पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में आश्चर्य का कोई बड़ा पहलू नहीं है। सारे सर्वेक्षण पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पुनर्वापसी की भविष्यवाणी कर रहे थे तो केरल में वाममोर्चा के तथा असम में भाजपा के सरकार बनाने की। हां, तमिलनाडु में अवश्य धुंधला परिदृश्य सामने आया था। कुछ जयललिता के फिर से जीकर इस बार 1980 के बाद किसी सरकार के वापस न आने के इतिहास पलटने की भविष्यवाणी कर रहे थे तो कोई उनके हारने की। आम उम्मीद यही थी कि द्रमुक 2011 और 2014 के बड़े झटके से शायद ही उबर पाए। ध्यान रखिए 2014 के लोकसभा चुनाव में द्रमुक को केवल 4 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी जबकि अन्नाद्रमुक की 217 में। परिणाम हमारे सामने है। पुड्डुचेरी में भी एआईएनआरसी सरकार की वापसी और जाने दोनों की ही संभावना व्यक्त की गई थी। तो इस परिणाम को दो आधारों पर हम विश्लेषण कर सकते हैं। एक, आखिर ऐसे परिणाम के कारण क्या हैं? दूसरे, इनके राजनीतिक परिणाम क्या होंगे?

आरंभ असम से करें। कांग्रेस और तरुण गोगोई के 15 वर्ष के शासन के कारण सत्ताविरोधी रुझान होना स्वाभाविक था। साफ है कि असम में लोग परिवर्तन चाहते थे और भाजपा के रूप में विकल्प मौजूद था। आप देखेंगे कि असम के परिणाम मोटा मोटी लोकसभा चुनाव परिणाम के करीब है। लोकसभा चुनाव में भाजपा को 69 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी। असम गण परिषद या बोडो पीपुल्स फ्रंटं के साथ गठबंधन ने उसके मतों का सुदृढ़िकरण किया। इससे मूल असमिया यानी अहोम जो कांग्रेस के साथ चले जाते थे उनका बड़ा भाग इनके पास आया, आदिवासी आए। भाजपा ने अवैध बंगलादेशी अप्रवासियों को निकालने तथा उनको रोजगार देने वाले के खिलाफ कार्रवाई का जो वायदा किया उससे हिन्दू मतों का काफी हद तक ध्रुवीकरण हुआ। मुसलमानों का वोट बदरुद्दीन अजमल के एआईयूडीएफ एवं कांग्रेस के बीच बंटा। बंगलाभाषी मुसलमानों का वोट अजमल के पास गया। यह न भूलिए कि भाजपा ने यहां बिहार के विपरीत स्थानीय नेताओं पर ज्यादा भरोसा किया। सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाना तथा कांग्रेस से आए हेमंत विश्व शर्मा को प्रमुख नेता के रूप में उभारना बेहतर रणनीति साबित हुई। इसके विपरीत कांग्रेस एकला चलो की नीति पर कायम रही और तरुण गोगोई के खिलाफ विद्रोह को महत्व नहीं दिया।

अब आए पश्चिम बंगाल। पश्चिम बंगाल के लोगों के सामने कोई एकमात्र मुख्यमंत्री का उम्मीदवार था तो वह ममता बनर्जी थीं। न तो वाम मोर्चा कांग्रेस गठबंधन ने कोई उम्मीदवार उतारा न भाजपा ने। तो ममता बनर्जी का चेहरा सारे मुद्दों पर भारी पड़ा। कोई भी प. बंगाल में देख सकता था कि शारदा और नारदा वहां मुद्दा जनता के बीच था ही नहीं। यह ममता बनर्जी का व्यक्तित्व और लड़ने का तरीका ही था जिसने इन दो मुद्दों को नेपथ्य में धकेल दिया। सड़कों का निर्माण, ग्रामीण क्षेत्रों तक बिजली आदि ने ममता के पक्ष में काम किया। ऐसा लगता है कि वाममोर्चा से भय खाने वाले मतदाता अभी तक उस पर विश्वास करने को तैयार नहीं हैं। वाममोर्चा के काल में पश्चिम बंगाल की खस्ताहाल हुई अर्थव्यवस्था, बंद हुए उद्योगों और कारोबारों को लोग भूला नहीं पा रहे हैं। भाजपा यहां अकेले चुनाव में उतरी जरुर लेकिन वह उस रूप में नहीं थी जैसी असम में थी। वाममोर्चा और कांग्रेस का गठबंधन बनने में देर हुई और उसमें भी दोनों पार्टियों के नेताओं ने एक मंच पर आने में भी काफी देर कर दी। पश्चिम बंगाल में करीब 36 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने ऐसा लगता है कि उसी तरह एकपक्षीय मतदान किया जिस तरह उनने लोकसभा चुनाव में किया था। लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 214 स्थानों पर बढ़त मिली थी। उस समय नरेन्द्र मोदी के आने का भय पैदा किया गया तो इस बार भी ममता ने भाजपा को रोकने की बात की। माकपा कांग्रेस यह विश्वास पैदा करने में असफल रहे कि वहां भाजपा के आने की संभावना नहीं है। हालांकि भाजपा को जितनी सीटें मिलीं वह उसे संतुष्ट नहीं हो सकतीं। आखिर लोकसभा चुनाव में उसे 24 विधानसभा स्थानों में बढ़त मिली थी।

