अब यह किंतु परंतु से परे एक तथ्य है कि गृहमंत्री के रूप में पी. चिदम्बरम ने इशरत जहां को 2009 में स्वच्छ चरित्र का प्रमाण पत्र स्वयं दिया था। न उसमें गृह सचिव की कोई भूमिका थी और न ही महाधिवक्ता की। भले चिदम्बरम जो दावा करें लेकिन फाइल सामने आने के बाद उनके पाक साफ होने का दावा ध्वस्त हो जाता है। क्या कारनामा है! आप उसी इशरत जहां को न्यायालय में सौंपे शपथ पत्र में लश्कर का फिदाइन आतंकवादी बताते हैं और एक महीना के अंदर ही उसे स्वयं पाक साफ होने का प्रमाण पत्र दे देते हैं।

“गुजरात उच्च न्यायालय में 6 अगस्त 2009 को जो शपथ पत्र दाखिल हुआ उसमें  स्पष्ट रूप से इशरत जहां और उसके साथियों को लश्कर-ए-तैयबा का आतंकवादी कहा गया था। बाद में इस शपथपत्र को वापस ले लिया गया एवं 30 सितंबर 2009 को दूसरे शपथपत्र में कहा गया कि इशरत जहां और उसके साथियों के आतंकवादी होने के कोई ठोस सुबूत नहीं हैं।”
 

तत्कालीन गृह सचिव जी. के. पिल्लई ने कहा था कि दूसरे शपथ पत्र का फैसला राजनीतिक स्तर पर लिया गया होगा जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं था। हालांकि यह तो संभव नहीं है कि जो फैसला हो रहा हो उसकी जानकारी गृहसचिव को हो ही नहीं, किंतु यह उनके स्तर पर नहीं हुआ यह फाइल से स्पष्ट है। चिदम्बरम ने पिल्लई के बयान के बाद यह सफाई दी थी कि उन्होंने तो केवल उसमें कुछ संपादकीय परिवर्तन किए थे। यानी यहां कॉमा होगा, वहां पूर्ण विराम होगा, इस शब्द की जगह फलां शब्द बेहतर होगा आदि आदि। उनकी यह सफाई सफेद झूठ थी। उन्होंने स्वयं दूसरा शपथपत्र भी बनवाया एवं हस्ताक्षर किए। तो चिदम्बरम के इस अपराध की सजा क्या है?

अपराध इसलिए कि अमेरिका में गिरफ्तार एवं हमारे पास लश्कर की आंतरिक जानकारी देने वाले एकमात्र गवाह डेविल कोलमेन हेडली ने अपनी गवाही में यह बता दिया कि इशरत जहां लश्कर की फिदाइन आतंकवादी दस्ते का हिस्सा थी। निश्चय ही यह जानकारी गृहमंत्री होने के नाते पी. चिदम्बरम के पास थी। ऐसा न होने का कोई कारण नहीं था। खुफिया ब्यूरो या आईबी के इनपुट्स इस बारे में थे। उस इनपुट्स के आधार पर गुजरात पुलिस ने कार्रवाई की तथा 15 जून 2004 को अहमदाबाद में इशरत की तीन अन्य साथियों के साथ गोली लगे शव पाए गए। गुजरात पुलिस का दावा है कि उनके साथ मुठभेड़ हुआ जिसमें वे मारे गए। आईबी भी यही मानती है। इसके विपरीत विरोधियों का कहना है कि उन्हें पकड़कर गुजरात पुलिस ने गोली मार दिया और उसे मुठभेड़ बता दिया। इससे संबंधित मामला न्यायालय में चल रहा है। इस पर इतना कुछ कहा जा चुका है कि यहां इसमें विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं। यहां मूल विषय यह है कि इशरत जहां का आतंकवाद से रिश्ता था या नहीं? अभी तक जितने मान्य प्रमाण हमारे सामने हैं उसके अनुसार उसके सहित अन्य तीनों साथियों का चरित्र संदेह के घेरे में आता है और उन्हें आतंकवादी मानना ही पड़ता है। तब भी आईबी की रिपोर्ट यही थी। जब एनआईए के सदस्य अमेरिका गए एवं हेडली से पूछताछ की उसमें भी यही सामने आया और अब उसकी मुंबई के विशेष न्यायालय में दी गई गवाही में भी।

