महात्मा गांधी की हत्या ता. 30 जनवरी 1948 की शाम 5:17 बजे को हुई। ता. 31 जनवरी को पुलिस ने सावरकरजी के घर की तलाशी लेकर कुछ पत्राचार अपने कब्जे में लिया। गांधीहत्या की निंदा करनेवाला एक निवेदन हिंदू महासभा के तत्कालीन पदाधिकारियों द्वारा जारी किए जाने के बाद भी सावरकरजी ने, जो उस समय हिंदू महासभा के एक उपाध्यक्ष थे, ता. 4 फ़रवरी को महात्मा गांधी की निर्मम हत्या का निःसंदिग्ध धिक्कार करनेवाला स्वतंत्र ज्ञापन प्रकाशित किया। ता. 5 फ़रवरी 1948 को पुलिस ने सावरकरजी को उनके निवासस्थान पर गिरफ्तार किया और उन्हें आर्थर रोड जेल भेज दिया। उन पर भारतीय दंड विधान की निम्नलिखित धाराएं लगाई गई - 302, 34, 100, 120 बी और 307; साथ ही सन् 1878 के विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 5 तथा अस्त्र कानून की धारा 19 (एफ)। सीधे शब्दों में कहें तो सावरकरजी को हत्या करना, हत्या की साजिश रचना, अवैध रूप से हथियार और विस्फोटक रखना अथवा अवैध रूप से उन्हें रखने में मदद करने के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। यह कहने की गुंजाईश है, कि मुंबई पुलिस की मानसिकता दूषित थी। 11 मई 1948 को सावरकरजी को सीआईडी मुख्यालय ले जाया गया और उन्हें कुर्सी पर बिठाकर उनके पास गोडसे तथा अन्य आरोपियों को बिठाकर सबकी एक साथ तस्वीर ली गई। सावरकरजी ने मुंबई के मुख्य दंडाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत प्रतिज्ञापत्र में उचित आपत्ति उठाई, कि इस तस्वीर का दुरुपयोग अभियोग के समय होगा। गांधीहत्या के षडयंत्र में सावरकरजी सम्मिलित थे, यह कहलवाने के लिए पुलिस ने उनके अंगरक्षक अप्पा कासार को लगातार 56 दिन बर्फ की लादी पर सुलाया, उनके नाखून खींच लिए और बेहोश होने तक उनसे मारपीट की। धन्य है वह आधुनिक जीवा महाला (शिवाजी के अंगरक्षक)! अप्पा ने वह निवेदन नहीं दिया जो नेहरू सरकार को चाहिए था।
ता. 4 जून 1948 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी अध्यादेश के अनुसार महात्मा गांधी हत्या का मामला एक विशेष न्यायालय को सौंप दिया गया।  कानपुर के तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायालय के न्या. आत्मा चरण को विशेष न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त करने के बाद दिल्ली के लाल किले में मामले की सुनवाई शुरू हुई। सावरकरजी पर रखा गया आरोपपत्र और उनके द्वारा किया गया बचाव का निवेदन स्थानाभाव के चलते यहां नहीं दूंगा। यह इंटरनेट पर उपलब्ध है (http://www.savarkar.org/en/biography/written-statement-savarkar)।

ता. 10 फ़रवरी 1948 को विशेष न्यायालय के न्या. आत्मा चरण ने घोषणा की, कि सावरकरजी निर्दोष है। लेकिन सावरकर विरोधियों को न्यायालय का यह निर्णय मान्य नहीं है। उसके अनंतर आनेवाले न्या. कपूर आयोग की रिपोर्ट के एक वाक्य का हवाला देकर सावरकरजी का हाथ होने का वे तब तक शोर मचाते है जब तक उन्हें चक्कर न आ जाएं।


न्या. कपूर आयोग द्वारा मर्यादा उल्लंघन


ता. 12 नवंबर 1964 को पुणे के एक कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार ग. वि. केतकर ने दावा किया, कि उन्हें तथा दूसरों को गांधीहत्या की पहले से जानकारी थी। इसकी प्रतिक्रिया के रूप में गांधी हत्या के षडयंत्र की जांच करने के लिए 22 मार्च 1965 को गोपाल स्वरूप पाठक आयोग नियुक्त किया गया। पाठक के मंत्री बनने के बाद 21 नवंबर 1966 को उच्चतम न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश जीवनलाल कपूर का एक सदस्यीय आयोग नियुक्त किया गया। दो हिस्सों और छह खंडों में प्रकाशित न्या. कपूर आयोग की 383 पन्नोंवाली मुद्रित रिपोर्ट इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। आयोग के अधिकार क्षेत्र में तीन मुद्दे निश्चित किए गए थे। संक्षेप में वे इस प्रकार है - 1) क्या कुछ लोगों को, खासकर ग. वि. केतकर को, गांधी हत्या की पहले से जानकारी थी? 2) क्या इन लोगों ने यह जानकारी मुंबई सरकार अथवा भारत सरकार के अधिकारियों को दी थी? और 3) यदि (जानकारी) दी हो, तो मुंबई सरकार, खासकर (मुख्यमंत्री) बाल गंगाधर खेर और भारत सरकार अथवा उसके अधिकारियों द्वारा उस कथित जानकारी के आधार पर क्या कारवाई की गई?
