जब देश का विभाजन हो रहा था, सावरकरजी हिंदुहित, अर्थात् राष्ट्रहित, साध्य करने का प्रयास कर रहे थे। हिंदू रियासतों की ओर सावरकरजी इसी दृष्टि से देखते थे। जून 1947 में कोल्हापूर की गद्दी पर शहाजी राजा का राज्यारोहण हुआ। उस समय भेजे संदेश में सावरकरजी लिखते हैं- "छत्रपति शिवाजी महाराज का यह सिंहासन महाराष्ट्र पर होनेवाले संभावित हिंदूविरोधी आक्रमण आमूलचूल निरस्त करने की ताकत शहाजी राजा को दें! सभी हिंदू रियासतों की सैन्य और वायु दल की ताकतें संगठित कर हिंदू जगत पर होनेवाला आक्रमण रोका जाएं तो ही जो खोया है वह सबकुछ पुनः पाया जा सकेगा।" स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आनेवाली कांग्रेस की केंद्र सरकार हिंदूहित के लिए काम करेगी, इस पर दूरदर्शी सावरकरजी का बिल्कुल विश्वास नहीं था। इसलिए हिंदूहित साधनेवाली रियसतें उनके लिए प्रतिषिद्ध नहीं थी।

ता. 10 मे 1937 के दिन वीर सावरकर की रत्नागिरी से बिनाशर्त रिहाई हुई। पौनी सदी से अधिक समय तक वे सक्रिय राजनीति से दूर थे। राजनीति करने के लिए उन्हें बस दस वर्ष मिलनेवाले थे। पचास वर्ष कबके पार कर चुके सावरकरजी का स्वास्थ्य अंडमान में सालों तक भुगती हुई यातनाओं के कारण गिर चुका था। इसी लिए उन्होंने 1940, 1941 और 1942 में हिंदु महासभा के  अध्यक्षपद से त्यागपत्र देने की  इच्छा व्यक्त की थी। सन् 1940 में मदुरै के अ. भा. हिंदु महासभा के सत्र में तो उन्हें स्ट्रेचर पर लाया गया था। सन् 1943 के अमृतसर सत्र से पहले उन्होंने बिस्तर ही पकड़ लिया था जिसके कारण अध्यक्ष पत्र से उनका  त्यागपत्र स्वीकारने के अलावा  हिंदु महासभा के पास और कोई विकल्प नहीं रहा। निद्रिस्त हिंदू समाज को अत्यंत सीमित साधनों के साथ राजकीय दृष्टि देने का 'न भूतो' कार्य करते हुए, अखंड हिंदुस्थान के लिए लगभग एकाकी रूप से लड़ते हुए उन्हें एक ही समय में ब्रिटिश सत्ताधीश, मुस्लिम तुष्टीकरण में मग्न, सत्य-अहिंसा की भ्रांतिपूर्ण कल्पना में लीन हो चुकी काँग्रेस और मुस्लिम लीग का सामना करना पड़ा। राजनेता सावरकरजी की सफलता-असफलता का मूल्यांकन करते समय उन्हें कौन सी प्रतिकूलता में काम करना पड़ा, इसे ध्यान में लें तो कोई भी सहृदय मनुष्य उनके सामने नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाएगा। आज हिंदुत्व की राजनीतिक शाखा को जब सत्ता मिली है, उस सत्ता का उपभोग लेनेवालों को इस विनायक के प्रति 'ॐ नमोजी आद्या' की भावना हमेशा जागृत रखनी चाहिए। इसके उलट, सावरकरविरोधी टोली 1937 के बाद के उनकी राजनीति के कारण ही उनका तिरस्कार करती है। सावरकर हिंदुत्वनिष्ठ न होते, तो उनके जीवन के अंडमान और रत्नागिरी पर्व लेकर सावरकरविरोधी  टोली कोई आपत्ति न करती!
