आप इसे भिजवाने की व्यवस्था कर दें। आप दूसरे मुख्यमंत्रियों से भी अनुरोध करें तो सभी आगे आएंगे। पहली नजर में यह लग सकता है कि देखो, अरविन्द केजरीवाल पहले मुख्यमंत्री निकले जिनने इस तरह की पेशकश की।

किंतु इसका दूसरा पहलू देखिए। केन्द्र सरकार ने काफी मेहनत किया तो पहले एक मालगाड़ी तैयार हुई जो पांच लाख लीटर पानी लेकर लातूर पहुंची। केजरीवाल उसके दोगुणा प्रतिदिन देने की पेशकश कर रहे हैं। पानी से भरे 10 वैगन के साथ वाटर ट्रेन 11 अप्रैल को मिराज से रवाना हुई थी। एक वैगन में 50 हजार लीटर पानी है। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा कि 50 वैगन साफ करवाकर मिरज भेज दिए गए हैं। पानी के 50 वैगन लेकर एक माल ट्रेन राजस्थान के कोटा से पुणे के मिरज के लिए रवाना हुई थी। ऐसी ही दूसरी ट्रेन 15 तारीख को रवाना होगी। एक वैगन में 54 हजार लीटर पानी आता है। यानी एक साथ 5 लाख 40 हजार लीटर पानी चलेगा जिसमें से करीब 5 लाख लीटर अपने गंतव्य तक पहुंच सकता है। जरा सोचिए, प्रधानमंत्री ने निर्देश दिया तो रेलवे ने किसी तरह युद्ध स्तर पर काम करने 50 वैगन तैयार किया। यानी प्रति 10 वैगन के अनुसार पांच माल ट्रेन पानी लेकर चल सकती है। उसको भी प्रतिदिन ले जाना अभी संभव नहीं हुआ। तो फिर प्रतिदिन 10 लाख लीटर की पेशकश का क्या अर्थ है? इसे त्रासदी में क्रूर अमानवीय व्यवहार नहीं तो और क्या कहें? ऐसे संकट में श्रेय लेने की इस राजनीति को आप क्या नाम देंगे? अगर केजरीवाल मदद करना चाहते हैं तो वे वहां तक भिजवाने की व्यवस्था भी स्वयं करे। रेलवे से बात करें, कुछ वैगन भाड़ा पर लें और पानी भिजवाएं। केन्द्र सरकार को जितना करना है कर रही है। जिन राज्य सरकारों को करना होगा वो भी करेंगी। केजरीवाल कुछ नहीं करेंगे, क्योंकि उनके पास बहाना है कि हमने तो प्रतिदिन 10 लाख लीटर की पेशकश की लेकिन केन्द्र ने उसे ले जाने में सहयोग ही नहीं किया। बस, उनको इतने से ही मतलब है और ये उन्होंने कर दिया। वे ये भी नहीं बताएंगे कि आप दो महीने प्रतिदिन 10 लाख लीटर पानी लाएंगे कहां से? दिल्ली के पास तो स्वयं अपना पानी नहीं है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश से इसे पानी मिलता है।

केजरीवाल का यही चरित्र है और वैसे किसी विवेकशील व्यक्ति को अंदर से यह व्यवहार हिला देता है जिसके अंदर संवेदना, करुणा और मनुष्यता है। वो जानते हैं कि ऐसी पेशकश यदि उन्होंने कर दी और उसे सार्वजनिक कर दिया तो मीडिया इसे हाथों-हाथ लेगी और उसका प्रचार अपने आप हो जाएगा। यही हुआ है। हम मोदी या भाजपा के जितने विरोधी हों, लेकिन रेलवे से पानी भेजने के निर्णय का केन्द्र सरकार ने बिल्कुल प्रचार नहीं किया। वैगन तैयार हुए तब तक हमें पता नहीं चाला। जब रेल चल निकली तब मीडिया को पता चला और उसकी कवरेज हुई। उसमें भी कोई नहीं कह रहा है कि हमने इतना बड़ा काम कर दिया। कारण, सबको पता है कि मराठवाड़ा के तीन जिलों में पानी का जो संकट है उसमें पांच लाख लीटर कुछ है ही नहीं। अगर प्रति व्यक्ति 10 लीटर पानी का खर्च भी मान लें जिसमें पीना, नहाना, शौच जाना, कपड़े साफ करना सब शामिल कर लिया जाए तो यह एक दिन में सिर्फ 50 हजार व्यक्ति की आवश्यकता की पूर्ति कर पाएगा। इसलिए प्रचार और श्रेय का कोई कारण नहीं होना चाहिए। वैसे भी संकट में आप राहत की व्यवस्था करते हैं तो यह आपकी जिम्मेवारी है इसमें प्रचार कैसा!

