जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लगे 'भारत विरोधी' नारों को देश भूल भी नहीं पाया था कि श्रीनगर स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) में भारत विरोधी छात्रों के तुष्टीकरण और भारत के समर्थन में तिरंगा फहरा रहे छात्रों की पिटाई का मामला सामने आ गया है। पहले हैदराबाद, फिर जेएनयू, जाधवपुर विश्वविद्यालय और अब श्रीनगर के एनआईटी से 'भारत विरोध' की आवाजें आ रही हैं। देश समझ नहीं पा रहा है कि आखिर हमारे शिक्षा संस्थानों में चल क्या रहा है? देश के प्रमुख शिक्षा संस्थानों में भारत विरोध के यह पाठ कब से पढ़ाए जा रहे थे? पूर्ववर्ती सरकारें क्यों आँख मूँदकर बैठी हुई थीं? सवाल शिक्षकों से भी है कि उनकी भूमिका क्या है? क्या शिक्षक भी इस कुपाठ में शामिल हैं? यकीनन इन घटनाओं के सामने आने से देश चिंतत है कि आखिर हमारे शिक्षा संस्थानों में किस तरह का नेतृत्व तैयार हो रहा है? केन्द्र और राज्य सरकारों को तत्काल अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भारत विरोध की इन आवाजों से निपटने के पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। शिक्षकों को भी अपनी भूमिका के साथ न्याय करना चाहिए और उन्हें आगे आकर युवा पीढ़ी को देशप्रेम का पाठ पढ़ाना चाहिए।

श्रीनगर के राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान का विवाद छात्रों पर महज बेरहमी से लाठीचार्ज का मामला नहीं है। इस विवाद की जड़ में भी 'भारत विरोध' की मानसिकता है। यह विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब टी-20 विश्वकप के एक मुकाबले में वेस्टइंडीज के हाथों भारतीय दल की हार होती है। इसके बाद संस्थान के कुछ छात्रों ने जश्न मनाया और पाकिस्तान का झंडा लहराया। यह जश्न वेस्टइंडीज की जीत पर नहीं था, यदि ऐसा होता तब कोई समस्या भी नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन, यह जश्न भारत की हार पर था। जम्मू-कश्मीर मूल के छात्रों के मन में अपने ही देश के प्रति भरी गई जहरीली शिक्षा का प्रकटीकरण था। संस्थान के दूसरे छात्रों ने भारत के समर्थन में नारे लगाकर और तिरंगा फहराकर जब इस प्रदर्शन/जश्न का विरोध किया तब वहाँ तनाव फैल गया। भारत की पराजय पर खुशी जाहिर करने वाले दूसरे गुट की सहिष्णुता यहाँ खत्म हो गई।

सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि पाकिस्तान का झंडा फहराने वाले छात्रों के दबाव एनआईटी प्रशासन ने तिरंगा फहराने वाले छात्रों को धमकाने की कोशिश की है। पीडि़त छात्रों का आरोप है कि प्रशासन की सहमति से ही पुलिस ने उनके ऊपर लाठीचार्ज किया है। यह कितना उचित है कि भारत का विरोध करने वाले छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई की नहीं गई बल्कि भारत का समर्थन करने वालों की पिटाई करा दी गई? जम्मू-कश्मीर सरकार और केन्द्र सरकार को इस मामले में गंभीरता से प्रशासन की भूमिका और भारत विरोधी गतिविधि में शामिल छात्रों की जाँच करानी चाहिए। भारतीय जनता पार्टी के सामने अधिक चुनौती है, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में वह पीडीपी के साथ सरकार में शामिल है। उसके सरकार में रहते हुए भी छात्रों पर पुलिस ने बेरहमी से लाठीचार्ज कैसे किया? नागफनी-से कंटीले इस प्रश्न से विपक्षी दल भी भाजपा को लहूलुहान करने का प्रयास कर ही रहे हैं। हालांकि सोचने वाली बात यह भी है कि ये विपक्षी दल एवं बुद्धिजीवी भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल छात्रों और उन्हें भारत विरोधी पाठ पढ़ाने वाले लोगों से सवाल क्यों नहीं पूछते हैं?

बहरहाल, शिक्षा संस्थानों के ये घटनाक्रम किसी भी सूरत में देशहित में नहीं हैं। इन घटनाक्रमों में शामिल छात्रों के पीछे राष्ट्र विरोधी ताकतें हैं। इस बात का अनुभव जेएनयू प्रकरण में भी हो चुका है। कैसे बाहरी छात्र जेएनयू कैम्पस में आकर 'भारत के टुकड़े' करने के नारे लगाकर चले गए? उनके आने और जाने का प्रबंध किसने किया? उस कार्यक्रम के मुख्य आयोजक और देशद्रोह के आरोपी उमर खालिद के संबंध में भी यह बात सामने आई थी कि उसका संबंध अलगाववादी संगठनों से है। इसलिए इस आशंका से फौरी तौर पर इनकार नहीं किया जा सकता है कि शिक्षा परिसरों में हो रही भारत विरोधी गतिविधियों के पीछे सुनियोजित षड्यंत्र है। इसलिए सरकार को शिक्षा परिसरों से आ रहीं 'भारत विरोधी आवाजों' पर कान धरने की आवश्यकता है। इसके साथ ही छात्रों, शिक्षकों और सरकारों को मिलकर यह तय करना होगा कि शिक्षा संस्थान विद्या अध्ययन के ही केन्द्र बनें, भारत विरोधी राजनीति के अड्डे नहीं। देश की भावी पीढ़ी शिक्षा संस्थानों से देश प्रेम, देश के प्रति कर्तव्य के पाठ पढ़कर निकले, न कि देश विरोधी पाठ।