सन 1937-1947 के दौरान सावरकरजी के बारे में सर्वाधिक विवादित बनाए गए मुद्दों का ही केवल इस लेख में विचार करना है। सन् 1937 में कर्णावती में अ. भा. हिंदु महासभा के अध्यक्ष पद से उन्होंने  द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का किया हुआ तथाकथित पुरस्कार,  1942 के 'छोडो भारत' आंदोलन में और सैनिकीकरण को लेकर  उनकी कथित ब्रिटिश अनुकूल भूमिका और 1947 में स्वतंत्र त्रावणकोर रियासत को उनके द्वारा दिए हुए समर्थन का विचार करना है। वास्तव में सावरकरजी का मूल प्रतिपादन पढ़ने पर मन में कोई किंतु नहीं रहता। लेकिन भ्रम फैलाना, यही जिनका धंधा है, उन्हें यह बताने में कोई मतलब नहीं है। हालांकि, इस काल में सावरकरजी की भूमिकाओं के विषय में कुछ हिंदुत्वनिष्ठ लोगों में भी संभ्रम है। सावरकरजी का प्रतिपादन मूल रूप से पढ़े बिना मत बनाने का यह परिणाम है। सावरकरजी के विचारों और कृतियों की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए, प्रामाणिक मतभेदों का स्वागत होना चाहिए। मातृभूमि के प्रति अटल और विशुद्ध प्रतिबध्दता, अनेक विषयों का गहरा अध्ययन, सूक्ष्म आकलन करने की शक्ति, तीक्ष्ण विश्लेषक बुध्दि, रणनीति कुशलता जैसे अनेकों दुर्लभ गुण धारण करेनवाले सावरकरजी ने ये भूमिकाएं ली है, यह समझना चाहिए। उस समय के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर और पश्चातबुध्दी का सहारा लिए बिना सावरकरजी की इन 'विवादित' भूमिकाओं की समीक्षा करनी चाहिए।


वस्तुस्थिति का कथन यानि पुरस्कार!


सन् 1937 में कर्णावती (अहमदाबाद) में हुए अ. भा. हिंदु महासभा के सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में सावरकरजी ने निम्न वक्तव्य दिया था, ''आज तो नहीं माना जा सकता, कि हिंदुस्थान एकीकृत और विसंवाद से रहित राष्ट्र है। उल्टे हिंदुस्थान में हिंदू और मुसलमान नामक मुख्य दो राष्ट्र विद्यमान है।'' उपरोक्त वाक्य से पहले सावरकरजी कहते है, ''कई बचकाने राजनेता यह मानने की भयंकर गलती करते है, कि हिंदुस्थान पहले ही विसंवाद से रहित बना राष्ट्र है अथवा उस तरह की इच्छा करते ही बनेगा।  सद्भावना से प्रेरित लेकिन अविचारी ऐसे हमारे ये मित्र अपने सपनों को सत्य ही मानकर चलते है...लेकिन सच्ची बात यह है, कि सांप्रदायिक कहे जानेवाले मसले हिंदू और मुसलमानों के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय विरोध की विरासत मात्र है। सही समय आने पर आप ये मसले सुलझा सकोगे, लेकिन उनका अस्तित्व ही नकार कर आप उन्हें दबा नहीं सकते।'' इस्लाम की जड़ से अध्ययन करनेवाले इतिहास विशेषज्ञ सावरकरजी केवल अप्रिय सत्य कथन कर रहे थे, वे द्विराष्ट्र सिद्धांत का समर्थन नहीं कर रहे थे, यह दो वाक्यों के उपरांत पुनः स्पष्ट  होता है। मौजूदा स्थिति में संभव लक्ष्य के विषय में वे कहते है, ''जिसमें किसी को भी विशेष मताधिक्य अथवा विशेष प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा और किसी को भी वाज़िब से अधिक मोल देकर अपनी राजनिष्ठा खरीदनी ना पड़े, ऐसा हिंदी राष्ट्र बनाना।'' हिंदु महासभा के अध्यक्ष सावरकर, मुस्लिमों को दे रहे थे उससे अधिक कोई विशेष अधिकार हिंदुओं के लिए नहीं मांग रहे थे, यह इस संदर्भ में गौरतलब है।
