वीर सावरकर से कठोर वैचारिक मतभेद रखनेवाले समकालीन काँग्रेसजन और कम्युनिस्ट-समाजवादी लोगों ने भी कभी उनकी देशभक्ति अथवा निर्भयता को लेकर शक नहीं किया था। महात्मा गांधी ने 1944 में कहा था,  'त्याग हम दोनों को एकत्र लानेवाली कड़ी है'। राजाजी ने 1937 में उनका गौरव करते हुए कहा था, 'सावरकर धैर्य, शौर्य, निर्भयता एवं प्रखर राष्ट्रभक्ति के प्रतीक है और भारतीय जनता की स्वतंत्रता की आकांक्षा प्रज्वलित करने के लिए महान परिश्रम सहनेवाले वे अग्रेसर नेता है'। 'मेरे स्फूर्तिदाता निर्भय पुरुष' इन शब्दों में भाई मानवेंद्रनाथ रॉय ने सावरकर का गौरव किया था। सावरकर का निधन होने के बाद लोक सभा द्वारा उन्हें श्रध्दांजली दी अर्पित की जाए, यह प्रस्ताव रखनेवाले लोक सभा के दो सदस्यों में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रा. हिरेन मुखर्जी थे, यह गौर करने लायक है। सावरकरजी के देशभक्ति और निर्भयता इन सर्वमान्य गुणों के बारे में संदेह करनेवाला लेख सर्वप्रथम 'फ्रंटलाइन' (7 अप्रैल 1996) नामक अंग्रेजी पत्रिका ने प्रकाशित किया था। तब से इस तरह का लेखन बार-बार किया जा रहा है। यह इस बात का निदर्शक है, कि पिछले बीस वर्षों में हमारे सार्वजनिक जीवन का स्तर कितना गिर गया है। 'सावरकर यानि साहस और देशभक्ति का समीकरण' इस तरह के उद्गार जिनके बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने निकाले थे, उन सावरकरजी की देशभक्ति के, निर्भयता के प्रमाण देनेवाला लेख लिखना पड़ता है, इससे अधिक इस देश का दुर्भाग्य क्या होगा?
  अंडमान से छूटने के बाद सावरकरजी का आचरण नियमों के अनुरूप था, अंडमान से छूटने के बाद सावरकर ब्रिटिशों के अनुकूल हुए, यह सावरकरजी से तिरस्कार करनेवाली टोली का आरोप है। इस लेख में सावरकरजी द्वारा रत्नागिरी में वास के दौरान किए गए ब्रिटिशविरोधी राजनैतिक काम का जायजा लेंगे।

   
अंडमान से रिहाई ब्रिटिशों की कृपा नहीं!

   
सन् 1919 में ब्रिटिश सरकार ने अंडमान में कैदी-बस्ती बंद करने का निर्णय किया था। सावरकरजी की रिहाई करने की मांग को पूरे देश में बल मिल रहा था। लेकिन ब्रिटिशों को सावरकरजी को छोड़ना ही नहीं था। इसलिए ता. 2 मई 1921 को अंडमान से उनकी रिहाई होने के बाद उन्हें आठ दिनों तक कोलकाता के अलीपूर जेल में एवं बाद में मुंबई लाकर फिर रत्नागिरी की जेल में निर्मनुष्य कोठरी में रखा गया। अंडमान से रिहाई हुई, उस समय सावरकरजी को दूध और लिखने की सामग्री मिलने लगी थी। साथ ही उन्हें जेल के अहाते में घूमने-फिरने की, औरौं से मिलने की छूट मिलने लगी थी। ये सारी रियायतें रत्नागिरी के जेल में हटाई गई। दिसंबर 1923 में येरवडा जेल में उनकी रवानगी की गई। ता. 6 जनवरी 1924 को उन्हें येरवडा जेल से निम्न दो शर्तों पर मुक्त किया गया - 1) पाच वर्षों तक प्रकट अथवा अप्रकट रूप से  राजनीति में हिस्सा नहीं लेना। 2) सरकार की आज्ञा के बिना रत्नागिरी जिले की सीमा के बाहर नहीं जाना। रत्नागिरी में उस समय ना रेलवे थी, ना टेलिफोन की सुविधा। उद्देश्य यह था, कि बाहरी दुनिया से सावरकरजी का न्यूनतम संपर्क हो! ब्रिटिश सरकार ने सावरकरजी को जेल से मुक्त किया, फिर भी उन पर जासूसों का पहरा नहीं हटा था। इसके अलावा अपने गुर्गों के मार्फत सरकार ने सावरकरविरोधी प्रचार चलाया था। सावरकर पर बंधन पाच वर्षों तक ही थे, फिर भी सरकार ने पांच बार यह अवधि बढ़ाई। बिना शर्त रिहाई होने के लिए आखिर 10 मई 1937 का दिन आना पड़ा। सावरकरजी ने ब्रिटिशों से समझौता किया होता, तो ब्रिटिशों ने उन्हें कब का मुक्त किया होता।  