समस्या यह है कि जिस फाइल में उन्हें पाक साफ साबित किया गया उसके 28 पन्नें गायब हैं। उनमें हो सकता है अन्य विभागों के पत्र और उसके जवाब हो। उनका विश्लेषण तथा निष्कर्ष हो। प्रश्न है कि वे पन्ने गायब कैसे हो गए? इसका सरल उत्तर तो यही हो सकता है कि जब इस पर देश में हंगामा मचा, दूसरे तथ्य आने लगे तो फिर उस फाइल के उन हिस्सों को गायब कर दिया गया जिनसे इसकी विस्तृत जानकारी मिले तथा इशरत को निर्दोष होने का प्रमाण पत्र देने वाले कठघरे में खड़ा न हो सकें। उन 28 पन्नों का गायब होना भी अपराध है। यह तो वैसे ही है जैसे कोई अपराधी अपना अपराध छिपाने के लिए सबूत मिटाता है। किंतु अपराध तो अपराध है। आपने सबूत मिटाया तो हो सकता है आप कानून के शिकंजे से संदेह का लाभ लेकर बच जाएं। किंतु स्वयं अपनी नजर से और जनता की नजर से कैसे बच सकते हैं। गृह राज्य मंत्री किरण रिजजू ने कहा है कि उनको कोई सजा तो नहीं दी जा सकती लेकिन उन्होंने बहुत गलत किया। बहुत गलत छोटा शब्द है। दरअसल, पी. चिदम्बरम ने देश के साथ अपराध किया। गृहमंत्री के नाते जिस व्यक्ति पर आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेवारी है वह राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को निचा दिखाने के लिए किसी आतंकवादी को निर्दोष साबित करने लगे औ इसके लिए अपने पद का दुरूपयोग करे तो इससे बड़ा अपराध क्या हो सकता है?

वह पूरा ऑपरेशन आंतरिक सुरक्षा का औपरेशन था, राज्य की सामान्य कानून व्यवस्था का नहीं। यदि राज्य की सामान्य कानून व्यवस्था का ऑपरेशन होता तो उसमें केन्द्रीय खुफिया ब्यूरो की कोई भूमिका नहीं होती। केन्द्रीय खुफिया ब्यूरो की भूमिका का अर्थ ही है कि यह आंतरिक सुरक्षा का ऑपरेशन था। बाद में यदि केन्द्रीय जांच ब्यूरो या सीबीआई उसमें आई तो इसी कारण। आतंरिक सुरक्षा के मामले से किस तरह निपटा जाता है इसकी जानकारी पी. चिदम्बरम को अवश्य होगी। वे गृहमंत्री तो रहे ही इसके पहले राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में आंतरिक सुरक्षा का प्रभार भी उनके ऊपर था। तो चिदम्बरम ने एक पूरे ऑपरेशन को मटियामेट करने का काम किया गया। पिल्लई ने अपने बयान में कहा था कि यह आईबी का बहुत सफल ऑपरेशन था। आईबी ने अपने व्यक्ति को उन आतंकवादियों के गैंग में शामिल कराया जिससे पूरी सूचना मिलती रही। आतंकवादी उसे अपना आदमी मानते रहे और हम उनकी एक-एक गतिविधि पर नजर रखे रहे। यह सामान्य काम नहीं था। कल्पना करिए, जो व्यक्ति शामिल हुआ होगा उसने कितना बड़ा जोखिम उठाया होगा। उसको शामिल कराने में कितनी मेहनत की गई होगी। उस पर नजर रखने के लिए अधिकारी लगे होंगे। खैर, उनसे प्राप्त सूचनाओं से साफ हो गया था कि उनका एक निशाना एक राजनीतिक नेता थे, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी। इसकी पूरी जानकारी गृहमंत्रालय के पास थी। फिर क्यों ऐसा किया गया इसका जवाब तो देश चाहेगा।