सावरकरजी जब जीवित थे तब भी उनके भाषण के इस अंश पर आपत्ति की गई थी। इसलिए नागपूर स्थित साप्ताहिक 'आदेश' के कार्यालय में एकत्रित पत्रकारों को ता. 15 अगस्त 1943 को स्वयं सावरकरजी ने अपने वक्तव्य का स्पष्टीकरण किया था। ता.  23 अगस्त 1943 को मुंबई में दिए हुए साक्षात्कार में भी उन्होंने अपना रुख स्पष्ट किया था। ता. 28 अगस्त 1943 के साप्ताहिक 'आदेश' में यह साक्षात्कार प्रसिध्द हुआ था। इस साक्षात्कार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा इस प्रकार है - 'इस्लाम अपने जन्म से ही धर्मनिष्ठ कुराण-नीत राष्ट्र है... मुसलमान जहां जहां गए, वहां वहां वे राष्ट्र के तौर पर ही गए... मुसलमान और हिंदू इस तरह के दो राष्ट्र हिंदुस्थान में है। इस तरह जो चीज है, उसका वर्णन करना यानि मुसलमानों का देश तोड़कर देने का पाकिस्तानी दुराग्रह मान्य करना नहीं है... आज दो और दो सौ, अपने आपको हिंदुओं से अलग माननेवाले राष्ट्र हिंदुस्थान में बलपूर्वक घुसे हुए हो और हिंदुस्थान का विभाजन भी मांग रहे हो, फिर भी उस वस्तुस्थिति को केवल नकारने के डरपोक और कायर नीति से नहीं, बल्कि उस वस्तुस्थिति को समझकर, उस वस्तुस्थिति का सामनाकर, उसमें उलटफेर कर, आसिंधुसिंधू हिंदुस्थान में स्वतंत्र, अखंड एवं अविभाज्य हिंदुराष्ट्र ही कायम रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं...सबके आखिर में इच्छा ही राष्ट्र का अधिक प्रभावी और महत्त्वपूर्ण घटक होता है। वे (मुसलमान) यदि अपने आपको पराये समझते है, तो हम उन्हें क्यों कर अपने कहेंगे?' सावरकरजी ने इस स्थान पर 'राष्ट्र' शब्द का प्रयोग 'अपने आप को पृथक माननेवाला समाज' इस अर्थ में किया है। इस्लामी परिभाषा में मुस्लिम औरों से पृथक 'उम्माह' अथवा धर्मसमाज है। इस्लाम की प्राथमिक जानकारी रखनेवालों को भी इस्लाम के मूलगामी अध्ययनकर्ता रहे सावरकरजी के प्रतिपादन में कुछ आपत्तिजनक प्रतीत नहीं होगा।
जीना ने सावरकरजी के सिध्दान्त पर अंमल किया, यह कहना हास्यास्पद है। सावरकरजी के 1937 वाले भाषण से पूर्व – यानि 1930 में - सर मुहम्मद इक्बाल ने मुस्लिम लीग के अध्यक्ष पद से भाषण करते हुए निःसंदिग्ध रूप से कहा था, कि 'पंजाब, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत, सिंध और बलुचिस्तान का एक ही एक मुसलमान राज्य बनाना ही पश्चिम एवं उत्तर भारत के मुसलमानों का अंतिम ध्येय है, ऐसा मुझे लगता है।'


'भारत छोडो' की परिणति 'भारत तोडो' में