एकत्रित की गई जानकारी और सबूतों के आधार पर आयोग ने अपने निष्कर्ष जाहीर किए। पहले मुद्दे के बारे में बात करें, तो गांधीजी की जान को खतरा होने (केवल नथुराम की कृति की जानकारी होने के सीमित अर्थ में नहीं) की पहले से जानकारी होनेवाले  व्यक्तियों का उल्लेख आयोग ने किया है जिसमें सावरकरजी का नाम कहीं लिया नहीं गया है। चूंकि सावरकरजी को पहले से कोई जानकारी नहीं थी, इसलिए अन्य दो मुद्दों से उनका कोई संबंध होने का सवाल ही नहीं उठता।
न्या. कपूर आयोग की नियुक्ति सन् 1952 के 'द कमिशन्स ऑफ इन्क्व्यायरी' कानून के अंतर्गत की गई थी। इस कानून के तहत जांच आयोग को सिविल न्यायालय के अधिकार होते है। जांच आयोग वह संस्था है जो सबूत इकठ्ठा करती है, वह निर्णय देनेवाली न्यायपालिका नहीं होती! किसी भी व्यक्ति को बुलाकर शपथ पर उसकी जिरह के सवाल करना, किसी अभिलेख की खोज करवाना अथवा उसे प्रस्तुत करने की आज्ञा देना, प्रतिज्ञापत्र पर गवाही दर्ज करवाना आदि चीज़ें जांच आयोग के अधिकारक्षेत्र में आते है।
जांच आयोग का अधिकारक्षेत्र आपराधिक न्यायालय के तुलना में दोयम होता है। आपराधिक न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले पर जांच आयोग अलग से विचार नहीं कर सकता। न्या. आत्मा चरण के विशेष न्यायालय द्वारा सावरकरजी को निर्दोष घोषित करने के बाद  न्या. कपूर आयोग को इससे अलग टिप्पणी करने का अधिकार ही नहीं था। आपराधिक न्यायालय का फैसला अमान्य हो तो उस फैसले के विरोध में अभियोजक पक्ष (यहां नेहरू सरकार) ऊपरी न्यायालय में जा सकता है। विशेष न्यायालय द्वारा सावरकरजी को निर्दोष छोड़ने के बाद इस फैसले के विरोध में नेहरू सरकार, जो द्वेषबुद्धी से भरी थी, ऊपरी न्यायालय में क्यों नहीं गई? नेहरू सरकार पक्के तौर पर जानती थी, कि सावरकरजी के विरोध में उसका पक्ष लंगड़ा ही नहीं बल्कि बेबुनियाद था। तत्कालीन विधि मंत्री डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर ने सावरकरजी के कानूनविद् भोपटकर के साथ एक गुप्त मुलाकात में इस आशय की कल्पना दी थी। 