Source: न्यूज़ भारती हिंदी30 Apr 2016 15:16:35

 

हिमाचल प्रदेश के धरमशाला का मेकलोडगंज परिसर याने ‘मिनी ल्हासा’ कहलाता हैं. यहां तिब्बत की प्रतिकृति बनाने का प्रयास किया गया हैं. सन १९५९ में चीन से निर्वासित दलाई लामा जी को भारत में प्रश्रय देने के बाद उनको तथा उनके साथ के तिब्बती निर्वासितों को यही बसाया गया था.

इस मेकलोडगंज के ‘नोरबू हाउस’ में इस समय एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन चल रहा हैं, जिस में चीन के सारे विरोधी हिस्सा ले रहे हैं. चीन में लोकतंत्र की बहाली को लेकर यह सम्मेलन कल, १ मई तक चलेगा. इसे दलाई लामा भी संबोधित करेंगे.

कार्यक्रम की संयोजक, अमरीका में रजिस्टर्ड एक संस्था हैं, जो चीन में मानवाधिकारों को स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं. लेकिन भारत सरकार की सम्मति के बिना यह संमेलन असंभव था. इस संमेलन में तिब्बती विस्थापितों के अलावा मंगोलियन, चीन से निर्वासित ख्रिश्चन, तथा, हांगकांग, मकाऊ और ताइवान के प्रतिनिधि भी शामिल हैं.

चीन सरकार का जिन पर अत्यधिक खौफ हैं, ऐसे डॉ. यांग जियानली के संयोजन में ही यह सम्मेलन हो रहा हैं.

ऐसा कहा जा रहा हैं की डोलकुन इसा का वीसा रद्द होने के बावजूद भी उइगर समुदाय के कुछ नेता इस सम्मेलन में पहुचे हैं. इस सारे आयोजन में मीडिया को प्रवेश नहीं हैं.

पिछले दिनों जब उइगर नेता डोलकुन इसा का, चीन की असंतुष्ट नेत्री लू जिंगुह का तथा सामाजिक कार्यकर्त्ता रा वांग का वीसा भारत सरकार ने रद्द किया, तब भाजपा सरकार पर और विशेषतः प्रधानमंत्री मोदी जी पर फब्तियां कसी गयी. छप्पन इंच सीने का मजाक उड़ाया गया था.

लेकिन अब क्या कहा जाएगा..? चीन के प्रखर विरोध के बावजूद दुनिया भर के लगभग पचास, धुर चीन विरोधी, नेता इकठ्ठे होते हैं, चीन में लोकतंत्र की बहाली पर मंथन करते हैं, और यह सब भारत सरकार की सहमती से होता हैं...!

चीन ने तिब्बत हथियाने के बाद, पहली बार, भारत में चीनी विरोधियों का ऐसा प्रभावी सम्मेलन हो रहा हैं..!

इसे कहते हैं, स्वयंभू देश की स्वतंत्र विदेश नीति..!!