कांग्रेस नेता एवं मध्य प्रदेश (म.प्र.) के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 19 मई को पांच राज्यों के चुनाव-परिणाम आने के पश्चात यह कहा था कि कांग्रेस को अब आत्म-परीक्षण की नहीं, बल्कि सर्जरी की जरूरत है। सर्जरी भी कोई छोटी-मोटी नहीं बल्कि मेजर सर्जरी की जरूरत है। यद्यपि इस पर देश के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने यह जरूर कहा था कि क्या कांग्रेस वंशवाद से मुक्त हो जाएगी? जो कुछ हो, पर दिग्विजय सिंह ने यह भी कहा था कि जो भी सर्जरी होगी, वह कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी ही करेंगी। ऐसी स्थिति में यह सभी को पता है कि जब सोनिया और राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस इस तरह की पराभव की ओर बढ़ रही है, तो वह क्या और कैसे सर्जरी करेंगे? समझा जा सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि दिग्विजय की मंशा के अनुरूप कांग्रेस पार्टी में सर्जरी की शुरुआत हो चली है।

समाचार यह है कि पश्चिम बंगाल के नव निर्वाचित विधायकों ने यह स्टाम्प पेपर में शपथ-पत्र दिया है कि मैं बिना किसी शर्त के इण्डियन नेशनल कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करता हूं, जिसे अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के द्वारा संचालित किया जा रहा है। दूसरे प्वाइंट में यह लिखा है कि विधानसभा का हिस्सा होते हुए मैं पार्टी के खिलाफ हो रही किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं रहूंगा। मैं पार्टी के खिलाफ कोई नकारात्मक बात भी नहीं करूंगा और ऐसे किसी काम की करने की जरूरत लगने पर मैं पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दूंगा।

स्पष्ट है कि इस तरह से शपथ-पत्र के मायने यह है कि सोनिया और राहुल अब अपने ही पार्टी के लोगों से डरे हुए हैं। चूंकि उन्हें इस बात का पूरी तरह एहसास हो गया है कि भारतीय राजनीति में उनके द्वारा वोट खींचने की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चली है। सिर्फ इतना ही नहीं उल्टे उनके घोटाले और लूट सामने आने से उनकी असली रंगत मतदाताओं के समक्ष आ चुकी है। ऐसी स्थिति में संभावना है कि कांग्रेस जन ही कहीं नेतृत्व परिवर्तन की बातें न करने लगे, कम-से-कम राहुल के खिलाफ ही न आवाज उठाने लगें। ऐसी स्थिति में बेहतर यह होगा कि इन्हें वंशवाद की ऐसी जकड़न में बांध दिया जाए, ताकि यह स्वतंत्र सोच से पूरी तरह वंचित रहे एवं खानदान की गुलामी से बंधे रहे। इस बीच ऐसा भी सुनते में आया कि सोनिया गांधी ने इस पर नाराजगी जताई है। पर इसे यह तो ‘‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और’’ वाली बात ही कहा जा सकता है। हकीकत यही है कि कांग्रेस पार्टी जिस ढंग से वंशवाद के बेल से जकड़ गई है, उसके चलते वहां काडर से कोई नेतृत्व विकसित करने की बात करना या सोचना दूर की कौड़ी है। वस्तुतः जब मेजर सर्जरी की बात की जाती है तो उसका मतलब यही होता है कि किसी व्यक्ति या संस्था को लाईलाज बीमारी है। पर ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी सही सर्जरी के बजाय यानी काडर से नेतृत्व विकसित करने या पार्टी का ढ़ांचा लोकतांत्रिक बनाने के बजाय और शतुरमुर्गी होती जा रही है यानी कि सच्चाई से आंख मूंदती जा रही है।

सच्चाई यही है कि कांग्रेस पार्टी का अंतिम सत्य वंशवाद है, चाहे कांग्रेस पार्टी रहे न रहे, चाहे उसका अस्तित्व ही मिट जाए, पर वंशवाद उसका सर्वोच्च दर्शन ही नहीं ध्येय भी है। तभी तो नकारा और अब तक बचपना से भरपूर राहुल गांधी को ढोने के लिए ही नहीं बल्कि उनकी जय-जयकार करने को भी कांग्रेस जन बाध्य हैं। वस्तुतः कांग्रेस पार्टी का संकट एक ऐसे व्यक्ति का संकट है जो असाध्य बीमारी से ग्रस्त है कि जब तक जीवन है तब तक जी लो, कोई चीर-फाड़ का खतरा मत उठाओ। क्योंकि कांग्रेस पार्टी कोई संगठन तो रहा नहीं व्यक्ति-विशेष का पर्याय हो गया है और व्यक्ति के समक्ष मेजर सर्जरी में खतरे तो रहते ही हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि कांग्रेस पार्टी में ऐसी ही भोड़ी और बेतुकी किस्म की गतिविधियां देखने को मिलेगी।