'काल' के संपादक शंकर रामचंद्र तथा मामाराव दाते जैसे जिम्मेदार व्यक्ति ने 35 वर्षों बाद इस घटना का रहस्योद्घाटन किया (साप्ताहिक काल, 6 जून 1983, साप्ताहिक विवेक 19 जून 1983)। डॉ बाबासाहब ने भोपटकर से कहा, '' सावरकर पर कोई आरोप नहीं है। सबूत जैसे-तैसे बनाए गए है। मंत्रिमंडल के सदस्यों का कहना है, कि छोटे-मोटे संदेह के आधार पर सावरकर को इस अभियोग में फंसाना नहीं चाहिए। लेकिन आखिर एक बड़े नेता (नेहरू) आग्रह पर उन्हें इस अभियोग में फंसाया है। सरदार पटेल की भी उनके सामने कुछ नहीं चली। आप निर्भय होकर अभियोग का सामना कीजिये। विजय आपकी ही है।'
कानून कहता है, कि आयोग की जांच के कारण कोई व्यक्ति सम्मान खोने की स्थिति में हो तो उस व्यक्ति को अपना पक्ष रखने अथवा प्रमाण प्रस्तुत करने का अवसर आयोग द्वारा दिया जाना चाहिए। असल में न्या. कपूर आयोग का कामकाज ही सावरकरजी के निधन के बाद शुरू हुआ। सावरकरजी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उनके विषय में प्रतिकूल टिप्पणियां करना अवैध, अन्याय्य और अनुचित था। गांधीजी की जान को खतरा है, यह सावरकरजी नहीं जानते थे, इस निष्कर्ष का स्पष्ट रूप से उल्लेख करनेवाले आयोग ने यह किस आधार पर कहा, कि 'इन सब बातों का विचार करते हुए (गांधी) की हत्या का षडयंत्र सावरकर और उनके अनुयायियों ने रचा था, इसी एक निष्कर्ष पर आना पड़ता है' (पैरा 25.106)? सावरकरजी पर ताना कसते हुए न्या. कपूर की भाषा आश्चर्यजनक रूप से ढीली और अस्पष्ट है। इसी मंतव्य का एक वक्तव्य अन्यत्र (पैरा 25,97) किया गया है। लेकिन वहां 'सावरकर और उनके अनुयायियों' शब्दों का उपयोग किए बिना 'सावरकरवादियों ने' शब्द का प्रयोग किया गया है। किसी भी दृष्टि से विचार करें तो यही निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य होना पड़ता है, कि न्या. कपूर ने मर्यादा उल्लंघन किया है।


 समर्थक और अनुयायी


कानूनी तौर पर देखा जाएं, तो गांधीहत्या के आरोप से सावरकर निर्दोष मुक्त हो गए थे। उनका तिरस्कार करनेवाले चाहे जमीन-आसमान एक कर दें, फिर भी यह निर्णय अब नहीं बदलनेवाला। लेकिन इतने से संतुष्ट न होकर सावरकरजी की और परीक्षा करेंगे। यह देखना होगा, कि क्या भिन्न विचार रखनेवाले किसी स्वदेशी, खासकर देशभक्त, व्यक्ति की हत्या करना सावरकरजी के चरित्र एवं विचारों से मेल खाता है, । संक्षिप्त में कहें, तो क्या सावरकरजी के चरित्र अथवा विचारों में नथुराम गोडसे की कृति का कोई सैद्धांतिक आधार है?