केरल में एक बार लोकतांत्रिक मोर्चा और अगली बार वाम मोर्चा की परंपरा कायम रही है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री ओमन चांडी पर दांव लगाया था और चांडी ने अपनी शराबबंदी को प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन वाममोर्चा ने भी कह दिया कि उनकी सरकार आई तो शराबबंदी जारी रहेगी। सौर घोटाला तथा भ्रष्टाचार के अन्य आरोप कांग्रेस पर भारी पड़े। वैसे भी पिछली बार दोनों के बीच केवल 4 स्थानों तथा 0.9 प्रतिशत मत का ही अंतर था। भाजपा ने यहां पूरा जोर लगाया। उसने चार दलों भारतीय धर्मजन सेना, आदिवासी नेता सी के जानु की जनथीपाथ्य राष्ट्रीय सेना, केरला कांग्रेस-पी.सी.थॉमस समूह एवं जनथीपाथ्य संरक्षरण समिति के साथ गठबंधन बनाया। स्वयं 97 स्थानों पर लड़ी तथा बीडीजेएस को 37 स्थान दिए, केरला कांग्रेस-थॉमस को 4 तथा अन्य दो घटकों को1-1। भारतय धर्म जन सेना को एझवा समुदाय का संगठन माना जाता है जो पिछड़ी जाति से आती है और जिसकी संख्या प्रदेश में एक चौथाई के करीब मानी जाती है। नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह ने केरल में कई सभाएं कीं, भाजपा ने वहां पूरा जोर लगाया। इसको वोटों का तो लाभ हुआ लेकिन उस परिमाण में सीटें नहीं मिलीं। हालांकि केरल में वह पहली बार अपना खाता खोलने में कामयाब रही और उसके काफी उम्मीदवारों का प्रदर्शन अच्छा रहा है। इससे भविष्य के लिए उम्मीद पैदा होती है कि भाजपा ने अपने साथियों के साथ मेहनत किया तो केरल में एक तीसरा ध्रुव कायम हो सकता है।

तमिलनाडु के परिणमों पर नजर दौड़ाएं तो वहां द्रमुक के पक्ष में पहले से वातावरण नहीं लगता था। एम.करुणानिधि के दोनों बेटों के बीच मतभेद के कारण ऐसा लगता था कि पार्टी के अंदर विभाजन है। कांग्रेस का अपना कोई ठोस जनाधार तो वहां है नहीं। कांग्रेस पार्टी चुनाव के पहले ही टूट चुकी थी और कांग्रेस से निकलकर नेताओं ने तमिल मनिला कांग्रेस को फिर से जीवित किया। वियजकांत की डीएमडीके वाले पीपुल्स वेल्फेयर फ्रंट ने जितना ज्यादा वोट काटा अम्मा यानी जयललिता को उतना नुकसान हुआ। उन्होंने ज्यादा वोट अनन्नाद्रमुक का ही काटा। हालांकि जयललिता के विरुद्व किसी प्रकार का सत्ता विरोधी रुझान नहीं दिख रहा था। उनकी अम्मा कैंटिन, अम्मा बेबी किट, अम्मा फार्मेसी, अम्मा साड़ी, अम्मा मिनरल वाटर... योजनाएं काफी लोकप्रिय थीं। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर इनको वैसी सफलता नहीं मिलीं जैसी मिलनी चाहिए थी। आधारभूत संरचना का विकास नहीं हुआ। लोकप्रिय योजनाओं के कारण बजट का खासा हिस्सा गैर योजनागत मद यानी सब्सिडी में चला जाता था। इस कारण उनके खिलाफ भी एक वर्ग था, लेकिन जयललिता ने सत्ता विरोधी रुझान कम करने के लिए अपने 150 में से 99 विधायकों के टिकट काट दिए। 10 मंत्रियों को चुनाव मैदान में नहीं उतारा। हो सकता है कि टिकट से वंचित लोगों ने कुछ भीतरघात भी किया हो। इन सबसे उनके मतों में कमी आई और लोकसभा चुनाव में 217 क्षेत्रों की बढ़त कायम न रही। किंतु अंततः उन्होंने इतिहास पलट दिया।

तो इस परिणाम से कांग्रेस ने दो राज्यों से अपनी सत्ता खोई। यह उसके लिए बहुत बड़ा झटका है। भाजपा का असम में सरकार बनाना बिहार पराजय के बाद खोए हुए आत्मविश्वास की वापसी का कारण बन सकता है। भाजपा संभव है उत्तर प्रदेश में भी स्थानीय नेताओं को आगे लाए। राष्ट्रीय राजनीति पर भी इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। कांग्रेस के अंदर तो राहुल गांधी और सोनिया गांधी के निर्णय पर कोई प्रश्न उठ नहीं सकता, अन्यथा प. बंगाल में वामपंथियों के साथ जाने का निर्णय राहुल गांधी का ही था जो असफल हुआ। इसके बाद भाजपा के खिलाफ संसद एवं बाहर कांग्रेस की आक्रामकता में कमी आ सकती है। उसके पास अब बड़े राज्यों में केवल कर्नाटक रह गया है। भाजपा कांग्रेस के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा आक्रामक होगी। भाजपा के पास आठ सरकारों पहले से थीं। चार जगह वह गठबंधन सरकार की हिस्सेदार थी और एक सरकार और हो गई। इसका असर उसके मनोविज्ञान पर पड़ेगा। भाजपा कांग्रेस के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा आक्रामक होगी। कांग्रेस के लिए पहले के समान अपनी आक्रामकता बनाए रखना जरा कठिन होगा। प. बंगाल में तृणमूल की सत्ता कायम रहने से केन्द्र के साथ समीकरण कभी टकराव और समर्थन का बना रहेगा।