नागपुर, जून 10, लखेश्वर चंद्रवंशी ‘लखेश’ : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि भारत अनेक मतों, पंथों और परम्पराओं वाला देश है। हमारा देश बहुभाषी है। इसके बावजूद भी सभी देशवासी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यह विचार करनेवाली बात है कि वह कौन सा तत्व है जो विभिन्न विचारधाराओं के होने के बाद भी सभी को एकसूत्र में जोड़े रखती है? सरसंघचालक ने कहा कि वह एकात्मता का सूत्र है - आत्मीयता का, बंधुभाव का। यही भाव व्यक्ति को परिवार से, परिवार को समाज से, समाज को राष्ट्र से और राष्ट्र को समष्टि से जोड़ता है। उन होने कहा कि संघ किसी प्रतिक्रिया के स्वरूप में काम नहीं करता। संघ का उद्देश्य संपूर्ण समाज को संगठित करना है, हिन्दुओं में शक्तिशाली संगठन बनना नहीं। डॉ.भागवत संघ की प्रतिवर्ष लगनेवाली संघ शिक्षा वर्ग (तृतीय वर्ष) के समापन समारोह के प्रगट कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

यहां रेशिमबाग के मैदान पर आयोजित कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि कोलकाता के साप्ताहिक 'वर्तमान' के संपादक रन्तिदेव सेनगुप्ता थे।

25 दिन, 978 शिक्षार्थी

वर्तमान (2016) के संघ शिक्षा वर्ग (तृतीय वर्ष) में देशभर से कुल 978 शिक्षार्थी सहभागी हुए थे। इस वर्ग में शामिल शिक्षार्थी कम से कम तहसील स्तर पर या उससे बड़े स्तर पर संघ कार्य का अनुभव ले चुके हैं। सघ शिक्षा वर्ग में सहभागी शिक्षार्थियों में विद्यार्थी, व्यवसायी, शिक्षक, अध्यापक, कृषक, मजदूर तथा वकील जैसे विविध क्षेत्रों में कार्यरत स्वयंसेवकों का समावेश था।

सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि इस वर्ग में प्रशिक्षण ले रहे शिक्षार्थियों ने राष्ट्रीय एकात्मता के भाव को अनुभव किया। उन्होंने बताया कि शिविर में भारत के विभिन्न प्रान्तों से आए शिक्षार्थी की मातृभाषा भिन्न है। पर प्रशिक्षण के दौरान एक गण में अनेक भाषा, प्रांत और पंथों को माननेवाले एकसाथ रहे। लगातार 25 दिनों तक एकसाथ देश, धर्म, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे देश व समाजहित से सम्बंधित विषयों पर सबने चिंतन किया, विमर्श किया। सरसंघचालक ने बताया कि जब शिविर के अंतिम दिन जब गण के शिक्षार्थियों को अपने प्रान्त रचनानुसार नियोजन के लिए गण से अलग किया गया तो शिक्षार्थियों के आंखों में आंसू थे। ये आंसू आत्मीयता के थे, बंधुभाव का था। इसी एकात्मता के भाव को देशभर में जाग्रत करने का काम संघ विगत 90 वर्षों से कर रहा था।

संघ की शाखा देश के लिए

सरसंघचालक डॉ.भागवत ने कहा कि संघ की नियमित चलनेवाली शाखा 365 दिन एक जैसी लगती है। 90 वर्षों से यह प्रक्रिया निरंतर चल रही है। उन्होंने पूछा, “ये शाखा क्यों चल रही है?” फिर उन्होंने स्वयं बताया कि देश के लिए। यह स्पष्ट है कि संघ की शाखा देश के लिए चल रही है। संघ कहता है कि यह देश हमारी मातृभूमि है, हम इसकी संतान हैं। यही भाव सम्पूर्ण देश को जोड़ता है। इसलिए हम सभी एक स्वर में “भारतमाता की जय” कहते हैं। 

सरसंघचालक ने कहा कि देश, प्रांत, भाषा आदि मानवनिर्मित है। उन्होंने कहा कि मानवनिर्मित प्रत्येक चीज परिवर्तनीय है, वह नष्ट भी हो सकती है। पर हमारा सौभाग्य है कि एक शाश्वत आधार हम सबको जोड़ती है, इसे ही हम संस्कृति कहते हैं, हिन्दुत्व कहते हैं। सनातन कल से आज तक हमारे देश में एक सांस्कृतिक जीवन मूल्य प्रतिष्ठित है। इन जीवन मूल्यों को कोई नहीं सिखाता यह हम देशवासियों की अंतरात्मा में बसा है। हमारा जीवन मूल्य उचित-अनुचित, अच्छा-बूरा और सही-गलत में में योग्य के चयन का मार्ग दिखाता है।