इस प्रश्न का उत्तर पहले सावरकरजी के चरित्र और फिर सावरकरजी के विचारों में ढूंढ़ने से पहले 'समर्थक' और 'अनुयायी' इन शब्दों का भेद समझना होगा। ऊपरी तौर पर जितना दिखता है उतना सीधा वह नहीं है। सटीक शब्दों का प्रयोग करनेवाले सावरकरजी के शब्दों में कहें, तो "शब्दों का भ्रम विचारों का भ्रम पैदा करता है।" सावरकरजी की उक्ति "जो जूझता है वह वीर, जो कार्य करता है वह कार्यकर्ता" के अनुसार कहा जा सकता है, कि "जो समर्थन करता है वह समर्थक, जो अनुसरण करता है वह अनुयायी"। किसी महापुरूष का हर अनुयायी उसका समर्थक होता है, लेकिन क्या हर समर्थक अनुयायी होता है?  इस प्रश्न का उत्तर है, 'नहीं'। सावरकरजी के साथ लंबे समय तक हिंदू महासभा में काम करनेवाले, बाद में अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बननेवाले, मुद्रणमहर्षि कहे जाने की हद तक सावरकरजी के लिपि सुधार का काम करनेवाले, शुद्धिकार्य में सहभागी होनेवाले और सावरकरजी के जीते जी उनके पांच-छह हजार पन्नों के साहित्य का विवेकपूर्ण संपादन करनेवाले और उसे प्रकाशित करनेवाले के रूप में शंकर रामचंद्र तथा मामाराव दाते विख्यात है। लेकिन सावरकरजी के सभी सामाजिक विचार अथवा भाषा की शुद्धी के बारे में सावरकरजी के सभी मत उन्हें मान्य नहीं थे। क्या मामाराव दाते सावरकरजी के अनुयायी थे, इस प्रश्न का उत्तर सभी सावरकरप्रेमी हां में देंगे। लेकिन उनकी उपस्थिति में मामाराव का उल्लेख कोई ''सावरकर के अनुयायी'' के तौर पर करें, तो मामाराव कहते थे, ''मैं सावरकर का सहयोगी हूं, लेकिन अनुयायी लोकमान्य (तिलक) का हूं।'' अपने आपको सावरकरजी का अनुयायी कहलवाना कितना मुश्किल काम था, यह मामाराव जैसा कर्मयोगी जानता था। शब्दों का प्रयोग और उनका अर्थान्वयन ढिलाई से करना हमारी आदत बन गई है। गांधीहत्या करनेवाला गोडसे और उसकी कृति के समर्थक सावरकर का समर्थन – बल्कि उनकी जयजयकार – करते है, उस लिहाज़ से वे सावरकर समर्थक है। मुद्दा वह नहीं है। असली सवाल यह है, कि क्या गोडसे और गोडसे समर्थकों को सावरकरजी के अनुयायी कहा जा सकता है।  


सावरकर चरित्र से उदाहरण

 
ता. 23 जुलाई 1908 को लोकमान्य तिलक को काले पानी की सज़ा सुनाई गई और उन्हें मंडाले भेजा गया। इस समाचार से लंदन में रहनेवाले भारतीयों वज्राघात हो गया। इसकी निंदा करने हेतु आयोजित सभा की अध्यक्षता माननीय गोपाल कृष्ण गोखले, जो उस समय लंदन में थे, करें इस आशय का अनुरोध उनसे किया गया था। गोखले ने वह अनुरोध ठुकरा दिया था। इतना ही नहीं, वे इस सभा में अनुपस्थित रहे। गोखले के व्यवहार से लंदन के क्रांतिकारी मंडली के कुछ युवक क्षुब्ध हुए। उनके मन में गोखले को जान से मारने का विचार आने लगा। लेकिन सावरकरजी ने उन्हें रोका और कड़े शब्दों में कहा, कि इस तरह का विचार भी मन में लाना पाप है। इस तरह की पागनलपन भरी कृति करना और केवल मतभेदों के खातिर अपने ही देशबंधू पर इस तरह हमला करना, यह क्रांतिकारी आंदोलन की प्रतिष्ठा और ताकत के लिए अत्यंत घातक होगा, इस तरह की समयोचित चेतावनी सावरकरजी ने उन युवाओं को दी।
ता. 1 जुलाई 1909 को मदन लाल ढींगरा ने कर्जन वायली का वध किया। सावरकर के स्वभाव में निहित 'मानवता' नामक श्रेष्ठ गुण का परिचय कैसे हुआ, इसका वर्णन सावरकरजी के क्रांतिकार्य में सहयोगी निरंजन पाल ने किया है। वे कहते है, ''लेडी कर्ज़न किस तरह सीढ़ियों से दौड़ते दौड़ते गई और अपने पति के शव पर उसने कैसे खुद को झोंक दिया, इसका हंसते हंसते वर्णन एक भारतीय छात्र ने किया। सावरकरजी के लिए वह सब असहनीय हो गया। क्षुब्ध आवाज़ में उस छात्र को संबोधित करते हुए वे बोले, "वह अपने पति के लिए दिल पसीज देनेवाला शोक करती है और तुम्हें हंसी आती है! तुम पर मेरा विश्वास उठ गया। इसके बाद मैं तुम पर कभी भी विश्वास नहीं रख सकता!''
