हिंदुत्वनिष्ठ व्यक्ति और आंदोलन की एक रटी-रटाई छवि कुछ लोगों नें अपने मन में बना रखी है। उस छवि को छेद देनेवाले सावरकर इस चौखट में कहीं फिट नहीं थे, यही इन लोगों का असली दर्द है। हिंदुत्व और बुध्दिवाद एक-दूसरे के विरोधी है, यह इन्ही लोगों की बनाई हुई धारणा है। लेकिन सावरकरजी का बुध्दिवाद इनसे न संभलनेवाला है न हजम होनेवाला। साहित्य-नाटक-कविता जैसे क्षेत्रों पर हमारा ही एकाधिकार है, यह इन लोगों का घमंड है। लेकिन साहित्य की सभी विधाओं में बखूबी संचार करनेवाले एकमेवाद्वितीय साहित्यकार यानि पुन: हिंदुत्वनिष्ठ सावरकर! जहां जाएं वहां इनकी राह में सावरकर नामक यह मनुष्य बाधा बनता है। कोई चाहे जितनी कोशिश करें, सूर्य का ग्रास बनाना असंभव  है। सूर्य के तेज से अवसादग्रस्त होनेवाले लोग फिर सूरज पर थूकने लगते है।



इस देश में निधर्मीता का बुर्का पहननेवाले इस्लामवादी, वामपंथी, छद्म सेकुलर और भाड़े के पत्रकार सावरकरजी का इतना तिरस्कार क्यों करते है? उनकी निंदा करने में इतनी स्याही और शब्द क्यों खर्च करते है? उन्हें कभी अनुल्लेख से तो कभी मिथ्यारोप से क्यों मारना चाहते है? सावरकरजी ने इन लोगों का क्या बिगाड़ा है जो उनका आत्यंतिक तिरस्कार करते है? इन प्रश्नों के उत्तर सीधे सरल है। सावरकर ने इन सभी हिंदूद्रोही लोगों की मुश्कील करते हुए सही में उनकी बात बिगाड़ दी है। इस देश से हिंदुत्व को मिटाने का बीड़ा इन सब लोगों ने उठाया है।


इतने साल बुराई करने के बाद भी हिंदुत्व-कुल देश के केंद्र तक पोहोंचने के कारण इन लोगों के पेट में मरोड़ आता है। फिर इसमें कौनसा आश्चर्य है, कि सावरकरजी के नाम से, जो इस कुल के कुलगुरू है, वे विषवमन करेंगे? हिंदुत्वनिष्ठ व्यक्ति और आंदोलन की एक रटी-रटाई छवि इन लोगों नें अपने मन में बना रखी है। उस छवि को छेद देनेवाले सावरकर इस चौखट में कहीं फिट नहीं होते, यही इन लोगों का असली दर्द है। हिंदुत्वनिष्ठ लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, यह इन लोगों का चहेता सिध्दान्त है! लेकिन क्रांतिकारकों के मुकुटमणी कौन है तो हिंदुत्वनिष्ठ सावरकर! 'हिंदुत्वनिष्ठ अर्थात् दकियानुसी विचारोंवाले' इस तरह का शोर ये लोग मचाते है। लेकिन इनकी प्रागतिकता बिल्कुल फिकी लगें, इस तरह सावरकर का विचार और आचार! हिंदुत्व और बुध्दिवाद परस्परविरोधी मूल्य है, यह इन लोगों की धारणा है। किंतु सावरकर का बुध्दिवाद इनसे न संभलनेवाला है न हजम होनेवाला। साहित्य-नाटक-कविता जैसे क्षेत्रों पर हमारा ही एकाधिकार है, यह इन लोगों का घमंड है। लेकिन साहित्य की सभी विधाओं में बखूबी संचार करनेवाले एकमेवाद्वितीय साहित्यकार यानि पुन: हिंदुत्वनिष्ठ सावरकर! जहां जाएं वहां