सन् 42 के आंदोलन को सावरकरजी ने समर्थन क्यों नहीं दिया, यह समझने के लिए उसकी पृष्ठभूमि समझनी होगी। ब्रिटिशों को भारत से तुरंत निकल जाना चाहिए, यह कल्पना गांधीजी ने ता. 19 अप्रैल 1942 के 'हरिजन' में छपे लेख में रखी थी। ता. 30 अप्रैल-1 मे 1942 को अलाहाबाद में आयोजित काँग्रेस कार्यसमिति की बैठक में युद्ध के संबंध में प्रस्ताव मीराबेन के मार्फत गांधीजी ने प्रस्तुत किया। उस प्रस्ताव में भी उन्होंने उपरोक्त कल्पना रखी थी। राजाजी और नेहरू ने उसे विरोध किया। आखिर नेहरू द्वारा तैयार किया गया प्रस्ताव पारित किया गया। (धनंजय कीर, महात्मा गांधीः पॉलिटिकल सेंट ऍंड अनआर्मड प्रॉफेट, पॉप्युलर प्रकाशन, मुंबई, 1973, पृ. 702)। गांधीजी के 'चले जाव' आंदोलन को राजाजी और काँग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना आझाद का विरोध था। ता. 13 जुलाई 1942 को नेहरू को हिंदी में लिखे एक पत्र में गांधी आझाद के बारे में कहते है, 'मुझे महसूस होता है, कि हम दोनों एक-दूसरे से दूर चले गए है। हिंदू-मुस्लिम और अन्य प्रश्नों पर  हम दूर जा रहे है। मुझे संदेह है, कि प्रस्तावित कृति से मौलाना साहब पूरी तरह से सम्मत नहीं है...इसलिए मैं सुझाव देता हूं, कि मौलाना अध्यक्षपद छोड़ दें लेकिन (कार्य) समिति में रहें, समिति तात्कालिक अध्यक्ष चुनें और सब एक साथ आगे बढें। एकता के बिना और शत-प्रतिशत सहयोग देनेवाले अध्यक्ष के बिना यह महान आंदोलन ठीक से नहीं चलाया जा सकता। यह पत्र मौलाना साहब को दिखाएं।' (द कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, इलेक्ट्रॉनिक बुक, प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नवी दिल्ली, 1999, खंड 83, पृ. 98)। इस प्रकार सन् 42 के आंदोलन को लेकर काँग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में ही एकमत नहीं था। अन्य दलीय नेताओं से इस बारे में सहयोग लेने का कोई प्रयास गांधीजी ने नहीं किया था।
सन् 42 के आंदोलन में कोई नियोजन नहीं था, यह उसका बड़ा दोष था। सन् 42 के आंदोलन पर इतिहासकार रमेश चंद्र मजुमदार ने निम्न प्रकार टिप्पणी की है - 'काँग्रेस नेताओं ने  'करो या मरो' का कठोर आवाहन किया था। लेकिन उन्होंने ना ही कुछ किया और ना ही वे मरे। सेनापति संभ्रमित था। नेतृत्व के अभाव में आम जनता बहादुरी से लढ़ी। मुस्लिम आंदोलन से दूर रहे। सितंबर 1942 तक आंदोलन समाप्त हुआ। बाद में समीक्षा करते हुए जय प्रकाशजी ने कहा, कि कार्यक्षम संगठन एवं कार्यक्रम के अभाव में यह आंदोलन नाकाम हुआ।' (हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूव्हमेंट इन इंडिया, खंड 3, फर्मा केएलएम प्रा. लि. कलकत्ता, 1977, पृ. 558)।
ता. 14 जुलाई 1942 को काँग्रेस कार्यकारिणी ने जो प्रस्ताव संमत किया था, उसमें एक तरफ ब्रिटिशों को भारत छोड़ने के लिए कहा था वहीं यह भी कहा था, कि दोस्त राष्ट्र चाहे तो अपनी सेना भारत में रख सकते थे। ब्रिटिशों का राज जिस सेना पर आधारित था, उस सेना को पीछे रखकर ब्रिटिशों को चले जाने के लिए कहना हास्यास्पद था। इसकी सावरकरजी और राजाजी ने कठोरतम आलोचना की थी। राज्यों को केंद्र से निकल जाने का अधिकार काँग्रेस मान्य न करें, अल्पसंख्यांक 'राज्य में राज्य' न कर सकें आदि मांगे मान ली जाएं, तो काँग्रेस से सन् 42 के आंदोलन के बारे में सहयोग करने हेतु सावरकरजी तैयार थे।(बालाराव सावरकर, अखंड हिंदुस्थान लढा पर्व, पृ. 93)। लेकिन सावरकरजी की अपील को काँग्रेस ने प्रतिसाद नहीं दिया।


सैनिकीकरण की भूमिका