      
रत्नागिरी में ब्रिटिशविरोधी राजनैतिक कार्य


राजनीति में हिस्सा लेने पर पाबंदी होने के बावजूद रत्नागिरी में मुकाम के दौरान सावरकरजी बड़े कौशल से ब्रिटिशविरोधी राजनैतिक काम करते रहे, इसका यकीन रत्नागिरी में उनके सन्निध रहे लोगों द्वारा लिखे गए संस्मरणों और बालाराव सावरकर लिखित सावरकर चरित्र का 'रत्नागिरी पर्व' पढ़ने से होता है।
 रत्नागिरी के 'नवशिक्षण' पत्र के संपादक और सावरकरजी के साथ लगभग 12 वर्षों तक रहे आत्माराम गणपत सालवी गुरुजी ने 'स्वा. सावरकरांच्या सहवासात' नामक दो भागोंवाली (प्रकाशन वर्ष क्रमशः 1976 और 1982) पुस्तक लिखी है। सालवी लिखते है (भाग 2, पृ. 7, 8), 'तात्याराव सामाजिक आंदोलन करते थे, फिर भी अंग्रेजी सत्ता के विरुध्द उनकी प्रबल इच्छाशक्ती ज्यों की त्यों जागृत थी। राजनैतिक बंधनों के कारण वे बाहरी तौर पर सामाजिक आंदोलन कर रहे थे, फिर भी मौका पाकर सही व्यक्ति मिले, तो अंग्रेजों पर धाक जमाने के लिए बम विस्फोट, गोलियों की बौछार करवाने के लिए बढ़ावा देते थे... श्री. बडी तथा वामनराव चव्हाण, वासुदेव बलवंत गोगटे, वासुदेव पवार, आप्पा कासार, वासू हर्डीकर जैसे निडर जवानों को छांटकर सशस्त्र क्रांति का मोर्चा उन्होंने जीवंत रखा था। इन दो मोर्चों के साथ-साथ गुप्तवार्ता प्राप्त करने के लिए एक मोर्चा खोल रखा था। जिले के मुख्य अधिकारी, पुलिस विभाग में अपने भरोसेमंद लोग रखे थे। कुछ एक को अनुकूल बनवाया था। उस दौरान जिलाधिकारी के गुप्त कार्य के आज्ञापत्र जारी करवानेवाला व्यक्ति देशप्रेम से अभिभूत होकर मदद कर रहा था। वहीं पुलिस विभाग में सावरकरजी के विरुध्द होनेवाली गतिविधियों की खबर तात्याराव को ऐसे ही एक अन्य व्यक्ति से मिलती थी... उनके रिपोर्ट पुलिस विभाग के पास जाते थे जिनमें सावरकरजी के बारे में प्रतिकूल कुछ नहीं होता था। इसलिए अधिकारी यह दर्ज करने के लिए कहते थे, कि सावरकरजी ने सरकारविरोधी वक्तव्य किया था, लेकिन वे यह आशंका व्यक्त करते, कि वे बोले नहीं है तो कैसे दर्ज करें। उन्हें पदोन्नति देने, पुरस्कार देने के लालच दिखाए गए, लेकिन देशभक्ति से, तात्याराव के प्रति प्यार से सराबोर ये मन विचलित नहीं हुए। सावरकरजी को पुनः अंडमान में फंसाने के लिए तत्कालीन जिलाधिकारी श्री. गिलिगन, जिला पुलिस अधिकारी ओ'सलिवन काफी प्रयास कर रहे थे।'