उनकी राह में सावरकर नामक यह मनुष्य उनकी बाधा बनता है। चाहे जितनी कोशिश करें, सूर्य का ग्रास बनाना असंभव है। सूर्य के तेज से अवसादग्रस्त होनेवाले लोग फिर सूरज पर थूकने लगते है। मणिशंकर अय्यर, ए. जी. नूरानी, शमसुल इस्लाम इन सूरज पर थूकनेवालों में से कुछ नाम है। हम लगातार किचड़ फेंकते रहें, तो कीचड़ के कम से कम कुछ कण तो सावरकर की छवि से चिपकेंगे, इस विश्वास से ये लोग लोग हर वर्ष अमूमन म. गांधीजी की पुण्यतिथि के अवसर पर अपना रातीब डालते है। इन दिवाभीतों की पंक्ति में इस वर्ष निरंजन टकले नामक एक पोंगा पत्रकार बैठा है।

सावरकरजी पर आरोप


कोची से प्रकाशित 'द वीक' साप्ताहिक पत्रिका के ता. 24 जनवरी 2016 के अंक में वीर सावरकर के बारे में कुछ गंभीर आरोप किए गए  है। यद्यपि यह पहले ही सिध्द हो चुका है, कि ये आरोप पुराने और बिल्कुल झूठे है, फिर भी बार-बार उन्हें लोगों पर लदा जाए तो हो सकता है, कुछ लोगों को लगे, कि शायद उनमें कुछ तथ्यांश हो। अगर इस पोंगा पत्रकार ने सावरकर साहित्य और सावरकर चरित्र, जो आसानी से उपलब्ध है, पढ़ने की जहमत उठाई होती, तो उसे यह तथाकथित शोधकार्य करने की जरूरत न होती। चूंकि आम पाठकों को यह सब पढ़ने की फुर्सत और सुविधा नहीं होती, इसलिए पोंगा पत्रकार के निराधार आरोपों की साधार खबर लेना आवश्यक है। सावरकर-विरोधी टोली के आमतौर पर चार प्रकार के आरोप थे हैः
1)    अंडमान में हुए यातना-कष्टों के कारण सावरकर का मनोबल टूट गया। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार के पास एक के बाद एक दया के आवेदन किए और अपनी रिहाई करवा ली। उनके 'मेरा आजीवन कारावास' नामक ग्रंथ में इस दया के आवेदनों का उल्लेख नहीं है। अंडमान में उन्होंने कोल्हू खींचा था इस तरह का उल्लेख उनके अधिकृत जेल-टिकट पर नहीं है। औरों को शायद ही मिले ऐसी सहूलियतें उन्हें अंडमान में मिलती थी।
2)    अंडमान से छूटने के बाद भी उनका आचरण ब्रिटिशों द्वारा निर्धारित किए गए नियमों के अनुरूप था। काँग्रेस को विरोध करना और हिंदू-मुस्लीमों में वैमनस्य बनाना, यह सावरकर और वाईसराय लिनलिथगो का साझा कार्यक्रम था। 'भारत छोडो ' आंदोलन में उनकी भूमिका संदेहास्पद और ब्रिटिशों को साहाय करनेवाली थी। हिटलर के यहुदी विरोधी कार्यक्रम को उनका समर्थन था। सुभाषचंद्र बोस की सेना को विरोध करने हेतु तथा ब्रिटिश सेना को मदद करने के लिए उन्होंने सैनिकीकरण का समर्थन किया।
3)    सावरकर ने द्विराष्ट्र सिध्दांत रखा। वे अखंड भारत के पुरस्कर्ता थे, इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। तिरंगा ध्वज को उनका विरोध था।
4)    गांधीहत्या के षडयंत्र में सावरकर शामील थे, यह न्या. कपूर आयोग ने साबित किया है।