ता. 19 फ़रवरी 1915 को गोपाल कृष्ण गोखले का देहांत हो गया। तब सावरकरजी अंडमान में थे। यह समाचार सावरकरजी को बताने के लिए आए हुए जेलर बारी ने उनसे कहा, ''मि. सावरकर, तुम्हें हमेशा समाचार चाहिए होता है, नहीं? यह लो समाचार। गोखले गुजर गए है!''  उस खबर से सावरकरजी को सदमा लगा। उन्होंने दुख प्रकट किया, तब बारी ने उनसे कहा, '' वह तो आपके विरोधी थे ना?'' लेकिन सावरकर ने कहा, ''नहीं तो! मैंने तो उन्हीं के कॉलेज में शिक्षा पाई है। मतभेद थे, विरोध नहीं। हर एक हिन्दू गोखले की तरह देशभक्त और देशसेवक हो तो...!'' आश्चर्यचकित होकर बारी ने अपनी डायरी में लिखा, 'सतही तौर पर चाहे कितने भी भिन्न और विरोधी लगे, लेकिन ये महाराष्ट्रीय लोग दिल से सभी एक ही है।'
रत्नागिरी में सावरकर के सन्निध रहे और बाद में रॉयवादी (वामपंथी) बने नारायण सदाशिव बापट तथा कवि उल्हास ने सावरकरजी के संस्मरण लिखे है (स्मृतिपुष्पे, 1979)। इसमें निम्न सामग्री महत्वपूर्ण है। समय 1932 के आसपास  का है, उस समय बापट की आयु पंद्रह साल की थी। बापट के शब्दों में – “मैंने एक बार तात्या (सावरकरजी) से पूछा, ‘अगर कोई गांधी को मारें तो?’ जिस पर बिल्कुल स्वाभाविकता से उन्होंने उत्तर दिया, ‘नहीं, वे अपने है। उन्हें मारना नहीं चाहिए।’ इस पर मैंने कहा, ‘लेकिन मान लीजिये, राजनीति में उनकी नीति किसी को बेहद नुकसानदायक लगे, तो?’ इस पर उन्होंने कहा, ‘ऐसा हुआ, तो अधिक से अधिक उन्हें कुछ समय के लिए किसी किले में हिरासत में रखना चाहिए।’ मैं यह याद कई सालों से कईयों को बताते आया हूं। अब उसे मैं लिख रहा हूं। गांधीहत्या के अभियोग के समय, मैंने स्व. भोपटकर तथा तात्या को भी कई बार सूचित किया, कि मेरी गवाही लें तो मैं यह याद बताऊंगा। इस पर उनका कहना था, कि सरकार को पूर्वग्रह और संदेह का पीलिया रोग हुआ है। इसलिए सीधा निष्कर्ष निकालने की बजाय उल्टा निष्कर्ष निकाले जाने की भी संभावना है, वह यह कि....यानि गांधीहत्या की चर्चा हो चुकी थी। इसलिए मैं चुप हुआ। और एक याद बताता हूं। गांधीजी से उनके तीव्र मतभेद दुनिया जानती थी। फिर भी तात्या के दिल के एक कोने में महात्माजी के बारे में उन्हें आत्मीयता थी। वे कई बार कहते थे, ‘उनकी गाय, चोटी, गीता, वह राम नाम...आखिर चाहे जो हो, हिंदू है.’ दूसरे यह, कि जब जब मैंने उनका संभाषण सुना, उसमें उन्होंने 'गांधी' अथवा 'गांधीजी' उल्लेख न करते हुए हमेशा 'महात्माजी' ही कहते थे। (पृ. 48-49)
ता. 12 फरवरी 1943 को गांधीजी ने दिल्ली में 21 दिन का अनशन शुरू किया। सावरकरजी ने ता. 20 फरवरी को एक विस्तृत ज्ञापन जारी किया जिसका मंतव्य था, कि 'गांधीजी के प्राण केवल उनके अपने नहीं, बल्कि वह राष्ट्रीय संपत्ति है। अपने प्राणों की बाज़ी लगाकर अनशन करते हुए, जिस राष्ट्र की सेवा गांधीजी करना चाह रहे है उसी राष्ट्र को उनके प्राण इस समय त्यागने की तुलना में अगणित गुना उसके (राष्ट्र) के लिए मूल्यवान प्रतीत होता है।" उस समय सावरकरजी ने सर तेज बहादूर सप्रू को तार भेजी थी, कि उस समय दिल्ली में एक संगोष्ठी के लिए एकत्रित सभी नेता गांधीजी को उनका अनशन समाप्त करने के लिए अपने हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन सौंपे।