 एक रॉयवादी कार्यकर्ता की गवाही


नारायण सदाशिव बापट तथा कवी उल्हास ने रत्नागिरी में सावरकरजी के सन्निध संस्मरण लिखे है (स्मृतिपुष्पे, 1979)। ये लेखक रॉयवादी है जो 1939-1945 के दौरान गुप्त राजनैतिक कार्य में हिस्सा लेते थे। उन्होंने काफी लेखन किया और अलग अलग वामपंथी राजनैतिक गुटों के कार्यकर्ताओं की सहायता से उसे प्रसृत किया। उनके पुस्तकों से कुछ उद्धरण निम्न प्रकार है - 'पतित पावन मंदिर के मंच का उपयोग, स्वतंत्रता के राजनैतिक आंदोलन के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से तो किया गया ही। उदाहरण के लिए, नेपाल के गुरखा नेताओं को आमंत्रित करना और नेपाल तथा शेष हिंदुस्थान के संबंध दृढ करने के प्रयास अपनी ओर से शुरू करना, यह तात्या की 'राजनीति' ही थी। हमारे  कुछ भोले भाई यह नहीं समझ पाए थे, लेकिन अंग्रेज सरकार निश्चित रूप से समझ गई थी। झांसी की रानी का 75वां स्मृतिदिन हमने मनाया... तात्या औपचारिक रूप से स्मृतिदिन समारोह में नहीं पधारे थे। लेकिन वास्तव में उनके ही मार्गदर्शन में वह उत्सव मेरे हाईस्कूल की छात्र दशा में भी अगुवाई करते हुए करना पड़ा... सावरकरजी ने  अंडमान से उनकी रिहाई अथवा स्थलांतरण होने से पहले जो पत्राचार सरकार से किया, उसके आधार पर 'वे नरमपंथी बन गए' आदि वक्तव्य करनेवालों की गणना मूर्खों में ही करनी चाहिए...क्रांति के सिद्धांतों से उन्होंने कभी स्वप्न में भी मुंह नहीं मोड़ा... लेनिन के चरित्र पर पहला भाषण मैंने तात्या के घर में अभ्यास मंडल की साप्ताहिक सभा में सुना। रशियन क्रांति और क्रांतिकारियों के संबंध में उस समय उपलब्ध थोड़ी सी अंग्रेजी और मराठी पुस्तकें तात्या के पास होते थे और वे पुरस्कार वगैरह देकर अथवा पढ़ने के लिए देकर उनका प्रसार भी करते थे। मीरत कांड के क्रांतिकारियों को सावरकर भाइयों के 'श्रध्दानंद' ने अन्य किसी भी समाचारपत्र ने जिस आत्मीयता से नहीं सराहा, उतनी आत्मीयता से सराहा...नमक कानून के विरोध में सत्याग्रह के लिए सत्याग्रहियों के झुंड़ पर झुंड़ रत्नागिरी में तात्या के दर्शन करने आते थे...मार्ग को लेकर मतभेद होने के बावजूद  उन साहसी सत्याग्रहियों को तात्या अत्यंत उदार शब्दों में आशीर्वाद देते थे। वे कभी कभार गांधी टोपी भी पहनते थे...काम्रेड मेहरअली कई बार आते और तात्या के पास काफी देर तक चर्चा करते रहते। उस दौरान कुछ पंजाबी क्रांतिकारी युवा तात्या से मिलकर गए... (सावरकरजी ने) रत्नागिरी में गुप्त राजनैतिक लेखन किया एवं नियमित रूप से मुंबई तथा अन्यत्र उसे भेजकर हजारो देशबांधवों को पढ़ने के लिए उपलब्ध कराया... तात्या घर में (सरकार द्वारा) जब्त की हुई पुस्तक रखते थे। तलाशी का खतरा मंडराने पर उन्हें अन्यत्र ले जाकर छिपाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती... बॅ. विठ्ठलभाई पटेल देशनिकाला के दौरान विदेश में गुजर गए, तब तात्या बड़े व्यथित हुए। उस समय वे बीमार थे। उनकी जांच के लिए आए हुए डाक्टर से उन्होंने कहा, ''डाक्टर, विठ्ठलभाई पटेल विदेश में मरे। वहां उनका कोई नहीं। कल मैं मर गया तो कम से कम मेरे अपने लोग मेरे आसपास रोने के लिए होंगे।''