अक्ल की दुश्मनी


अपने पांव अपने ही गले में फंसाने का अद्भूत कौशल इस पोंगा पत्रकार ने कैसे साध्य किया है, इसका उदाहरण देखकर हम आगे बढ़ते है। सावरकरजी की कारावास इतिहास दर्शिका पर (जेल हिस्टरी टिकट पर) उन्हें कोल्हू से जोताने का उल्लेख नहीं है, यह लिखते हुए यह पोंगा पत्रकार सूचित करता है, कि यह अमानुष सज़ा सावरकरजी को दी नहीं गई। वह लिखता है, कि अन्य राजनैतिक बंदियों की तुलना में सावरकर को आसान दंड़ मिले। इस लेख में उसने शमसुल इस्लाम की पुस्तक से सावरकरजी की एक 'मर्सी पेटिशन' (दया याचिका) का चित्र उठाकर छापा है। असली शब्द 'पेटिशन' (आवेदन, अर्जी) है, 'मर्सी' (दया) शब्द कहीं नहीं है। अर्थात् खुबी से उसकी घुसपैठ की गई है। इस आवेदन का चुनिंदा हिस्सा बोल्ड किया गया है। सावरकर को कोल्हू से जोताने का स्पष्ट उल्लेख, अन्य बंदियों की तुलना में उन्हें दी गई अधिक कठोर सज़ाओं के विवरण इस आवेदन में है। लेकिन इसे अर्थात् बोल्ड नहीं किया गया। सावरकर भाईयों को कोल्हू से जोताने की उनके सह-बंदी रहे बारींद्र घोष की गवाही यही पोंगा पत्रकार अन्यत्र देता है। मराठी नाम धारण करनेवाला यह पोंगा पत्रकार महाराष्ट्र के वैचारिक प्रवाहों के बारे में घोर अज्ञानी है। सावरकर के बारे में और हिंदुत्व के विषय में कटूक्ती करने में जिनका जीवन गुजरा, 'प्रगतिशील, परिवर्तनवादी' (संक्षिप्त में समाजवादी) लोगों के साथ जिनका अक्सर उठना-बैठना था, उन य. दि. फडके को इस पोंगा पत्रकार ने'कर्मठ सावरकरवादी' की उपाधि प्रदान की है। पोंगा पत्रकार द्वारा अक्ल की इस दुश्मनी को देखकर बेचारे फडके ने 'हाय रे मेरी किस्मत' कहा होता!

कठोरतम सज़ा सावरकरजी को!  

           
अंडमान के नियमों के अनुसार छह महिनों बाद बंदियों को जेल से बाहर छोड़ा जाता था। अंडमान द्वीप पर बसी बस्तियों में पत्नी-बच्चों के साथ रहने की उन्हें छूट मिलती थी। सेल्युलर जेल में आने से लेकर लगातार तीन वर्षों से अधिक किसी को भी एकातंवास में नहीं रखा जाता। यह नियम सावरकरजी को लागू नहीं किया गया। उन्हें पूरे ग्यारह वर्ष उस नर्क में रखा गया। उन पर नज़र रखने के लिए सबसे कठोर पठान वार्डर नियुक्त किया जाता था। खतरनाक बंदियों को पहनाए जानेवाला 'डी' (डेंजरस) बिल्ला उनके गले में लटकाया गया। एक कोनेवाली ऐसी कोठरी में उन्हें रखा गया जो जेलर बारी के बंगले से उसे आसानी से दिखें। आरंभ में ही उन्हें छह महिनों तक एकांतवास भुगतना पड़ा। ता. 