जब भारत की राजधानी में हार्ट आफ एशिया सम्मेलन हो और उसमें पाकिस्तान का प्रतिनिधिमंडल हो तो संभावना होती है कि दोनों देशों के बीच मुलाकात और कुछ बातचीत हो। पाकिस्तान के विदेश सचिव एजाज अहमद चौधरी और भारत के विदेश सचिव जयशंकर मुलाकात हालांकि केवल संयोग नहीं हो सकता, लेकिन यह भी सच है कि अगर इस समय हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन नहीं होता तो दोनों के बीच द्विपक्षीय बातचीत नहीं होती। इससे यह तो साफ हो गया कि मतभेदों एवं सतह पर उभरनेवाले तनावों के बावजूद दोनों देश बातचीत करने पर सहमत हैं। संभव है इसके आगे भी हमें बातचीत देखने को मिले। किंतु इस बातचीत में पाकिस्तान के विदेश सचिव ने जो रवैया अपनाया उसके मद्दे नजर-नजर संबंध बेहतर या सामान्य होने की गुंजाइश नहीं दिखती है। अगर पाकिस्तान के लिए कश्मीर मूल मुद्दा है, उसके लिए भारत को बलूचिस्तान मामले में आरोपित करना प्राथमिकता है तो फिर बातचीत की गाड़ी आगे कैसे बढ़ सकती है। जो जानकारी बाहर आई उसके अनुसार पाकिस्तान के विदेश सचिव ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को सुरक्षा परिषद प्रस्ताव के तहत हल किया जाना चाहिए।

एक भारतीय के नाते विचार करें तो पाकिस्तान की यह कूटनीति भारत के साथ संबंधों को जहां है वहीं रखने या उससे पीछे ले जाने की दिखाई देगी। यह न उफा भावना के अनुरूप है न पिछले वर्ष विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पाकिस्तान यात्रा के दौरान तय हुई समग्र वार्ता के दौरान व्यक्त की गई भावनाओं के अनुकूल ही। दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकारों के बीच बातचीत इसी मुद्दे पर रद्द हुआ था। पाकिस्तान कहता था कि हम कश्मीर मुद्दे पर बातचीत करेंगे जबकि भारत का कहना था कि उफा घोषणा के अनुसार आतंकवाद, सीमा पर संघष सर्वप्रमुख मुद्दा था और सुरक्षा सलाहकारों को इसी विषय पर बातचीत करनी थी। पाकिस्तान यदि भारत पर आरोप लगाएगा कि बलूचिस्तान में आप अस्थिरता पैदा कर रहे हैं और वह भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी को प्रमाण बताएगा तो बातचीत की गाड़ी कहां से आगे बढ़ सकती है। पाकिस्तानी विदेश सचिव के इस आरोप पर भारतीय विदेश सचिव ने सख्त एतराज जताया। उन्होंने कहा कि कोई देश या जासूसी एजेंसी अपने जासूस को उसका असली पासपोर्ट देकर नहीं भेजती।

भारत के इस नकार या एतराज से पाकिस्तान पर प्रभाव पड़ा होगा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है। भारत ने कुलभूषण जाधव की गिरफ्तारी के दिन से ही इस आरोप को नकारा है तथा उसके यहां तक दूतावास की पहुंच सुनिश्चित करने की मांग की है। पाकिस्तान ने अभी तक ऐसा होने नहीं दिया है। विदेश सचिवों की बातचीत में भी यह मुद्दा भारत की ओर से उठा, पर पाकिस्तान ने सकारात्मक जवाब नहीं दिया। तो इसका क्या अर्थ लगाया जाए? यही नहीं भारतीय विदेश सचिव ने पठानकोट हमले की जांच में तेजी लाने तथा मुंबई हमले में कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात की तो भी पाकिस्तान ने कोई साफ वचनबद्धता नहीं दिखाया। हां, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पाक में मौजूद आतंकवादी समूह भारत में हमले करते हैं और इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि आतंकवादी घटनाओं का दोनों देशों के संबंधों पर असर पड़ता है। पाकिस्तान यदि आतंकवाद पर भी कोई वायदा करने से बचता है तो उसकी मंशा समझनी चाहिए।