क्रांतिकारियों का समर्थन   

 
ता. 9-11 सितंबर 1924 को उत्तर पश्चिम प्रांत के कोहट में मुस्लिमों ने भयंकर दंगा करते हुए लगभग 150 हिंदुओं को मार डाला। उस पर पुणे के 'मराठा' नामक अंग्रेजी समाचारपत्र में सावरकरजी ने 'द सफरिंग मुस्लिम्स ऑफ कोहट' नामक एक व्यंग्यात्मक लेख लिखा जिसके बाद सरकार ने सावरकरजी को सूचित किया, कि राजनीति में हिस्सा न लेने की शर्त का वे उल्लंघन कर रहे हैं। इस पर सावरकरजी ने ढीठता से प्रत्युत्तर दिया, कि 'सरकार ने मेरे लेख का जो मतलब  निकाला है, उसे ध्यान में लेते हुए मुझे भी मेरे लेखों और शर्तों का पुनर्विचार करना पड़ेगा' ।  
रत्नागिरी में रहते हुए सावरकरजी ने अपने पूर्ववर्ती क्रांतिकारी मित्रों से संपर्क कायम रखा था। अप्रैल 1925 में सावरकर के 'अभिनव भारत' के सहयोगी व्ही. व्ही. एस. अय्यर उन्हें मिले। उसके दोन महिने बाद ही उनकी एक दुर्घटना में मृत्यु होने पर सावरकरजी ने उन पर अत्यंत दिल को छू लेनेवाला लेख लिखा था। मार्च 1926 में सावरकरजी ने गृहमंत्री से पत्र लिखकर विधानमंडल का चुनाव लढ़ने की अनुमति मांगी, लेकिन वह ठुकराई गई। ता. 7 सितंबर 1927 के साप्ताहिक 'श्रध्दानंद' में सावरकरजी ने काकोरी कांड के सशस्त्र क्रांतिकारियों पर अभियोग के बारे में लेख लिखा। ता. 26-28 दिसंबर 1928 को मद्रास में हुए काँग्रेस सत्र में हिंदुस्थान की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए प्रयास करनेवाले शापूरजी सकलतवाला का अभिनंदन और काकोरी के क्रांतिकारियों के बारे में संवेदना व्यक्त करने के बाद सावरकरजी ने 'श्रध्दानंद' में लिखे लेख में निम्न शब्दों में संतुष्टि व्यक्त की थी, 'भारतीय राजनीति में इस दरमियान आया हुआ अविवेक का ग्रहण खत्म हुआ है, राष्ट्रीय वृत्ति पुनः वीरवृत्ति की ओर झुकी है।' इसके अनंतर काकोरी कांड के क्रांतिकारी संन्याल भाई की माताजी क्षीरोदवासिनी की मृत्यु की खबर समाचारपत्र के एक कोने में छपी। तब सावरकरजी ने उस मां का गौरव करनेवाला लेख ता. 3 मई 1928 के अंक में लिखा था। ता. 25 अप्रैल 1928 को एक विवाह के उपलक्ष्य में सावरकरजी मुंबई आए। उस समय सावरकर और 'अभिनव भारत' के उनके अधिकांश कार्यकर्ता विवाह मंडप में एकत्र आए थे।
साईमन कमिशन का विरोध करते हुए पुलिस की मारपीट के कारण लाला लजपत राय का 17 नवंबर 1928 को निधन हुआ। उसके दूसरे दिन रत्नागिरी में शोकसभा हुई। जो राजनैतिक विचार सावरकरजी प्रस्तुत नहीं कर सकते थे, वे उन्होंने मोघे नामक अपने अनुयायी से सभा में कहलवाए। उस सभा में किए हुए भाषण में सावरकरजी ने 'लालाजी की मृत्यु का बदला लेने के लिए कार्यक्षेत्र में उतरने' का उपदेश युवाओं को किया। सावरकरजी ने लालाजी पर दो लेख भी लिखे। लालाजी की मृत्यु का बदला लेने के लिए भगतसिंग, राजगुरू, सुखदेव और चंद्रशेखर आझाद ने साहायक पुलिस निरीक्षक साँडर्स को मार डाला। गांधीजी ने अपने 'यंग इंडिया' में इसका वर्णन हत्या का यह अभिशाप (धिस कर्स ऑफ ऍसेसिनेशन) के रूप में किया था। लालाजी की