16 अगस्त 1911 के दिन उन्हें पहली बार कोल्हू से जोता गया। दिसंबर 1911 में पंचम जॉर्ज के राज्यारोहण के उपलक्ष्य में  कई बंदियों को छोड़ा गया अथवा उनकी सज़ा में रियायत दी गई। लेकिन सावरकरजी के विषय में ना रिहाई ना रियायत! बाद में वर्ष 1920 में सावरकरजी के साथ और उनके बाद आजीवन कारावास की सज़ा भुगतने आए, लगभग 30 लोगों के अलावा सभी राजबंदियों को छोड़ा गया। लेकिन सावरकरजी के ही शब्दों में, 'हम ज्यों के त्यों पड़े रहे, एक दिन की भी रियायत नहीं मिली।' ता. 8 जून 1914 को सावरकरजी ने काम करने से नकार दिया, इसलिए उन्हें आठ दिनों तक हथकड़ी बांधकर खड़े रहने की सज़ा दी गई। ता. 16 जून 1914 को पुन: नकार देने के कारण चार महिनों तक उन्हें शृंखला बेडियों में बंद किया गया। ता. 18 जून को पुन: नकार देने के कारण और अधिक सख्त सज़ा के तौर पर दस दिनों तक आड़े-बेडियों में जकड़कर रखा गया। बीमार बंदियों को दूध दिया जाता था, लेकिन बीमार सावरकरजी को केवल कच्ची रोटी अथवा पानी-चावल दी जाती। ऐसे कठोर दंड़ सावरकरजी को कम से कम 20-22 बार हुए। ता. 2 नवंबर 1916 को जेल के दूसरे वर्ग में उनकी पदोन्नति हुई, फिर भी अपने भाई से बोलने की अनुमति अथवा शारीरिक श्रम से मुक्ती नहीं मिली। नियमानुसार पाच वर्षों बाद रिश्तेदारों से मुलाकात की अनुमति थी, लेकिन तात्याराव और माई की मुलाकात ता. 30 मे 1919 को – यानि आठ वर्षों बाद हुई। नवंबर 1920 में सावरकर परिवार को दोनों सावरकर भाईयों से मिलने की अनुमती मिली।
उस समय खाद्य व्यंजनों और रुमालों से भरी ट्रंक, जो परिवार के सदस्य ले गए थे, जेल अधिकारियों ने ले जाने नहीं दी बल्कि उसे जब्त किया। यह साफ है, कि सावरकर के साथी अन्य क्रांतिकारकों का विचार करें तो ब्रिटिश सरकार सावरकर के साथ रंजिश भावना से बर्ताव कर रहा था। अलीपूर विस्फोट कांड के आरोपी हेमचंद्र दास और बारिंद्र कुमार घोष वर्ष 1908 में अंडमान पहुंचे। सन् 1920 में ब्रिटिशों ने उन्हें क्षमा करते हुए छोड़ दिया। लाहौर कांड के आरोपी सचींद्रनाथ सन्याल ने सावरकर की तरह ही सरकार से निवेदन किया था, कि 'राष्ट्रहित में आंदोलन करने की छूट दें तो हम गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन का मार्ग क्यों अपनाएंगे। उन्हे छोड़ दिया गया लेकिन सावरकरजी को नहीं। अन्य राजबंदियों की तुलना में सावरकर को सर्वाधिक कठोर सज़ाएं दी गई, यह वस्तुस्थिति होने के बावजूद उसके विपरीत हुआ है, यह कहना सफेद झूठ है।
अंडमान के सहबंदियों को संगठित करनेवाले, उन्हें लिखना-पढ़ना सीखानेवाले, उनकी हड़तालें करवानेवाले, स्वयं काम करने से नकार देनेवाले, बारी को द्वंद्वयुध्द में पराजित कर उसके मुंह पर रुमाल फेंकनेवाले, अंडमान शुध्दी करनेवाले, हिंदी का प्रसार करनेवाले, अंडमान की परिस्थिति के बारे में बाहर खबरें भेजनेवाले, पूरे दिन मेहनत करने के बाद थका हुआ शरीर लकड़ी की बल्ली पर टिकते ही प्रति महिना एक इस तरह पूरे वर्ष प्रमुख उपनिषदों पर चिंतन करनेवाले, सादे कागज-पेन्सिल के बिना जेल की दीवारों पर पांच हजार पंक्तियों का उदात्त काव्य लिखनेवाले और उस सबको कंठस्थ करनेवाले, मृत्युशय्या पर पड़े हुए धीरोदात्त काव्य रचनेवाले सावरकर का मनोबल टूट गया था, इस आरोप के लिए 'नीच' से अधिक सौम्य शब्द नहीं सूझता।