केजरीवाल का तरीका इसके विपरीत है। जितना वो करते हैं उससे ज्यादा प्रचार करते हैं। उस प्रचार में उनका संदेश ऐसा होता है मानो भारत की धरती पर वे जो कर रहे हैं या करना या करना चाहते हैं वो किसी ने न किया न सोचा। जो नहीं करते उसके लिए केन्द्र सरकार को जिम्मेवार ठहराते हैं। इस मामले में भी वे आने वाले समय में यही करेंगे। उनके तरीके का विरोध करने वाले कोई पुराने साथी उनके साथ आज नहीं हैं। उनको या तो मजबूर कर दिया गया कि वो उनको छोड़कर चले जाएं या फिर उनको हटा दो। आज केवल उनकी स्तुतिगान करने वाले उनके साथ हैं। यकीन मानिए, उनके दिमाग में चल रहा होगा कि पानी की पेशकश को कैसे प्रचारित कर अधिकतम राजनीतिक लाभ उठाया जाए। उनका तरीका देखिए। उनकी सम विषम या औड इवेन योजना को लीजिए। सामान्य सी बात है। लोगों को 15 दिनों तक सम तारीख के दिन सम नंबर तथा विषम तारीख के दिन विषम नंबर की गाड़ी सड़क पर उतारनी है। हालांकि इसमें कुछ छूट हैं। इसमें हम यहां विस्तार से नहीं जाएंगे। लेकिन इसमें ऐसा क्या है कि इसे इतना प्रचार दिया जाए और एक बड़ा क्रांतिकारी कदम साबित किया जाए? दिल्ली की सड़कें महंगे विज्ञापन पट्टिकाओं, चमचमाते इश्तहारों से सज गईं हैं। रेडियो पर मिनट दर मिनट केजरीवाल जी की आवाव आपको सुनाई दे रही है। चूंकि केंद्र सरकार पर्यावरण विरोधी होने की छवि नहीं बनाना चाहती, इसलिए वह चुपचाप सहयोग कर रही है। पुलिस उन लोगों का चालान काटेगी जो इसका पालन नही करेंगे। लोग चालान के डर से गाड़ी नहीं निकालेंगे। किंतु इसमें सरकार को अपनी ओर से कुछ करना नहीं है। पिछली बार स्कूल बंद कर दिए गए। लेकिन प्रचार ऐसा है मानो दुनिया में एक ऐसा नेता पैदा हो गया है जिसने इतना बड़ा साहसिक कदम उठा लिया।

दुनिया में कई देशों ने ऐसे प्रयोग किए और उसको सफलताएं नहीं मिलीं। किंतु केजरीवाल को इससे क्या लेना-देना। उनको तो बस श्रेय और प्रचार चाहिए। उनकी काबिलियत है कि बिल्कुल निरर्थक और ‘न हिंग लगे न फिटकिरी’ जैसे कार्यक्रम को भी वे इस तरह प्रचारित कर लेते हैं कि उनके समर्थक उनको राजनीति का सबसे बड़ा हीरो मान लेते हैं। यही उनकी राजनीतिक सफलता का राज है। उनके हर कदम राजनीति के अनुसार उठते हैं। उनके हर शब्द केवल राजनीति को ध्यान में रखकर बोले जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। एक व्यक्ति जो भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से निकला, जिसमें देश के बड़े वर्ग ने महान देशभक्त का अक्स देखा वह इस तरह अपनी संकुचित राजनीति के मद्दे नजर अपने सम्पूर्ण बुद्धिकौशल का उपयोग करे तो इसे त्रासदी ही कहा जाएगा। काश, केजरीवाल को उनसे की गई अपेक्षाएं और उसके अनुरूप अपने महान और कठिन दायित्व का बोध होता।