राष्ट्र को लेकर वाद नहीं

सरसंघचालक ने कहा कि राष्ट्र को लेकर हमारी स्पष्ट अवधारणा है, इसलिए राष्ट्र को लेकर कोई वाद नहीं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने भी राष्ट्र की भावनात्मक एकता पर बल दिया है। देश में प्राचीन काल से ही देश में सांस्कृतिक एकता का भाव प्रतिष्ठित है। देश की सांस्कृतिक एकात्मभाव से ही राष्ट्र बना है। डॉ बाबासाहब आम्बेडकर ने संविधान को राष्ट्र को अर्पित करते हुए कहा था कि आपस में वैचारिक मतभेद हैं, अलग-अलग मत, पंथ है पर राष्ट्र की एकता के लिए एकात्म और बंधुत्व के भाव को जगाना होगा। उन्होंने कहा था कि हिन्दू धर्म से जातिगत भेदभाव, छुआछूत और विषमता को समाप्त किया जाना चाहिए। इसी के कारण देश की अवनति हुई और अंग्रेजों ने देश पर राज्य किया। सरसंघचालक ने जोर देकर कहा कि देश में छुआछूत और भेदभाव को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय एकात्मता का भाव जगाना होगा।

सारा भारत एक है  

सरसंघचालक ने कहा कि द्रविड़ पंथ की बातें आजकल चलती रहती हैं। दक्षिण में हिंदी भाषा का विरोध हुआ, तमिल लोगों को लगता था कि देश की उत्तरी भाग ने उनपर अन्याय किया है। उन्हें दबाया जा रहा है। लेकिन परिस्थितियां बदल रही है। जब हिमालय पर परकीयों का आक्रमण हुआ तो सारा दक्षिण भारत एक स्वर में बोल उठा था कि हिमालय पर आक्रमण दक्षिण पर आक्रमण है। सारा भारत एक है। यही भाव देशात्म भाव कहलाता है। 

डाॅ. मोहनजी भागवत ने आगे कहा कि इस देश में विविध संप्रदाय एवं रीति रिवाज हैं लेकिन "हम भारतवासी है" यह भावना समान है- यह सिखाने की आवश्यकता नहीं है! इस देश की संस्कृति हम सब को जोड़ती है यह प्राकृतिक सत्य है।

संघ में आकर संघ को समझिए

संघ से जुड़े लोग और संघ के बाहर लोग संघ के सन्दर्भ में बहुत सी बातें कहते हैं। अनुमान लगाते हैं। अनेकों बार यह अनुमान गलत होता है। बाहर से देखकर संघ को नहीं समझा जा सकता। संघ को समझने के लिए संघ में आना होगा। संघ में आ कर ही संघ को समझा जा सकता है। सरसंघचालक ने बताया कि कई बार तो संघ के हितैषी भी संघ के सम्बन्ध में अनुमान लगाने में गलती कर बैठते हैं। लेकिन अपप्रचारों के बावजूद संघ लोकप्रिय हुआ है, विस्तारित हुआ है। संघ किसी को भी विरोधी नहीं मानता। संघ समूचे समाज को संगठित करना चाहता है।

डाॅ. भागवत ने आगे कहा कि शोषण मुक्त, समतायुक्त समाज का निर्माण करने के लिए संघ काम कर रहा है। संघ के स्वयंसेवकों के व्यवहार एवं निस्वार्थ सामाजिक कार्य के कारण संघ की लोकप्रियता बढ़ रही है। समाज सेवा का काम करनेवाले कार्यकर्ताओं में संघ भेद नहीं करता। जो संघ से संबधित नहीं हैं लेकिन निस्वार्थभाव से समाज सेवा करते हैं, ऐसे समाज सेवकों के सम्पर्क मे भी संघ रहता है। आवश्यक हो तो उन्हें सहयोग भी देता है।  

प्रधानमंत्री के भाषण की प्रशंसा

सरसंघचालक डॉ.भागवत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अमेरिकन कांग्रेस के संयुक्त अधिवेशन में दिए गए भाषण की सराहना की। सरसंघचालक ने कहा कि प्रधानमंत्री ने जो भाषण दिया वह बहुत सुंदर था। लोकतंत्र, पर्यावरण, व्यक्ति स्वतंत्रता, नागरिक मूल्यों और आतंकवाद पर स्पष्ट शब्दों में लोगों के सामने रखा। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में देश का मान बढ़ाया।