ब्रिटिश अधिकारी सावरकर को लेकर विशेष एहतियात और अतीव दुष्टता रखते थे। सावरकर भाईयों को छोड़ना ना पड़े, इसके लिए ब्रिटिश सरकार किस तरह जी-जान से प्रयास कर रही थी, यह देखने जैसा है। मुंबई सरकार के 'सोर्स मटेरियल फॉर अ हिस्टरी ऑफ फ्रीडम मूव्हमेंट इन इंडिया, खंड 2' प्रकाशन में निम्न तीन संदर्भ मिलते है -
1) मुंबई सरकार सिफारस करती है, कि गणेश दामोदर सावरकर एवं विनायक दामोदर सावरकर को सज़ा में कोई भी छूट न दी जाएं। (पृ. 467)।
2) दिल्ली सरकार पूरी तरह से सहमत है, कि सार्वजनिक सज़ामाफी का कोई भी लाभ सावरकर भाईयों को ना मिले - 8 दिसंबर 1919, पृ. 469।
3) मुंबई सरकार के गृह विभाग का पत्र क्र. 1106/36 ता. 29 फरवरी 1921 - गवर्नर काउन्सिल का मत है, कि सावरकर भाईयों को अंडमान से भारत में न भेजा जाएं, क्योंकि ऐसा करने से उनकी रिहाई के लिए आंदोलन को बल मिलेगा।


राजबंदियों की रिहाई के लिए प्रयासरत  


राजबंदियों की रिहाई के लिए उन्होंने कौन से और क्यों प्रयास किए, इसका विस्तृत विवेचन सावरकर ने 'माझी जन्मठेप' पुस्तक में किया है। पोंगा पत्रकार के कहे अनुसार उन्होंने सरकार को दिए हुए आवेदन अपनी पुस्तक में दबाकर नहीं रखे। क्योंकि ऐसा करना उन्हें बिल्कुल लज्जास्पद प्रतीत नहीं होता था। उल्टे उन्हें यह मातृभूमि के हित में ही लगता था। सन 1920 में अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर कर अपनी रिहाई करवाने का अवसर राजबंदियों को मिला। सावरकर का यह मत, कि इस तरह हस्ताक्षर करते हुए राजबंदियों को रिहा होना चाहिए सबको मंजूर नहीं था। असहमत राजबंदियों को उन्होंने कैसे समझाया, यह उनके ही शब्दों में - 'अन्य किसी भी भावी और राष्ट्रीय हित के अनुकूल शर्त मानने के लिए सबको मैं बताता रहा। शिवाजी-जयसिंग, शिवाजी-अफज़ल, चमकोर के उपरांत पलायन में श्री गुरू गोविंद और स्वयं श्रीकृष्ण और अन्यान्य उदाहरणों द्वारा मैं सबके मन में यह उतार रहा था, कि ऐसे प्रसंगों में ऐसी शर्तें लिखवाकर देना ही कुल मिलाकर राष्ट्रहित में है। जो मानी लोग हठी थे, उन्हें स्वाभाविक ही यह मंजूर नहीं था। इतने कष्ट सहन करने के उपरांत भी जिनकी बान तीलमात्र नहीं घटी थी, ऐसे उन वीरों को मुझे विरोध करते हुए देखकर मुझे अपने देश के भविष्य को लेकर और अधिक आशा होने लगती। लेकिन आखिर में मैं उन्हें यह राजनीतिक नीति समझा सका, कि वैसे करना ही उचित था और राजबंदियों की रिहाई के समय सबने उस अनुबंधपत्र पर आंख मूंदकर हस्ताक्षर करते हुए जेल का ताला एक बारगी तोड़ दिया।'
