भारत से लूटा गया दुनिया का अद्वितीय व अकल्पनीय हीरा एक बार फिर वैध मालिकाना हक के परिप्रेक्ष्य में चर्चा में है। दरअसल, ब्रिटेन के संग्रहालय से इसके वापसी की मांग को लेकर एक जनहित याचिका ‘ऑल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सोशल जस्टिस फोरम’ ने सर्वोच्च न्यायालय में लगाई हुई है। इस संबंध में न्यायालय ने केंद्र सरकार को अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहा था। इस संदर्भ में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की तरफ से कहा गया कि ‘कोहिनूर हीरा न तो चुराया गया है, न ही उसे अंग्रेज जबरन लूट कर ले गए हैं। उसे तो महाराजा दलीप सिंह ने भेंट किया था। इसलिए कोहिनूर पर भारत मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता है, क्योंकि ऐसा किया गया तो दूसरे देश भी हमसे ऐसी वस्तुएं मांग सकते हैं, जो उन्होंने हमें भेंट स्वरूप दी हैं और जो हमारे संग्रहालयों की शोभा व महिमा बढ़ा रही हैं।’ इस उत्तर से यह तो साफ है कि नरेंद्र मोदी सरकार की कोहिनूर हीरे की वापसी में कोई दिलचस्पी नहीं है। इस उत्तर से दूसरा बड़ा प्रश्न यह खड़ा हुआ है कि क्या वाकई कोहिनूर का प्रकरण स्वैच्छिक भेंट का है या एक पराजित राष्ट्र की अनमोल धरोहरों की लूट का? क्योंकि अबतक न केवल लोक-मान्यता से बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों से भी यह प्रमाणित होता रहा है कि हीरा ब्रितानी हुकूमत की औपनिवेशिक लूट का हिस्सा है। इसीलिए इस उत्तर के आने के बाद से ही राष्ट्रीय धरोहरों और सांस्कृतिक सरोकारों के हित सरंक्षण करनेवाली राजग सरकार की इस मुद्दे पर तीखी अलोचना हो रही है।

दरअसल, इस उत्तर से बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि यदि उत्तर के आधार पर शीर्ष न्यायालय ने याचिका निरस्त कर दी तो फिर इस बेशकीमती हीरे पर भारत का दावा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। इसीलिए सरकार के उत्तर से असंतुष्ट भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बेहद कड़े लहजे में महाधिवक्ता रंजीत कुमार द्वारा न्यायालय में रखी गई सलाह-मशवरे की आलोचना की है। बहरहाल, अब जरूरत है कि इस पहलू से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को खंगालकर न्यायालय के पटल पर रखा जाए। यह अलग बात है कि वर्तमान के अंतरराष्ट्रीय नियमों और कूटनीतिक कारणों की लाचारी के चलते कोहिनूर की वापसी असंभव हो? क्योंकि हमारे पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम 1972 के मुताबिक अवैध रूप से विदेश भेजी गई वस्तुओं पर ही दावेदारी जताई जा सकती है। इस आधार पर चोरी या तस्करी के जरिए राष्ट्रों में ले जाई गई कलाकृतियां एवं वस्तुएं वापिस भी आई हैं। इसी कानून के बूते आस्ट्रेलिया से दक्षिण भारत के एक मंदिर से चोरी की गई देव-प्रतिमा वापस भी आई है। इस कानून में यह प्रावधान भी है कि भारत की स्वतंत्रता से पहले जो चीजें बाहर चली गई हैं, उनका स्वदेश लाने का दावा करना संभव नहीं है। इस लिहाज से कोहिनूर की वापसी का दावा यहीं खारिज हो जाता है, क्योंकि कोहिनूर तो 1850 में भारत से ब्रिटेन ले जाया गया था।

