इन दिनों अगस्ता वेस्टलैण्ड हेलीकाप्टर में रिश्वतखोरी को लेकर कुछ ऐसा ही माहौल व्याप्त है, जैसा कि राजीव गांधी के दौर में बोफोर्स तोपों को लेकर था। यह मामला 07 अप्रैल को तब गर्माया, जब इटली के मिलान की अपीलीय अदालत ने उपरोक्त हेलीकाप्टरों की बिक्री में गलत एकाउटिंग और कमीशनखोरी को लेकर फिनमेकनिका कम्पनी के पूर्व प्रमुख गुसेप ओरसी को साढ़े चार साल और फिनमैकनिका की अनुशांगी कम्पनी अगस्ता वेस्टलैण्ड के पूर्व सी.ई.ओ. बुर्नो स्पागनोलीनी को चार साल की सजा सुनाई। उपरोक्त अदालत के 225 पेज के फैसले में यह विवरण भी दर्ज है कि उपरोक्त सौदों को निर्णायक भूमिका तक ले जाने में सोनिया गांधी की अहम भूमिका रही और यह सौदा बिना कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के संभव नहीं था। 2008 के एक पत्र का हवाला देते हुए कहा गया है कि मिसेज गांधी ही इस डील के पीछे मेन ड्राइविंग फोर्स थीं। उपरोक्त अदालत ने अपने फैसले में लिखा है कि सौदे में 2007 तक वायुसेना प्रमुख एस.पी. त्यागी और उनके संबंधियों को करीब तीन लाख यूरो दिए गए। अदालत के फैसले में स्पष्ट रूप से ए.पी. अर्थात सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल का नाम आया है कि उन्हें 17-18 मिलियन डॉलर की राशि इस सौदे के लिए दी गई। कम्पनी के प्रमुख जिसेप ओरसी ने इटली की अदालत में दिए गए बयान में बताया कि उसने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को 125 करोड़ रुपये की रिश्वत दी थी। वैसे 3600 करोड़ रुपये के इस सौदे में कुल लेन-देन 375 करोड़ का बताया जाता है, जिसमें 45 करोड़ रुपये मीडिया को देने की बात भी है। जिसमें लाभार्थियों में राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं।

इतना ही नहीं और भी कई बातें उल्लेखनीय हैं। पहली बड़ी बात यह कि उपरोक्त हेलीकाप्टर का फील्ड ट्रायल भारत में न कर ब्रिटेन में क्यों किया गया? आरोप है कि ये हेलीकाप्टर तब विकास की अवस्था में थे और किन्हीं दूसरे हेलीकाप्टरों का फील्ड ट्रायल किया गया। यद्यपि भारत में फील्ड ट्रायल न किए जाने को लेकर तात्कालीन रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी ने आपत्ति की थी, पर पता नहीं किन दबावों के चलते वह अपनी आपत्ति पर कायम नहीं रह पाए? कैबिन की ऊॅचाई 1-8 मीटर कर दी गई, ताकि अन्य कम्पनियॉ दौड़ से बाहर हो जाएं और अकेली वेस्टलैण्ड अगस्ता कम्पनी ही रह सके। निविदा की शर्तो में पहले दो इंजिन वाले हेलीकाप्टर लिए जाने थे, पर अगस्ता वेस्टलैण्ड का हेलीकाप्टर तीन इंजिन को होने के चलते, निविदा की शर्तों में तीन इंजिन वाला कर दिया गया। उड़ान की ऊॅचाई 6000 फीट से 4500 फीट किए जाने का मामला अपनी जगह पर है। यद्यपि 12 फरवरी 2013 को फिनमैकनिका कम्पनी के प्रमुख ओरसी को गिरफ्तार करने पर पूरी सच्चाई सामने आ गई थी, फिर भी सौदा रद्द करने में सालों का समय लगा दिया। ऐसा भी बताया जाता है कि सी.बी.आई. 12 मार्च 2013 को एफ.आई.आर. दर्ज किए जाने पर कोई जांच नहीं की गई और ई.डी. को एफ.आई.आर. की कॉपी दिसम्बर महीने में दी गई। ई.डी. ने इसके बाद भी कोई जांच नहीं की। सवाल यही है कि एकतरफ तो तात्कालीन रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी सी.बी.