 सावरकरविरोधी टोली ने खोज की है, कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना को विरोध करने हेतु और ब्रिटिश सेना को मदद करने सावरकरजी ने सैनिकीकरण की वकालत की।  इसके पीछे यह विचार दिखता है, कि जो तथ्य सूरज की रोशनी की तरह साफ है, उसको लेकर संभ्रम पैदा करने के लिए कोई वाक्य फेंककर देखना चाहिए, उसका प्रतिवाद कोई ना करें तो भविष्य में वही झूठ प्रचलित करना चाहिए। सावरकरजी से मिलने ता. 22 जून 1942 को सुभाषबाबू ने सावरकरजी से मुलाकात की। उस मुलाकात की रिपोर्ट ‘समग्र सावरकर साहित्य’ में दी है। 'सुभाषबाबू को ब्रिटिशों के चंगुल से छूटकर जापान-जर्मनी को जाना चाहिए, इटाली-जर्मनी के हाथों लगे हजारों भारतीय सैनिकों का नेतृत्व खुले तौर पर स्वीकारना चाहिए, हिंदुस्थान की संपूर्ण स्वतंत्रता की प्रकट घोषणा करनी चाहिए और जापान के युध्द में उतरते ही जो संभव हो उस मार्ग से ब्रिटिश सत्ता पर बाहर से आक्रमण करना चाहिए...यह पराक्रम और साहस करने के लिए जो दो-तीन लोग मुझे काबिल दिखते है उनमें आप एक है,' यह सावरकरजी ने सुभाषबाबू से कहा था।
ता. 28 मार्च 1930 को टोकियो में 'इंडियन इंडिपेंडन्स लीग' स्थापन करते हुए हिंदुस्थान की स्वतंत्रता के लिए सेना बनाने की पुकार करनेवाले रास बिहारी बोस से सावरकरजी का 1938 से पत्रव्यवहार चल रहा था। जापान हिंदु सभा के अध्यक्ष रास बिहारी बोस द्वारा की गई पूर्वसिध्दता के बल पर ही आगे सुभाषबाबू ने आझाद हिंद सेना बनाई। ता. 22 सितंबर 1939 को सावरकरजी को लिखे पत्र में रास बिहारी ने उनकी युध्द नीति को पूरा समर्थन दिया। दूसरा विश्वयुध्द जब जारी था, सावरकरजी युवाओं को ब्रिटिशों की सेना में जाने के लिए कहते थे। सन् 1940 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष पद से बोलते हुए सावरकरजी ने कहा, ''हमें ध्यान देना होगा, कि ब्रिटिश जो सेना खड़ी कर रहे है और औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित कर रहे है, वह अपने युद्ध के प्रयासों को सहाय्य कर रहे है, हिंदी लोगों की सहायता करने के महान उद्देश्य से नहीं। वे सब कुछ अपने उपयोग के लिए कर रहे है। हम इस युद्धप्रयासों में जो हिस्सा ले रहे है अथवा कम से कम विरोध नहीं कर रहे, वह इसलिए कि उसमें हमारा स्वार्थ है, ब्रिटिशों की मदद करने के महान उद्देश्य से नहीं।''
''आप पहलें शस्त्र चलाना सीखें। बाद में उनका प्रयोग कैसे और कब करना है, यह अवसर के अनुसार आप सहजता से तय कर पाओगे'' अथवा ''इस युद्ध में सहभागी होते समय हमारा भी अंतिम उद्देश्य यही है, कि हिंदू जगत् में सैनिकी वृत्ती और क्षात्रतेज तैयार होकर उसके माध्यम से अपनी स्वतंत्रता पाकर उसे संरक्षिता किया जा सकें'' अथवा ''स्वतंत्रता प्राप्ति और स्वतंत्रता की रक्षा हेतु ही मैं युवाओं से सेना में जाने के लिए कह रहा हूं। आज सेना का प्रशिक्षण लेकर अंग्रेजों की आज्ञानुसार रहना है, लेकिन बाद में क्या होगा, इसका आश्वासन मैंने नहीं दिया,'' इन और इसके जैसे सावरकरजी के कई वाक्यों का अर्थ जो ना समझें, उस मनुष्य की बुध्दी या तो मंद होगी या भ्रष्ट होगी!