सावरकरजी ने अपनी भूमिका निम्न अनुसार निःशंक होकर बताई है - 'अंडमान में जो कुछ राष्ट्रहित साधा जाएगा वह इतना महत्त्वपूर्ण कभी भी नहीं होगा जितना कि मुक्त होकर हिंदुस्थान में आकर साधा जा सकेगा। लेकिन रिहाई के लिए किसी भी तरह का चाटुकारिता का बर्ताव जो विश्वासघाती, निंदायोग्य, नीच और देश अथवा जाति के स्वाभिमान को कलंकित करें, कभी भी समर्थनीय नहीं होगा। क्योंकि उससे होनेवाली रिहाई राष्ट्र के लिए अधिक हितकारक होने की बजाय अपने उदाहरण से अधिक अनीतिमान और राष्ट्रघातक ही होनेवाली थी। तो ऐसा आचरण टालते हुए अगर रिहाई होने का निश्चित अवसर मिलता हो, तो उसे साधना चाहिए। यह अवसर मिलने तक जो परिस्थिति है उसी में जो राष्ट्रहित साधा जा सकेगा, उसे साधने का प्रयास करते हुए दिन निकालने होंगे। इसमें भी  यथासंभव जिन पर सरकार का अधिक उग्र दोष एवं कड़ी नजर नहीं है, उनसे तब तक वे कृतियां करवानी चाहिए। जब अपने अलावा कोई और उस स्थिति में संभवनीय सार्वजनिक आंदोलन करने योग्य न हो अथवा इच्छुक ना हो, तब वे प्रकरण स्वयं करने चाहिए। रिहाई की संभावना दिखें तो जानबूझकर उसे नहीं गंवाना। लेकिन यह निश्चित संभावना ना हो तो केवल आस लगाकर डरपोक बनकर 'नहीं तो नहीं छोड़ेंगे' कहते हुए अंडमान में अपनों को दी जाती हुई यातनाएं चुपचाप नहीं देखनी है।' इस पर टिप्पणी करने की कोई जरूरत नहीं।
अंडमान की जेल से राजबंदियों की (केवल अपनी नहीं!) रिहाई हो, इसके लिए सावरकर ने दो तरह से प्रयास किए। उनके क्रांतिकारी मित्रों ने उनकी रिहाई करने का प्रयास किया था। इसके लिए जर्मनी की साहायता प्राप्त की थी जिसके परिणामस्वरूप जर्मनी का 'एम्डेन' नामक युध्दपोत अंडमान के आसपास मंडराने लगा था। राजबंदियों की रिहाई के लिए सावरकरजी ने दूसरा मार्ग चुना ब्रिटिशों को आवेदन भेजने का! सभी राजनैतिक बंदियों की रिहाई हो, इसके लिए जनता की ओर से सरकार को सार्वजनिक तौर पर आवेदन भेजे जाएं, इस तरह का निर्देश ता. 3 मार्च 1915 को छोटे भाई डा. नारायणराव को लिखे पत्र में सावरकरजी ने की थी। ये सारे पत्र 'अंडमान के अंधकार' नाम से प्रसिध्द हो चुके है। इस आग्रह के कारण ही राजनैतिक बंदियों की मुक्ती के लिए स्थान स्थान पर प्रांतिक परिषद आयोजित होकर हजारों हस्ताक्षरों के आवेदन सरकार को भेजे गए। राजनैतिक बंदियों की रिहाई के लिए जनता द्वारा सरकार को सार्वजनिक आवेदन देने चाहिए, इसके पीछे सावरकरजी की और एक भूमिका थी। ता. 