हां, यह कह सकते हैंकि पिछले वर्ष 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अचानक लाहौर यात्रा में नवाज शरीफ से मुलाकात के बाद कम से कम विदेश सचिवों की बातचीत तो हुई। इसके साथ-साथ यह भी प्रश्न उठेगा कि केवल बातचीत के लिए बातचीत करने का क्या लाभ है? पठानकोट हमलों की जांच के लिए उनकी टीम को भारत ने अपने यहां आने दिया। सुरक्षा सीमाओं का ध्यान रखते हुए उनको जांच का पूरा अवसर दिया, लेकिन एनआईए वहां कब जाएगी जाएगी या नहीं जाएगी इसका वह वचन नहीं दे रहा है। उल्टे मीडिया के माध्यम से जांच टीम में आए अधिकारी यह खबरें प्रसारित करा रहे हैं कि भारत ने उनको जांच का पूरा मौका नहीं दिया। अरे, भैया पठानकोट हमले के सबूत तो आपके यहां है...जितने सबूत और दिशा आपको दिया गया उस आधार पर ईमानदारी से जांच करो, अपको और सबूत मिलता जाएगा। आप जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर और उससे जुड़े लोगों को कानून के कठघरे में लाओ न्याय हो जाएगा। कम से कम मंशा तो दिखाओ। पाक विदेश सचिव भारत की धरती पर आकर यदि पठानकोट और आतंकवाद को छोड़कर कश्मीर राग अलापते हैं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव की बात करते हैं तो जाहिर है वे भारत की भावनाओं का अपमान कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान भारत में रह चुके अपने पांच पूर्व उच्चायुक्तों को भेज रहा है। वे यहां पाकिस्तान में रह चुके पूर्व उच्चायुक्तों से बातचीत करेंगे। इस बातचीत में भारतीय दल की अगुवाई पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त सतिंदर लांबा करेंगे। पाकिस्तान के ये पांच पूर्व उच्चायुक्त पाकिस्तान भारत पर्दे के पीछे वार्ता या बैक डॉर डिप्लोमेसी के अहम किरदार हो गए हैं। पिछले साल बैंकॉक में राष्ट्रीय सुरक्षा स्तर की बातचीत में भी इनकी भूमिका थी।

लेकिन विदेश सचिवों की बातचीत के परिणामों को देखें तो इस समय बैक डोर कूटनीति से भी कुछ हासिल होने की संभावना बिल्कुल नजर नहीं आएगी। हो सकता है इसके बाद भारत समग्र बातचीत के लिए राजी भी हो जाए और यह हो भी, पर पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए किसी मामले में तत्काल प्रगति की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। इस आधार पर कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत को बातचीत भंग कर देनी चाहिए। जब उसे कश्मीर का राग ही अलापना है, उसे बलूचिस्तान की समस्या को भारत के सिर मढ़ना है तो वह अपनी बांसुरी बजाए। पाकिस्तान की लगातार कोशिशों को संयुक्त राष्ट्र ने ठुकरा दिया है। उसके आवेदन पर संयुक्त राष्ट्र ने बार-बार कहा है कि कश्मीर द्विपक्षीय मुद्दा है और संयुक्त राष्ट्र उसमें दखल नहीं दे सकता। अब तो संयुक्त राष्ट्र उसके पत्रों का भी जवाब नहीं देता। जब नवाज शरीफ की पिछल वर्ष अमेरिका यात्रा के दौरान सरताज अजीज ने बलूचिस्तान में रॉ एवं भारत की तथाकथित भूमिका संबंधी एक डॉजियर दिया तो अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी चीख पड़े एवं डांट तक लगा दी।

इस पृष्ठभूमि में यह प्रश्न तो उठता ही है कि आखिर इतना सब होने के बावजूद पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के तहत हल करने, बलूचिस्तान अशांति में भारत को आरोपित करने के रास्ते पर क्यों चल रहा है? पाकिस्तान की सरकार जब भी आंतरिक संकट में आती है कश्मीर राग अलापकर अपना बचाव करने की कोशिश करती है। लोगों की भावनाएं वहां भारत विरोध से अपने पक्ष में उभारतीं हैं। इस समय पनामा दस्तावेज में नवाज शरीफ परिवार का नाम आने से पाकिस्तान की राजनीति इतनी गरमा गई है कि वहां की मीडिया ही यह कयास लगाने लगी है कि क्या वे फिर 1999 की नियति को प्राप्त होंगे। उस वर्ष परवेज मुशर्रफ ने नवाज को प्रधानमंत्री पद से हटाकर सत्ता हथिया लिया था। विपक्षी दल नवाज पर हमले कर रहे हैं। माहौल उनके खिलाफ बनाया जा रहा हैं। यह माहौल इतना प्रतिकूल हो गया कि नवाज को टेलीविजन और रेडियो से पाकिस्तान को संबोधित करना पड़ा। ऐसे माहौल में नवाज भारत के प्रति नरम रवैया अपनाने का जोखिम नहीं ले सकते। वैसे पाकिस्तान के अंदर भी 1999 या उसके पूर्व की स्थिति नहीं है। वहां भी मीडिया के माध्यम से सारी खबरें लोगों तक पहुंचती हैं जो जनरल परवेज मुशर्रफ के सत्ता में आने के पूर्व नहीं थी। फिर भी नवाज की मजबूरी है इस समय यह प्रदर्शित करना कि कश्मीर एवं बलूचिस्तान मामले पर वे भारत के साथ दो टूक बात कर रहे हैं ताकि विरोधी उन पर झुकने का आरोप न लगा दें। दूसरे, यह भी माना जा रहा है कि सत्ता में दो धाराएं हो चुकी हैं। इनमें एक धारा कट्टरपंथियों की है जिनको सेना से शह मिल रहा है और वो अपने अनुसार बयान देता है। पिछले 7 अप्रैल को भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने भारत के साथ बातचीत निलंबित करने का जो बयान दिया वह दूसरी धारा के इशारे पर तथा पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बातचीत निलंबित न होने का बयान दिया वह नवाज के कहने पर। ऐसे माहौल में भारत बातचीत करे या न करे उससे कुछ भी निकलने वाला नहीं है।