ता. 26 जुलाई 1943 को एक खाकसार द्वारा किए गए खूनी हमले से मुहम्मद अली जीना बच गए, उसके दूसरे ही दिन प्रसिद्ध किए गए ज्ञापन में सावरकरजी कहते है, "श्री. जीना की हत्या का प्रयास होने की जानकारी होने पर मुझे अतीव दुख हुआ। उसमें से वे बच गए इसके लिए मैं उनका अभिनंदन करता हूं...राजनैतिक अथवा सरफिरे उद्देश से, आपस के लिए संहारक और उद्युक्त किए जाए बिना किए गए खूनी हमले हमारे सार्वजनिक एवं नागरी जीवन पर कलंक है और उनकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए।"
ता. 6 मई 1944 को ब्रिटिश सरकार ने आगा खान पैलेस से गांधीजी को मुक्त किया। उसके दूसरे ही दिन ज्ञापन जारी करते हुए सावरकरजी ने कहा था, "गांधीजी की ढलती उम्र, बिगड़ता हुआ स्वास्थ्य और हाल ही में हुई तीव्र बीमारी को ध्यान में लेकर सरकार द्वारा की गई रिहाई के कारण पूरे राष्ट्र ने राहत पाई है।"
गांधीजी की हत्या अथवा अनशन द्वारा उन्होंने किया हुआ प्राणत्याग ये दोनों बातें सावरकरजी को मान्य नहीं थी। इतना ही नहीं, उनकी सभा में बाधा लाना भी उन्हें अमान्य था। यह घटना नथुराम गोडसे ने अपने न्यायालयीन निवेदन में निम्नप्रकार विदित की है (आरोपपत्र का उत्तर, पैर 26, 37), "दिल्ली में गांधीजी की सभा में विरोध प्रदर्शनों का दौर शुरू करें और इस तरह की प्रार्थना सभाएं आयोजित करना उन्हें असंभव करवाएं, यह मैंने और आपटे ने तय किया...सावरकर ने इस प्रदर्शन की रिपोर्ट पढ़ी। उन्होंने हमारी इस गतिविधि की प्रशंसा नहीं की। उल्टा उन्होंने मुझे अकेले बुलाया। ऐसी अराजकतापूर्ण नीति के लिए उन्होंने मुझे दोष दिया...उन्होंने कहा, "तुम्हारे दल की सभाओं में काँग्रेस के लोग हो-हल्ला करते हुए उन्हें विफल करते है तब मैं उनकी निंदा करता हूं। हिंदू संगठक अगर ऐसा बर्ताव करें तो मुझे उसकी भी निंदा करनी ही होगी। गांधीजी अपनी प्रार्थना सभाओं में हिंदूविरोधी शिक्षा देते भी हों, तो तुम अपनी सभाएं आयोजित करो और उसकी निंदा करो। आपस में कम से कम अलग अलग दलों को अपना प्रचार संविधान के दायरे में ही करना चाहिए।" इसी निवेदन में गोडसे ने विस्तार से बताया है, कि सावरकर से उसके मतभेद कैसे हो गए।


सावरकर-विचार से उदाहरण


1928 में हुए बार्डोली सत्याग्रह के समय सावरकरजी ने गांधीजी के संबंध में अपनी भूमिका स्पष्ट की। उन्होंने कहा, "आज यह महान देशभक्त बार्डोली की रणभूमि में जिस नीति से लढ़ रहा है, वह नीति अभी तक तो कुशल सेनापति के योग्य होने के कारण और किसी की भी राष्ट्रीय लढ़ाई में हम सबको कंधे से कंधा मिलाकर लढ़ना उचित होने के कारण इस समय हम महात्माजी से सहयोग और सहायकारी शब्दों एवं आचरण का प्रयोग करना चाहते है। जब राष्ट्रीय हित का ही नाश होता है वहीं आड़े आने के लिए बाध्य होना पड़ता है और वह भी केवल राष्ट्रकार्य के लिए।  व्यक्तिगत तौर पर "परैस्तु विग्रहे प्राप्ते वयं पंचाधिकं शतं" यही हमारा ब्रीदवाक्य होना चाहिए, हमारा है। (समग्र सावरकर वाङ्मय, 1963-65, खंड 4, पृ. 204)।