मुर्गी के अंडे आकार के 106 कैरेट के इस हीरे पर भारत का बुनियादी दावा इसलिए बनता है, क्योंकि इस कॉर्बन के टुकड़े का खनन आंध्र-प्रदेश की गोलकुंडा खदान से किया गया था। कोहिनूर 1304 में एक भारतीय राजा के पास था। बाद में जब मुगल भारत आक्रांता के रूप में आए तो बाबर ने इसे हथिया लिया। लंबे समय तक यह मुगल शासकों के राजसिंहासन तख्त-ए-ताउस की शोभा बना रहा। 18वीं सदी में नादिरशाह ने इसे मुगलों से छीन लिया। इसके बाद 1747 में नादिरशाह की हत्या के बाद यह अफगानी शासक अहमदशाह दुर्रानी के कब्जे में आ गया। दुर्रानी की सत्ता के उत्तराधिकार के विवाद को लेकर गृह-क्लेश उत्पन्न हो गया। नतीजतन दुर्रानी की हत्या कर दी गई। दुर्रानी के शाहशुजा नामक पुत्र को हिरासत में ले लिया गया। शाहशुजा की पत्नी बुफा बेगम किसी तरह बचकर भाग निकलीं और लाहौर पहुंच गई। पंजाब के सिख महाराजा रणजीत सिंह को उसने आपबीती सुनाई और मदद मांगी। अफगानिस्तान के पेशावर और जरखेज जिले रणजीत सिंह ने पहले ही अपने अधीन कर लिए थे। लिहाजा रणजीत ने अफगानिस्तान पर धावा बोलकर वहां के शासक दोस्त मोहम्मद खां को शाहशुजा को मुक्त करने के लिए विवश कर दिया। यहां रणजीत सिंह मोहम्मद खां और शाहशुजा के बीच एक संधि हुई, जिसकी शर्तों के तहत 1839 में रणजीत सिंह के पास कोहिनूर आ गया। वे इसे ताबिज की तरह बाहों में पहना करते थे। रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद राज्य और इस कीमती हीरे को संभालने के जिम्मेवारी उनके 5 वर्षीय बालक दलीप सिंह के पास आ गई। दलीप सिंह के गद्दी पर बैठने के समय तात्कालीन गर्वनर सर हेनरी हार्डिंग ने दलीप को रणजीत सिंह का वास्तविक उत्तराधिकारी ठहरा दिया था। लेकिन अंग्रेजों की साम्राज्यवादी लिप्सा और डलहौजी की हड़प नीति के चलते हेनरी ने ही 13 दिसंबर, 1845 को दलीप सिंह के साथ युद्ध का ऐलान कर दिया। पंजाब राज्य के प्रधानमंत्री लालसिंह, प्रधान सेनापति तेजसिंह और जम्मू के राजा गुलाब सिंह के देशद्रोही बन जाने के कारण पंजाब दलीप सिंह के हाथ से चला गया। यही तीनों सिख साम्राज्य के प्रमुख स्तंभ थे।

अंग्रेज केवल पंजाब को अधीन करने से ही संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की विधवा और दलीप की माता महारानी झिन्दा कौर पर इल्जाम लगाया कि मुलतान का विद्रोह उनके अंदरूनी षड्यंत्र का परिणाम था। इस आरोप में उन्हें 15 मई, 1848 को हिरासत में लेकर पहले शेखपुरे के महल में कैद करके रखा गया और फिर बनारस भेज दिया गया। इसके बाद दलीप सिंह के राजकाज की देखरेख की जिम्मेबारी रेजीडेंट करी के हवाले कर दी गई और कोहिनूर यहीं से अंग्रेजों के हाथ आ गया। अंग्रेजों ने नाबालिग दलीप सिंह पर किस हद तक जुल्म ढाहे, इसकी बानगी इस बात से मिलती है कि करी ने दलीप सिंह की शादी तक नहीं होने दी। जबकि सरदार चतरसिंह की बेटी से दलीप की सगाई हो चुकी थी। किंतु रेजिडेंट करी ने चतरसिंह को पत्र लिखकर कहा, ‘बिना रेजीडेंट की रजामंदी के यह विवाह नहीं किया जा सकता है।’ यही नहीं चतरसिंह को अंग्रेज अधिकारियों ने इतना परेशान व अपमानित किया कि एक स्वाभिमानी व्यक्ति को अंततः अपने देश, धर्म और खालसा राज की रक्षा के लिए युद्ध तक करना पड़ा। इन हालातों में यह तो संभव ही नहीं है कि किसी प्रांत का पराजित महाराजा विजयी शासक को कोहिनूर जैसी दुर्लभ वस्तु को खुशी-खुशी भेंट करे दे। साफ है या तो हीरा 1851 में इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया को ईस्ट इंडिया कंपनी ने जबरन भेंट कराया अथवा लूटकर लेकर ब्रिटेन ले जाया गया। लंबे समय तक यह हीरा इस साम्राज्ञी के राजमुकूट की शोभा रहा।

कोहिनूर की विलक्षण्ता के चलते भारत के अलावा इस पर मालिकाना हक का दावा 1976 में पाकिस्तान, 2001 में अफगानिस्तान, ईरान और बांग्लादेश भी ठोकते रहे हैं। हालांकि ब्रिटिश सरकार 2013 में ही इस तरह की सभी मंगों को खारिज कर चुकी है। फिलहाल, कोहिनूर ब्रिटेन के शाही खजाने का हिस्सा है। इसे पर्यटकों को ललचाने के लिए लंदन के पुरातत्व संग्रहालय में रखा गया हैं। हर साल लाखों पर्यटक केवल इस अद्भुत हीरे के दर्शन के लिए इस संग्रहालय में आते हैं। यह हीरा ब्रितानी हुकूमत के लिए विदेशी मुद्रा कमाने का बढ़ा जरिया बना हुआ है। इसीलिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने 2013 में ही दो टूक शब्दों में कह दिया था कि यदि इस तरह की मांगों पर अमल किया जाने लग जाएगा तो लंदन का यह संग्रहालय ही खाली हो जाएगा। साफ है, इसके वापसी की कोशिशें भले ही की जाती रहें, अदालत जो भी फैसला दे अंतरराष्ट्रीय कानून और भारत का पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति, अधिनियम 1972 इसकी वापसी की बड़ी बाधाएं हैं। इसीलिए संस्कृति मंत्रालय ने कह दिया कि कोहिनूर भेंट स्वरूप  दिया गया था, लिहाजा वापसी संभव नहीं हैं। सरकार को इस झंझट से बचने का यह एक मात्र उपाय था, जिसे संस्कृति मंत्रालय ने बहाना बनाकर इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की है।