गरजने वाले, बरसेंगे नहीं

सरसंघचालक ने देश में आजकल छोटे लोगों की आवाज बड़ों से अधिक बढ़ने लगी है। इससे लगता है कि संकट आ गया है। पर ये गरजने वाले, कभी नहीं बरसेंगे चाहे वे कितने भी भयंकर या विकराल हो! उन्होंने महाभारत के एक प्रसंग का उल्लेख किया जिसमें श्रीकृष्ण मुस्कुराकर भयंकर राक्षस को अपने वश में करके उसे अपने गांठ में बांध लेते हैं। सरसंघचालक ने कहा कि हमारी शक्ति हमारे एकता में निहित है। यदि हम एक रहें तो हम अपने राष्ट्रीय जीवन मूल्यों के बल पर अपने देश की रक्षा तो कर ही लेंगे, साथ ही दुनिया को भी सही राह दिखा सकते हैं। उन्होंने देश के युवा सामर्थ्य की शक्ति की चर्चा करते हुए कहा कि हम पैसा कमाना चाहे तो सबसे ज्यादा कमा सकते हैं, ज्ञान अर्जित करना चाहते हैं तो अधिक ज्ञान का अर्जन कर सकते हैं, गुणवान बनना चाहते हैं तो बन सकते हैं। पर इसका अंतिम हेतु क्या है?

सरसंघचालक ने कहा, ज्ञान, गुण, धन सबकुछ देश को अर्पित होना चाहिए। वीर सावरकर की कविता के पद का उल्लेख करते हुए कहा कि गुण सुमने मी वेचियली या भावे, की तिने सुगंधा घ्यावे! जरी उद्धरणी व्ययन तिच्या हो साचा,तरी हा व्यर्थभार विद्येचा!” सावरकर का यह कथन कितना प्रासंगिक है। डॉ.भागवत ने कहा कि मेरे ज्ञान और गुण यदि देश के काम न आए, तो यह व्यर्थ है। इसलिए देश में देशात्मभाव को जाग्रत करना होगा, इसी से देश के भाग्य सूर्य का उदय होगा। सरसंघचालक ने अपने भाषण के अंत में नागरिकों को आह्वान किया कि केवल दर्शक या श्रोता बनकर मत रहिए, वरन संघ के स्वयंसेवक या सहयोगी बनकर देशकार्य में अपना योगदान दें। 
इससे पहले समारोह के अध्यक्ष एवं प्रमुख अतिथि कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार रन्तिदेव सेनगुप्ता ने कहा कि देश में राष्ट्रविरोधी शक्तियां सक्रिय हैं। पाकिस्तान और चीन से देश की सीमा की सुरक्षा देश के जवान कर रहे हैं। पर देश की आतंरिक सुरक्षा का दायित्व सभी नागरिकों का है। कुछ लोग देश में भारत के टुकड़े करने की बात कह रहे हैं। पर स्वामी विवेकानन्द ने स्वप्न देखा था कि देश को संगठित करने के लिए शक्ति केन्द्र की स्थापना हो। डॉ. हेडगेवारजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर स्वामीजी के स्वप्न को पूर्ण किया। रन्तिदेव ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द के सपनों का शक्ति केन्द्र के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्य कर रहा है।    

उल्लेखनीय है कि व्यासपीठ पर नागपुर महानगर संघचालक राजेश लोया, वर्ग के सर्वाधिकारी वन्नीयराजन उपस्थित थे। प्रास्ताविक एवं आभार प्रदर्शन वर्ग कार्यवाह हरीश कुलकर्णी ने किया। इस समापन समारोह में इंडिया टुडे ग्रुप के पूर्व चेयरमैन अरुण पूरी, पूर्व सांसद राजू चंद्रशेखर, उद्योजक उमा सुधीर, के.सत्यनारायण, राजेश भुजबल, पटियाला के महापौर अमरिंदर वाधव, प्रधानमंत्री के सलाहकार एम.रामदुरई, देवसिंह अद्वेती, शिक्षाविद् श्रीनिवास वनपा तथा राष्ट्र सेविका समिति की प्रमुख संचालिका शांताक्का के साथ ही हजारों की संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।