आई. को जांच का आदेश देते हैं, लेकिन सालोंसाल तक कोई जांच नहीं होती। यहां तक कि इटली की पुलिस को भी जांच में भारत सरकार द्वारा कोई सहयोग नहीं दिया गया। कांग्रेस नेता गुलाब नबी आजाद ने बड़ी ठसक के साथ राज्यसभा में कहा कि हमने कम्पनी को ब्लैक लिस्टेड कर दिया, जबकि हकीकत यह है कि यह कार्य एन.डी.ए. सरकार ने 03 जुलाई 2014 को किया। उपरोक्त सौदा भी तब निरस्त किया गया, जब यह सुनिश्चित हो गया कि यू.पी.ए. सरकार की सत्ता में वापिसी किसी भी कीमत पर होने वाली नहीं। जबकि फरवरी-2003 में जैसे ही सच्चाई सामने आई थी, सौदा रद्द कर देना चाहिए था। इसका नतीजा तो यह निकाला जा सकता है कि यदि यू.पी.ए. सरकार की हार निश्चित न होती तो यह सौदा शायद ही रद्द होता। कैग ने भी उपरोक्त सौदे में 900 करोड़ रुपये की धांधली के आरोप लगाए हैं। रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर का कहना है कि 793 करोड़ के सौदे को 4877.5 करोड़ का कर दिया गया।

तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि रक्षामंत्री एंटोनी ने इस सौदे को रद्द करते समय स्पष्ट रूप से कहा था कि इस सौदे में रिश्वत का लेन-देन हुआ है। एरोमीट्रिक प्रमुख गौतम खेतान ने रुपये लेने की बात स्वीकार कर ली है, यह बात अलग है कि इसे वह रिश्वत लेना नहीं मानते। लाख टके की बात यह कि यदि इटली में रिश्वत देना प्रमाणित है और देने वालों को जेल हो रही है, तो यह भी प्रमाणित है कि रिश्वत ली गई। अब सवाल यह कि रिश्वत किसने लिया? निश्चित रूप से कोई व्यक्ति या कम्पनी उसी को रिश्वत देगी जो उनका भला-बुरा करने की हैसियत में हो। अलबत्ता बिचौलियों की बात अलग है। स्पष्ट है कि ऐसी हैसियत में उस वक्त सिर्फ चार-पांच लोग ही थे। सर्वप्रथम कांग्रेसाध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी, जिनके पास यू.पी.ए. शासन में सत्ता का रिमोट था। दूसरे राहुल गांधी जो कांग्रेस पार्टी की परम्परा के अनुसार संविधातोत्तर सत्ता केन्द्र कहे जा सकते हैं। तीसरे व्यक्ति थे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, चौथे व्यक्ति थे रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी और पॉचवे वायुसेन प्रमुख एस.पी. त्यागी। निस्संदेह इस सौदे को लेकर रक्षामंत्री होते हुए भी एंटोनी पर रिश्वत लेने का कोई आरोप नहीं है। इसी तरह से डॉ. मनमोहन सिंह पर भी ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया जा सकता। लेकिन दोनों पर दबाव में कार्य करने का आरोप तो प्रथम दृष्टया दिखता है। इसलिए इन्होंने रिश्वत भले न लिया हो, पर इन्हें इस प्रकरण में पूरी तरह दोष मुक्त भी नहीं कहा जा सकता। अब वायुसेना प्रमुख एस.पी. त्यागी और अहमद पटेल पर तो इटली के फैसले में स्पष्ट रूप से रिश्वत लेने की बात कही गई है। निस्संदेह जब अहमद पटेल की बात होती है तो इसका आशय यह कि उन्होंने सोनिया गांधी की ओर से ही ऐसा किया होगा। ऐसी स्थिति में श्रीमती सोनिया गांधी पर तो प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित दिखता है।