हिटलर के यहूदी–विरोधी कार्यक्रम को सावरकरजी द्वारा समर्थन देने का आरोप निरा कपोलकल्पित है। यहूदियों पर हिटलर द्वारा किए जा रहे अत्याचारों की जानकारी होते हुए सावरकरजी द्वारा उसे समर्थन देने का कोई प्रमाण आरोप करनेवाले प्रस्तुत तो करें। इस्राएल की स्थापना को समर्थन देनेवाले सावरकर एकमात्र प्रमुख भारतीय नेता थे, यह ध्यान में रखना होगा।

इसी लेखमाला का अगला और अंतिम लेख....


स्वतंत्र त्रावणकोर को समर्थन


जुलाई 1946 में संविधान सभा चुनाव की चर्चाएं चल रही थी। सन् 1945-46 में हुए चुनाव में हिंदू महासभा पराजित हुई, फिर भी उसे सोलह प्रतिशत मत मिले थे। इसलिए निष्पक्ष विचारकों का कहना था, कि संविधान सभा में हिंदू महासभा को भी स्थान मिलें। हिंदू महासभा के नेताओं में से डॉ. श्यामाप्रसाद मुकर्जी संविधान सभा पर चुने गए। जब संविधान सभा के चुनाव चल रहे थे, तब उसे बाधित करने के लिए मुस्लिम लीग एवं अन्य धर्मांध मुस्लिम गुटों ने देश में कई स्थानों पर दंगे शुरू किए। मुंबई में दंगा शुरू होने के बाद पहले ही सप्ताह में 218 मारे गए और 653 जख्मी हुए। इन दंगों की ओर ध्यान दिए बिना काँग्रेस नेता केंद्र में मंत्रिमंडल की स्थापना हेतु वाईसराय से चर्चाएं कर रहे थे। उसके अनुसार 2 सितंबर 1946 को नेहरू और पटेल को मंत्रिपद की शपथ दिलाई गई। काँग्रेस के मंत्रियों ने मुस्लिम दंगेखोरों को नहीं रोका। उल्टे मुंबई की काँग्रेस सरकार ने गांधी जयंती के उपलक्ष्य में सावरकर सदन की तलाशी लेकर उनके सचिव ग. वि. दामले और अंगरक्षक अप्पा कासार को गिरफ्तार किया। ता. 14 जनवरी 1946 को 'फ्री हिंदुस्थान' नामक सावरकरवादी अंग्रेजी साप्ताहिक के संपादक को गिरफ्तार किया गया। काँग्रेस इतनी मुस्लिमप्रेमी बन गई थी, कि संविधान सभा में काँग्रेस के प्रस्ताव से 'अखंड हिंदुस्थान' शब्द निकाले गए।
ब्रिटैन के प्रधानमंत्री एटली ने घोषणा की, कि ब्रिटैन ने जून 1948 तक हिंदुस्थान छोड़ने का निश्चय किया है लेकिन यह अभी तक निश्चित नहीं हुआ है, कि हिंदुस्थान की सत्ता केंद्र सरकार के हाथों देनी है अथवा विभिन्न राज्यों के हाथों में देनी है। ब्रिटिशों की योजना संपूर्ण सिंध, संपूर्ण पंजाब और संपूर्ण बंगाल को समाविष्ट करने की थी और काँग्रेस की उसे मौन सम्मति थी। ता. 