जरा सोचिए, जो गृह सचिव की नजर में आईबी का सफल ऑपरेशन था उसे गृहमंत्री यानी पी. चिदम्बरम ने राजनीतिक हस्तक्षेप से निर्दोषों की हत्या के अपराध में बदल दिया और सीबीआई को जांच सौंपकर पूरी आईबी और गुजरात सरकार को बदनाम करने का कुकृत्य किया। वास्तव में दूसरे शपथपत्र के बाद ही मामले को सीबीआई को जांच के लिए सौंपने का आधार बना। अगर पहले शपथपत्र पर सरकार कायम रहती तो फिर यह नौबत आती ही नहीं। इस तरह दूसरा शपथपत्र एक षडयंत्र का हिस्सा लगता है जिसमें गुजरात सरकार और उसके अधिकारियों को फंसाने की तैयारी थी। क्या शर्मनाक स्थिति थी! याद करिए उस समय देश की दो प्रमुख संस्थाएं सीबीआई और आइबी आमने-सामने आ गई थीं। आतंकवाद के खिलाफ काम करने की जगह ये दोनों संस्था आपस के संघर्ष में ही उलझ गए थे। दोनों में ठन गई थी। आईबी राजेन्द्र कुमार सहित अपने तीन अधिकारियों के साथ थी तो सीबीआई उनके खिलाफ। सीबीआई इसलिए खिलाफ थी कि सरकार ने उसे मामला सौंपने के साथ उसकी दिशा भी दे दी थी। सीबीआई ने इस ऑपरेशन में लगे आई बी के अधिकारियों राजेन्द्र कुमार के साथ पी. मित्तल, एमके सिन्हा और राजीव वानखेड़े को भी आरोपी बनाया। कुमार पर धारा 302 (हत्या), आपराधिक साजिश 120(बी), 364 (हत्या के लिए अपहरण), 346, 364, 368 (गलत इरादे से बंदी बनाना) और आर्म्स एक्ट की धारा 29 लगाई गई। अपनी सेवानिवृत्ति के बाद राजेन्द्र कुमार ने कहा है कि उन पर राजनीतिक दबाव आया था और उन्हें पद का लोभ भी दिया गया था।

क्या चिदम्बरम के नेतृत्व में गृह मंत्रालय इस तरह से काम कर रहा था? जो देश आतंकवाद के निशाने पर हो उसके आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेवार मंत्रालय इस तरह आतंकवाद से मुकाबले की जगह उसमें कार्रवाई करने वालों को फंसाने का षडयंत्र करे तो उसकी सुरक्षा की क्या दशा होगी इसकी कल्पना करिए। जो मानवाधिकारवादी छाती पीट रहे थे वे अमेरिका से यह पूछने नहीं गए कि जब पाकिस्तान के ऐबटाबाद में ऑपरेशन के बाद उसके पास ओसामा बिन लादेन को पकड़ने का विकल्प था तो उसने उसे मार क्यों दिया? मारा भी तो उसे इज्जत से दफनाया क्यों नहीं? आतंकवादियों के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए। अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के हमले का जिस तरह बदला लिया वह एक राष्ट्र की संकल्प शक्ति को दर्शाता है। देश की एकजुटता प्रमणित करता है। वहां पक्ष-विपक्ष के बीच इस पर कोई मतभेद नहीं। हमारे यहां तो पक्ष यानी us समय की सरकार ही आतंकवादियों के पक्ष में खड़ी हो गई थी। इसलिए आज यह पूछना ही पड़ेगा कि चिदम्बरम और विस्तारित करें तो पूरी संप्रग सरकार के अपराधों की सजा क्या हो?