मृत्यु से हुए दुख से ज्यादा साँडर्स की हत्या होने की हिंसा गांधीजी को अधिक दुखदायक लगी। इसके उत्तर में सावरकरजी ने 'श्रध्दानंद' में 'यह बदले का अभिशाप या हत्या का अभिशाप' लेख लिखकर क्रांतिकारियों का पक्ष रखा। भगतसिंग और राजगुरू दोनों गुप्त रूप से रत्नागिरी में सावरकरजी से मिलकर गए थे, इस आशय का रत्नागिरी में सावरकर के अनुयायी वामनराव चव्हाण का संस्मरण लोकसत्ता (28 मई 1972) में प्रसिध्द हुआ था।
क्रांतिकार्य करते हुए क्रांतिकारियों को बिनावजह प्राणत्याग नहीं करने चाहिए, आगे उंची उड़ान भरने के लिए वक्त देखकर चार कदम पीछे भी आना चाहिए, यह सावरकर का दृष्टिकोण था। 63 दिनों तक अन्नत्याग कर ता. 13 सितंबर 1929 के दिन लाहौर के जेल में जितेंद्रनाथ (जतिन) दास नामक क्रांतिकारी ने मौत को गले लगाया। इसके बाद 'प्रशंसनीय! वंदनीय! आदरणीय लेकिन अनुकरणीय नहीं' शीर्षक से सावरकरजी ने 'श्रध्दानंद' में लेख लिखा। उसे पढ़ने के बाद ब्रिटिशों द्वारा लगाई गई पाबंदियां सावरकरजी ने वक्त वक्त पर क्यों स्वीकार की, इस पर रोशनी पड़ती है। जितेंद्रनाथ की तरह भगतसिंग आदि को उपवास करते नहीं मरना चाहिए, यह विनति करते हुए सावरकर लिखते है, 'जब तक हिंदुस्थान गुलामी में है तब तक छोटे मोटे अधिकार जितने संभव हो उतने छिनने चाहिए, उनके लिए परिमित और आनुपातिक स्वार्थत्याग तो करते ही रहने है, लेकिन यह कभी नहीं भूलना है, कि वे अधिकार जिसने दिए है वह बाहरी सत्ता जब तक जीवंत और प्रबल है, तब तक वे कब छिने जाएंगे इसका कोई नियम नहीं है। यह धूल पर बनी रंगोली इसलिए किन्हीं मामूली प्रश्नों को 'यह इज्जत का सवाल है' कहकर अधिक महत्त्व देकर लाखों की जान मिट्टी के मोल देने की प्रतिज्ञा इसके बाद तो किसी को नहीं करनी चाहिए... हुतात्मा जतिंद्र का अपवाद वंदनीय है, प्रशंसनीय है - लेकिन वह अपवाद है। वह सबके लिए बिल्कुल अनुकरणीय नहीं है। शिवाजी बंदी बन गए थे उस समय उसने अनशन करते हुए अपने प्राण नहीं त्याग दिए, बल्कि वह औरंगजेब की छाती पर लात मारकर भाग निकला। स्थिति को देखकर उचित बदलाव करो, लेकिन मूल रणनीति वही रखो!'
क्रांतिकारकों की स्मृति कायम रहे, इसके लिए सावरकरजी ने रत्नागिरी में (और आगे भी) प्रयास किया। आंध्र में क्रांतिकारी अल्लुरी सीताराम राजू (राम राजू, 1897-1924) का बलिदान होने के बाद सावरकरजी ने दिल को छू लेनेवाले शब्दों में उन्हें 'श्रध्दानंद' में श्रध्दांजली अर्पित की थी। इसी दौरान सावरकरजी ने हुतात्मा विष्णू गणेश पिंगळे का चरित्रलेखन किया। ता. 20 अप्रैल 1929 से 1 मार्च 1930 के दौरान सावरकरजी ने स्वतंत्रता के कवि गोविंद पर पांच लेख लिखे। ता. 18 अप्रैल 1930 को चितगांव के सरकारी शस्त्रागार पर क्रांतिकारियों ने छापा मारा जिसका समर्थन करनेवाले तीन लेख सावरकरजी ने 'श्रध्दानंद' में लिखे। इसमें 'चाहे तो शस्त्राचारी कहो, लेकिन अत्याचारी नहीं' शीर्षक से तिसरे लेख में शस्त्राचार का इतना गुणगान था, कि ब्रिटिशों ने साप्ताहिक 'श्रध्दानंद' बंद करवाया।