2 अप्रैल 1947 को जारी एक विस्तृत ज्ञापन में सावरकरजी ने कहा, ''अखंड हिंदुस्थान के विभाजन का षडयंत्र असफल करने के लिए पहले हमें उनके पाकिस्तान को दो पाटों में बांटना होगा। इस के लिए पश्चिम बंगाल इस हिंदू प्रांत का निर्माण करें, अगला कदम होगा चाहे जिस कीमत पर आसाम में घुसपैठ किए हुए मुसलमानों को खदेड़ना ताकि यह पूर्व पाकिस्तान दो हिंदू प्रांतों की कैंची में फंसेगा। तीसरा कदम पूर्व पंजाब इस हिंदू-सिक्ख प्रांत का निर्माण करना और सिंध के हिंदू बहुसंख्यक जिले मुंबई राज्य को जोड़ना। इस तरह दस बड़े हिंदू प्रांत एकत्र कर अखंड हिंदुस्थान का एक सुगठीत एवं बलिष्ठ राज्य निर्माण करें जो थोड़े ही समय में अलग होनेवाले पाकिस्तानी प्रदेश को भी अधिक परिणामकारक रूप से इस हिंदी संघराज्य को जोड़ देगा।''
जब देश का विभाजन हो रहा था, सावरकरजी हिंदुहित, अर्थात् राष्ट्रहित, साध्य करने का प्रयास कर रहे थे। हिंदू रियासतों की ओर सावरकरजी इसी दृष्टि से देखते थे। जून 1947 में कोल्हापूर की गद्दी पर शहाजी राजा का राज्यारोहण हुआ। उस समय भेजे संदेश में सावरकरजी लिखते है - "यह छत्रपति शिवाजी महाराज का सिंहासन महाराष्ट्र पर होनेवाले संभावित हिंदूविरोधी आक्रमण आमूलचूल निरस्त करने की ताकत शहाजी राजा को दें! सभी हिंदू रियासतों की सैन्य और वायु दल की ताकतें संगठित कर हिंदू जगत पर होनेवाला आक्रमण रोका जाएं तभी जो खोया है वह सबकुछ पुनः पाया जा सकेगा।" स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आनेवाली कांग्रेस की केंद्र सरकार हिंदूहित के लिए काम करेगी, इस पर दूरदर्शी सावरकरजी का बिल्कुल विश्वास नहीं था। इसलिए हिंदूहित साधनेवाली रियासतें उनके लिए निषिद्ध नहीं थी।
त्रावणकोर संस्थान के दिवाण सर सी. पी. रामस्वामी अय्यर और त्रावणकोर के महाराजा ने ता. 18 जून 1947 को त्रावणकोर संस्थान स्वतंत्र रखने की घोषणा की। त्रावणकोर की परिस्थिति और सर सी. पी. रामस्वामी अय्यर की पृष्ठभूमि जान लेना  आवश्यक है। अक्तूबर 1946 को कम्युनिस्ट लोगों ने रियासत के विरोध में विद्रोह करते हुए पुलिस और रियासत के कर्मचारियों की हत्या की थी। यह विद्रोह अय्यर ने कुचल दिया। भविष्य में शेष हिंदुस्थान में कम्युनिस्ट  विद्रोह करने की यह पूर्वतैयारी थी।
रियासत में कार्यरत काँग्रेसियों का स्वतंत्र त्रावणकोर को यद्यपि विरोध था, लेकिन आर. शंकर और ए. ए. रहीम जैसे काँग्रेसी नेताओं ने उस समय स्वतंत्र त्रावणकोर को समर्थन दिया था। स्वतंत्र त्रावणकोर को समर्थन देने के लिए सावरकरजी की आलोचना करनेवाली काँग्रेस ने शंकर को संविधान सभा की सदस्यता और 1962-64 के दौरान केरल का मुख्यमंत्रि पद दिया। ए. ए. रहीम इंदिरा गांधी की सरकार