चूंकि सावरकर क्रांतिकारी थे, इसलिए लग सकता है, कि हर तरह के शस्त्राचार, हत्या आदि विध्वंसक कृतियों के वे पक्षधर थे। क्रांतिकार्य करते समय भी सावरकरजी को बिनावजह हिंसा मान्य नहीं थी। सन् 1920 में अंडमान से अपने छोटे भाई को लिखे पत्र में सावरकरजी लिखते है, "शक्ति का प्रतिकार शक्ति से करते हुए हम दिल से हिंसा से घृणा करते थे और आज भी करते है।" इस सिद्धांत में कभी बदलाव नहीं हुआ। सन् 1952 में 'अभिनव भारत' के समापन समारोह में बोलते हुए सावरकरजी ने कहा, "विदेशी सत्ता के संकट से अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता प्राप्त करने हेतु ही प्रक्षोभ, असंतुष्टि, उत्क्षोभ, कानून का उल्लंघन, शस्त्राचार, गुप्त षडयंत्र आदि साधनों का प्रयोग करनेवाला विध्वंसक क्रांतिभाव उस समय ही आचरणयोग्य होता है...जब स्वतंत्रता प्राप्ति का हमारा पहला ध्येय साध्य होता है, तब सशस्त्र अथवा निःशस्त्र प्रतिकारी जनता में संचार की हुई उपरोक्त सभी विध्वंसक क्रांतिभावों का तत्काल विसर्जन करना हमारी सफल हुई राज्यक्रांति का अंतिम कर्तव्य है। क्योंकि अब हमारा लक्ष्य स्वंतत्रता की रक्षा करना है, राष्ट्र का संवर्धन करना है। अब कानून को तुच्छ नहीं मानना, बल्कि कानून का पालन करना है, विध्वंसक नहीं बल्कि रचनात्मक प्रवृत्ति ही राष्ट्रधर्म है।"


उच्च मूल्यों का उपासक


    दूसरे मतों के अपने अथवा विदेशी राजनैतिक विरोधकों की हत्या अथवा बिनावजह प्राणत्याग के सावरकरजी हमेशा विरोधी रहे। भिन्न मतों का प्रतिपादन करने का औरों का अधिकार उन्हें मान्य था। निर्दोष विदेशियों की हत्या तो दूर, उन्हें कष्ट होना भी उनसे सुना नहीं जाता था। यह बात उनके जीवन के अलग-अलग चरणों की घटनाओं से दृगोचर होती है। इसे नकारनेवाली एक भी घटना उनके जीवन में नहीं मिलती। सावरकरजी के विचारों में उनकी व्यापक, न्यायपूर्ण और उदार मनोवृत्ति दिखती है। सावरकरजी ठोस विचारोंवाले प्रखर राष्ट्रवादी अवश्य थे, लेकिन वे सर्वप्रथम महान मानवतावादी थे। सार्वजनिक जीवन में सौजन्य, शुचिता और सहिष्णुता को वे कभी नहीं भूले। नथुराम गोडसे की कृति में सावरकरजी का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष हाथ था, यह उनके विरोधकों का कहना न्यायालय का अवमान और सत्यापलाप है। लेकिन नथुराम गोडसे की कृति सावरकर विचारों के अनुरूप थी, यह स्वयं माननेवाले और औरों को मनवानेवाले उनके उल्लू समर्थकों को क्या कहे? विरोधकों की बजाय हम स्वयं अपने देवतासमान नेता को कलंकित कर रहे है, क्या यह वे समझ नहीं सकते? बड़बोले समर्थक और नासमझ विरोधक सावरकरजी को मूल रूप से पढ़ेंगे, समझेंगे इतनी ही आशा हम कर सकते है।