5 अगस्त 1917 को अपने छोटे भाई को लिखे पत्र में सावरकर लिखते है, 'ऐसे आवेदन न हो तो मैं समझूंगा, कि मातृभूमि के लिए जो लड़े है उनका स्मरण करने का साहस जिनमें ना हो अथवा जिन्हें वैसी इच्छा ही नहीं होती ऐसे लोगों में लौटना तो किस लिए? ऐसे लोगों में लौटने में मुझे शर्म होगी।' पौने लाख हस्ताक्षरोंवाला आवेदन सरकार को दिया गया है, यह जानने के बाद ता. 6 जुलै 1920 को भेजे हुए पत्र में वे लिखते है, 'कम से कम इस आवेदन ने राजनैतिक बंदियों और जिस कार्य के लिए वे लड़े उस कार्य की नैतिक प्रतिष्ठा बढ़ी है, इसमें संदेह नहीं। अब वास्तव में हमारी रिहाई होनी हो तो उसका कुछ मतलब प्रतीत होगा।' इस तरह के सार्वजनिक आवेदन हो, इसके लिए प्रयासरत सावरकरजी का स्वाभिमान ता. 3 मार्च 1915 के पत्र में स्पष्ट रूप से दृगोचर होता है। वे लिखते है, 'जिन्हें हम नहीं चाहिए, ऐसे लोगों के पास बिनबुलाए जाने की हमारी बिल्कुल इच्छा नहीं। हम दया की याचना नहीं करते।'
राजबंदियों की रिहाई हो इसलिए सावरकर कितने निःस्वार्थ भाव से प्रयास कर रहे थे, इसका नमूना उनके द्वारा पहले विश्वयुद्ध के समय गवर्नर जनरल को भेजे पत्र में मिलता है। सावरकरजी ने लिखा था, कि ब्रिटिशों द्वारा दिया जानेवाला देसी स्वराज्य और राजबंदियों की रिहाई अलग अलग नहीं है बल्कि एक को सफल होना हो तो दूसरे के साथ ही उनकी योजना होनी चाहिए। वे कहते है, 'यह आवेदन भेजने में मेरा मुख्य उद्देश राजबंदी वर्ग की रिहाई ही है, इसलिए स्वयं मुझे ना छोड़ें तो भी मैं असंतुष्ट नहीं रहूंगा। उल्टे मुझे छोड़ना पड़ेगा इस कारण अगर क्वचित राजबंदियों को आमतौर पर क्षमा ना किया जाता हो, तो मुझे ना छोड़कर जिन सैंकड़ों लोगों को छोड़ना संभव हो उन्हें ही अगर सरकार छोड़ दें तो भी मुझे उसमें वास्तविक खुशी होगी।' इस आवेदन को लिखते समय सावरकरजी की शारीरिक स्थिति कैसी थी? मार्च 1917 में उनका वजन 119 पौंड था, वह अगस्त 1918 में 98 पौंड हुआ था।'दिन ब दिन इस जड़ देह का क्षरण हो रहा है, ' इस तरह का दिल को पसीज देनेवाला एक वाक्य उन्होंने इसी दौरान अपने छोटे भाई को लिखा था।

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अंडमान के अंधकार में होनेवाले शारीरिक और मानसिक यातनाओं पर, तथा ब्रिटिशों की काईयां नीतियों पर,   श्रीकृष्ण के तत्त्व और नीति का अवलंब करते हुए ही सावरकरजी ने मात की। मृत्यु उपरांत जहां जाना हो, वहां अच्छा इंतजाम हो, इसलिए मैंने प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण से पहचान पत्र लिया है, यह उन्होंने अंडमान में मृत्युशय्या पर पड़े हुए कविता में यूं ही नहीं लिखा था! विदेशी विरोधक सावरकरजी को पूरी तरह से पहचानते थे इसलिए उन्होंने सावरकरजी को यथासंभव जेल में बंद रखा। जो बात विदेशी समझ सकें, क्या वह अपने लोग समझ सकेंगे?