में केंद्रीय राज्यमंत्री और बाद में मेघालय के राज्यपाल बने। सावरकरजी की राजनीति के सूत्र – हिंदुहित साधना – को ध्यान में ले तो कोई आश्चर्य नहीं होता, कि उन्होंने इस घोषणा का समर्थन किया। सावरकरजी द्वारा अय्यर को प्रेषित संदेश पर्याप्त रुप से स्पष्ट है। वे लिखते है, 'अखंड हिंदुस्थान के हित की दृष्टि से ही त्रावणकोर को स्वतंत्र हिंदु रियासत रखने के आपके और महाराज की दूरदर्शी निर्णय को मेरा पूरा समर्थन है। निजाम ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा पहले ही की है तथा अन्य मुस्लिम रियासतें भी यही करेंगे, इसकी संभावना है। इस स्वतंत्रता को अबाधित रखने का पर्याप्त साहस रखनेवाले हिंदू रियासतों को तत्काल एकत्र आकर अपनी सैनिकी ताकत मजबूत करते हुए बाहर से आनेवाले हिंदू विरोधी आक्रामकों का प्रतिकार करने हेतु तथा अंदर से होनेवाला विश्वासघात नष्ट करने के लिए तैयार होना चाहिए। हिंदू विरोधी नेताओं के अधीन काम करनेवाली वर्तमान संविधान सभा हिंदू जगत् का विश्वासघात करते हुए मुस्लिमो की और मांगे मानने की संभावना है। इस परिस्थिति में संविधान सभा में सहभागी होनेवाले हिंदू रियासतों को संविधान सभा के ये हिंदू विरोधी निर्णय मान्य करने का बंधन नहीं स्वीकारना चाहिए।' होम रूल लीग के उपाध्यक्ष, मेधावी कानून विशेषज्ञ, कुशल प्रशासक, शिक्षाविद्, अछूतोंसहित सभी जातियों के हिंदुओं को मंदिरों में मुक्त रुप से प्रवेश देनेवाले, देवदासी प्रथा पर पाबंदी लगानेवाले, त्रावणकोर में शैक्षिक, औद्योगिक, जलविद्युत, पर्यावरण अनुकूल प्रकल्प खड़े करनेवाले, स्कूली बच्चों के लिए सर्वप्रथम माध्यान्ह भोजन शुरू करनेवाले, एक स्त्री को सर्वप्रथम जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त करनेवाले, कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद शिला का काम करनेवाले के रूप में सर सी. पी. रामस्वामी अय्यर विख्यात है। शायद सावरकरजी को लगा हो, कि गांधी-नेहरू-पटेल की तुलना में अय्यर हिंदु हित की रक्षा अधिक अच्छी तरह से कर सकेंगे।

 हिंदू समाज जहां सम्मान के साथ रह सकें, इस तरह का अखंड, शक्तिमान हिंदू राष्ट्र और सभी धर्मो के लोगों को समान अधिकार देनेवाला हिंदी (भारतीय) राज्य सावरकरजी को अभिप्रेत था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने अपने घर पर भगवा और तिरंगा दोनों ध्वज सहर्ष फहराए थे। सावरकरजी की राजनीति को समझ लें, तो समय समय पर उनके द्वारा ली गई भूमिकाओं का आकलन होगा।