विडम्बना यह कि कांग्रेस पार्टी बहुत लम्बे समय से राजपाट में रहने के चलते उसके दुरुपयोग की सिर्फ आदी ही नहीं हो गई है, ऐसा करना वह अपना विशेषाधिकार भी मानती है। लोगों की जेहन में अब भी होगा कि 1977 में जनता पार्टी के सत्ता में आने पर आपातकाल के अत्याचारों और भ्रष्टाचार को लेकर जब शाह कमीशन जांच कर रहा था तो कैसे उसे लेकर हंगामा किया जाता रहा और उसे बदले की कार्यवाही बताया गया। नेशनल हेराल्ड की ए.जे.एल. कम्पनी को सोनिया गांधी और राहुल गांधी द्वारा अपनी हैसियत का दुरुपयोग कर जब यंग इंडियन कम्पनी बनाकर उसका अधिग्रहण किया गया और सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा न्यायालय में याचिका प्रस्तुत करने पर उन्हें कूटरचना और ठगी जैसे गंभीर आरोपों में अभियुक्त बनाया गया। तब भी श्रीमती सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी द्वारा उसे राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया गया। यहां तक कि इसके लिए संसद तक को बाधित किया गया, जबकि इस प्रकरण में सरकार की दूर-दूर तक कोई भूमिका नहीं थी। अब इस मामले में भी कुछ ऐसा ही रंगत देने की कोशिश की जा रही है। आखिर में यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि क्या इस सौदेबाजी में सोनिया गांधी का नाम आने और जांच प्रक्रिया में तेजी के चलते ही उन्हें ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ मार्च निकालने की जरूरत पड़ गई। यह भी उल्लेखनीय है कि उस मार्च के वक्त तख्तियों में सोनिया, राहुल के साथ राबर्ट वाड्रा का नाम भी था। यानी कि मनमोहन सिंह का भी कहीं नाम नहीं था। ऐसी स्थिति में लोगों की जेहन में यह सवाल उभरना स्वाभाविक है कि यह मार्च लोकतंत्र बचाने के लिए न होकर खानदान बचाने के लिए था और इस तरह से क्या यह सवाल नहीं उठता कि जिस कांग्रेस पार्टी में लोकतंत्र नाम-मात्र का ही नहीं? वहां लोकतंत्र की दुहाई एक मजाक ही कही जा सकती है। अब कांग्रेस पार्टी कह रही है कि उपरोक्त प्रकरण की जांच सर्वोच्च न्यायालय के अन्तर्गत करायी जाए।

अभी तक तो कांग्रेस पार्टी सरकार पर दोषारोपण कर रही थी कि उसने दो साल में क्या किया? और अब जब जांच तेजी से बढ़ रही है और घेरा नजदीक आता जा रहा है तो सर्वोच्च न्यायालय के अन्तर्गत जांच कराने की बात कहकर जांच को भटकाने का प्रयास किया जा रहा है। सोनिया गांधी से ऐसी अपेक्षा तो की ही नहीं जा सकती कि ऐसे गंभीर आरोप में वह हवालाकाण्ड में नाम आने पर लालकृष्ण आडवाणी की तरह लोकसभा से इस्तीफा दे देती। पर बेहतर होता कि वह इस संबंध में उठ रहे सवालों का जवाब देती और इस संबंध में किसी भी जांच का स्वागत ही नहीं करती वरन इसमें सहयोग भी करती। पर वह भयभीत न होने की बात कहकर और हंगामा खड़ा कर यह बताने का प्रयास कर रही हैं कि वह नियम-कानून और संविधान से ऊपर हैं और वह चाहे जो करें, किसी को उन पर उंगली उठाने का हक नहीं है। असली लोकतंत्र का तकाजा तो यही है कि सिर्फ आलोचना करने की ही नहीं, बल्कि सुनने की क्षमता भी होनी चाहिए। पर ‘‘राजा कोई गलती नहीं करता’’ की तर्ज पर खानदान के किसी सदस्य का नाम भर लेने से ही सिर पर आसमा उठा लिया जाता है। कुछ भी हो, औसत भारतीय को रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर की इस बात से आश्वस्त होना चाहिए कि इसका अंजाम बोफोर्स प्रकरण की तरह नहीं होगा और इस कृत्य के पीछे असली चेहरे शीघ्र ही सामने आएंगे।