क्रांतिकारी युवाओं को प्रोत्साहन


शंकर मोघे, गणेश वैशंपायन तथा सुप्रसिध्द क्रांतिकारी पृथ्वीसिंग आजाद ने रत्नागिरी में सावरकरजी से मिलकर मुंबई में क्रांतिकार्य प्रारंभ किया। ये लोग मुंबई के लैमिंग्टन रोड गोलीबारी कांड में (9 ऑॅक्टोबर 1930) लिप्त थे। एक तरफ क्रांतिकार्य का पुरस्कार करनेवाले सावरकरजी को अन्य विचारों के देशभक्तों के बारे में आत्मीयता थी। नमक के सत्याग्रह में जो 35 लोग बंदिवास भुगतकर छूटे, उनके सम्मान में रत्नागिरी के पतित पावन मंदिर में ता. 8 मार्च 1931 को सहभोजन रखा गया। ता. 23 मार्च 1931 को भगतसिंग, सुखदेव और राजगुरू को फांसी दे दी गई। यह समाचार सुनकर सावरकरजी को अतीव पीड़ा हुई। लेकिन उन्होंने अपने अंदरूनी गुट के युवाओं से कहा, कि रोते हुए बैठे बिना इस फांसी का बदला लेना चाहिए। उनके कहने पर इन युवाओं ने दूसरे दिन सुबह गांव में प्रभातफेरी निकालकर सावरकरजी द्वारा भगतसिंग पर रचा हुआ गीत गाया और स्वतंत्रतालक्ष्मी का जयजयकार किया। ता. 22 जुलै 1931 को पुणे के फर्गयुसन कॉलेज में हॉटसन पर गोली चलाने से पूर्व वा. ब. गोगटे तथा कोल्हापूर के युवा आत्माराम नाना पाटील सावरकरजी से मिले थे। जुलै 1931 में कलेक्टर गिलिगन ने सावरकरजी को बुलाकर धमकी दी, कि ''आपकी हाल की गतिविधियां आपत्तिजनक है और आपको फिर से आजीवन कारावास  भुगतना होगा।'' ता. 26 अप्रैल 1934 को सावरकर के अनुयायी वामनराव उर्फ बडी चव्हाण ने मुंबई के धोबीतलाव इलाके में एक अंग्रेज सार्जंट पर गोलियां चलाई, जिसके बाद पुलिस ने रत्नागिरी में सावरकरजी के घर की तलाशी ली और उन्हें 15 दिन जेल में रखा।
सावरकरजी द्वारा रत्नागिरी में ब्रिटिशविरोधी राजनैतिक काम का जायजा इस लेख में लिया है। सन् 1937 में बिनाशर्त रिहाई होने के बाद उनकी राजनीति पर उठाई जानेवाली आपत्तियां और उस संबंध में वास्तव अगले लेख में जानेंगे।

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